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भगवतीस्त्रोतम् – जय भगवति देवि नमो वरदे
स्तोत्र

भगवतीस्त्रोतम् – जय भगवति देवि नमो वरदे

देवता: माँ भगवती / देवी दुर्गा

॥ मंत्र ॥

ॐ दुं दुर्गायै नमः।
यह मंत्र देवी दुर्गा की उपासना में प्रचलित है। स्तोत्र के मूल पाठ में अलग से कोई मंत्र नहीं दिया गया है।

पूजा सामग्री
माता भगवती की प्रतिमा या चित्र
दीपक और घी/तेल
धूप या अगरबत्ती
पुष्प और माला
अक्षत (चावल)
रोली या कुमकुम
जल
नैवेद्य या फल
प्रसाद
घंटी
लाल वस्त्र या चुनरी — श्रद्धानुसार
विधि
सुबह या शाम स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ स्थान पर माता भगवती के सामने दीपक जलाएँ। पुष्प और जल अर्पित करके श्रद्धा से स्तोत्र का पाठ करें। पाठ के बाद माता को प्रणाम करके अपनी मनोकामना कहें। नवरात्रि या अन्य देवी-उपासना के दिनों में भी इसका पाठ किया जा सकता है।

भगवतीस्त्रोतम्

जय भगवति देवि नमो वरदे
जय पापविनाशिनी बहुफलदे ।

जय शुम्भ-निशुम्भ कपालधरे
प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे ।।१।।

जय चन्द्रदिवाकर नेत्रधरे
जय पावक भूषित वक्रधरे ।

जय भैरव देहनिलीनपरे
जय अन्धकदैत्यविशेषकरे ।।२।।

जय महिषविमर्दिनिशूलकरे
जय लोकसमस्तकपापहरे ।

जय देवि पितामह विष्णुनुते
जय भास्करशकशिराऽवनते ।।३।।

जय पण्मुख-सायुध ईशनुते
जय सारगामिनि शुम्भुनुते ।

जय दुःख-दरिद्र-विनाशकरे
जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे ।।४।।

जय देवि समस्त शरीरधरे
जय नाकविदर्शिनि दुःखहरे ।

जय व्याधिविनाशिनि मोक्षकरे
जय वाञ्छितदायिनि सिद्धिकरे ।।५।।

एतद्वयासकृतं स्तोत्रं यः पठेन्नियतः शुचिः ।
गृहे वा शुद्धभावने प्रीता भगवती सदा ।।६।।

SanskritPeeth.in

अर्थ

इस स्तोत्र में देवी भगवती की महिमा का वर्णन किया गया है। माता को पापों का नाश करने वाली, दुःख दूर करने वाली और भक्तों की मनोकामना पूरी करने वाली बताया गया है। इसमें देवी के अनेक रूपों और उनकी शक्तियों का स्मरण करते हुए उनसे सुख, समृद्धि, आरोग्य और मोक्ष प्रदान करने की प्रार्थना की गई है।
अंतिम श्लोक में कहा गया है कि जो व्यक्ति इस स्तोत्र का नियमित रूप से शुद्ध मन से पाठ करता है, उस पर भगवती प्रसन्न रहती हैं।

पदच्छेद / व्याकरण नोट

यह स्तोत्र मुख्यतः संस्कृत भाषा में है। कुछ प्रमुख पदों का सरल रूप इस प्रकार समझा जा सकता है—
जय भगवति देवि — हे भगवती देवी! आपकी जय हो।
नमो वरदे — वर देने वाली देवी को नमस्कार।
पापविनाशिनी — पापों का नाश करने वाली।
बहुफलदे — अनेक प्रकार के फल देने वाली।
नरार्तिहरे — मनुष्यों के दुःख को दूर करने वाली।
महिषविमर्दिनि — महिषासुर का मर्दन करने वाली।
दुःख-दरिद्र-विनाशकरे — दुःख और दरिद्रता का नाश करने वाली।
व्याधिविनाशिनि — रोगों का नाश करने वाली।
मोक्षकरे — मोक्ष प्रदान करने वाली।
वाञ्छितदायिनि — इच्छित फल देने वाली।
सिद्धिकरे — सिद्धि प्रदान करने वाली।
व्याकरण की दृष्टि से स्तोत्र में देवी के लिए अनेक विशेषणों का प्रयोग हुआ है। जैसे पापविनाशिनी, महिषविमर्दिनी, व्याधिविनाशिनी, वाञ्छितदायिनी आदि स्त्रीलिंग शब्द हैं और देवी के गुण तथा कार्य को बताते हैं।