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माँ दुर्गा का दिव्य स्वरूप, महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र और सङ्कटा स्तुति का धार्मिक कवर चित्र
❖ स्तोत्र

सङ्कटा स्तुति | महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र के 21 श्लोक, उच्चारण और सरल अर्थ

सङ्कटा स्तुति अर्थात् महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र के 21 श्लोकों का मूल संस्कृत पाठ, आसान उच्चारण और सरल हिंदी भावार्थ पढ़ें। लेख में फलश्रुति, कठिन शब्दों के अर्थ, पाठ की विधि और चार दिनों में स्तुति याद करने का तरीका भी दिया गया है।

श्रवण झा 26 अक्टूबर 2026⏱ 16 मिनट पढ़ें👁 5

परिचय

सङ्कटा स्तुति माँ दुर्गा की एक प्रसिद्ध स्तुति है। इसमें माँ को महिषासुर का वध करने वाली, पर्वतराज हिमालय की पुत्री और भक्तों पर कृपा करने वाली शक्ति के रूप में पुकारा गया है। यह स्तुति "अयि गिरिनन्दिनि" और "महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र" के नाम से भी जानी जाती है। इसमें 21 श्लोक हैं और हर श्लोक की आखिरी पंक्ति एक जैसी है: "जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते"। अंत में पाठ का फल बताने वाला एक श्लोक और है। इस लेख में हर श्लोक मूल रूप में, फिर तोड़कर, और उसके बाद आसान हिंदी भाव के साथ दिया गया है। इस स्तुति के रचयिता के बारे में अलग-अलग मत मिलते हैं, और हमारे स्रोत के पन्ने पर रचयिता का नाम नहीं दिया गया है, इसलिए अनुमान से कोई नाम नहीं लिखा गया है।

हर श्लोक की आखिरी पंक्ति

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते

तोड़कर: जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते

सरल अर्थ: हे महिषासुर का वध करने वाली, सुंदर जटाओं वाली, पर्वत की पुत्री! आपकी जय हो, जय हो।

यह पंक्ति सबसे पहले पक्की कर लें। 21 श्लोकों में यही बार-बार आती है।

तोड़कर पढ़ने का आसान तरीका

हर श्लोक पहले मूल रूप में दिया है, उसके नीचे वही श्लोक छोटे टुकड़ों में तोड़कर दिया है। हाइफ़न (-) का मतलब है हल्का रुकना। पहले टूटी हुई पंक्तियाँ धीरे-धीरे पढ़ें, फिर वही पंक्ति बिना रुके जोड़कर बोलें। तोड़ने में कोई अक्षर बदला या हटाया नहीं गया है। इस स्तुति में बहुत लंबे जुड़े हुए शब्द हैं, इसलिए तोड़ी हुई पंक्तियों से पढ़ना सबसे आसान है।

उच्चारण के चार आसान सूत्र

  1. दोहराए गए शब्द: "सुमनःसुमनःसुमनः" और "रजनीरजनीरजनी" जैसे शब्द जान-बूझकर दोहराए गए हैं। इन्हें एक-एक करके तोड़कर पढ़ें और गिनते चलें।
  2. ध्वनि वाले शब्द: "धिमिकिटधिक्कट", "झणझणझिञ्झिमि", "दुमिदुमिता" ढोल और घुँघरू की आवाज़ के शब्द हैं। इन्हें ताल के साथ धीरे-धीरे बोलें।
  3. विसर्ग (ः): "सुमनः", "सुतेः" जैसे शब्दों के अंत में हल्की 'ह' जैसी ध्वनि।
  4. ऽ (अवग्रह): "शिरोऽधिनिवासिनि" में ऽ का मतलब है कि एक 'अ' दबा हुआ है।

मूल पाठ और सरल अर्थ

श्लोक 1

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१॥

तोड़कर पढ़ें:
अयि गिरि-नन्दिनि नन्दित-मेदिनि विश्व-विनोदिनि नन्द-नुते
गिरि-वर-विन्ध्य-शिरो-ऽधि-निवासिनि विष्णु-विलासिनि जिष्णु-नुते
भगवति हे शिति-कण्ठ-कुटुम्बिनि भूरि-कुटुम्बिनि भूरि-कृते
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥१॥

सरल भाव: हे पर्वतराज की पुत्री! आप पृथ्वी को आनंद देने वाली और संसार को प्रसन्न रखने वाली हैं, और नंदी जैसे गण आपकी स्तुति करते हैं। आप विन्ध्य पर्वत की ऊँची चोटी पर निवास करती हैं और इन्द्र भी आपकी वंदना करते हैं। हे भगवती, आप नीलकंठ शिवजी की पत्नी हैं और बहुत बड़े परिवार वाली हैं। हे महिषासुर का वध करने वाली, आपकी जय हो।

श्लोक 2

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ।
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥२॥

तोड़कर पढ़ें:
सुरवर-वर्षिणि दुर्धर-धर्षिणि दुर्मुख-मर्षिणि हर्ष-रते
त्रिभुवन-पोषिणि शङ्कर-तोषिणि किल्बिष-मोषिणि घोष-रते
दनुज-निरोषिणि दिति-सुत-रोषिणि दुर्मद-शोषिणि सिन्धु-सुते
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥२॥

सरल भाव: आप श्रेष्ठ देवताओं पर कृपा बरसाने वाली हैं और बहुत शक्तिशाली असुरों को भी हराने वाली हैं। आप तीनों लोकों का पालन करती हैं, शिवजी को प्रसन्न रखती हैं और पापों का नाश करती हैं। आप दानवों पर क्रोध करके उनके बुरे अहंकार को सुखा देती हैं।

श्लोक 3

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमालयशृङ्गनिजालयमध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥३॥

तोड़कर पढ़ें:
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब-वन-प्रिय-वासिनि हास-रते
शिखरि शिरो-मणि तुङ्ग-हिमालय-शृङ्ग-निजालय-मध्य-गते
मधु-मधुरे मधु-कैटभ-गञ्जिनि कैटभ-भञ्जिनि रास-रते
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥३॥

सरल भाव: हे जगत की माता और मेरी माता! आपको कदंब के वन प्रिय हैं और आप हँसी-खुशी में रमी रहती हैं। पर्वतों के मुकुट मणि, ऊँचे हिमालय की चोटी पर आपका अपना घर है। आप शहद की तरह मधुर हैं और मधु-कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली हैं।

श्लोक 4

अयि शतखण्डविखण्डितरुण्डवितुण्डितशुण्डगजाधिपते
रिपुगजगण्डविदारणचण्डपराक्रमशुण्डमृगाधिपते ।
निजभुजदण्डनिपातितखण्डविपातितमुण्डभटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥४॥

तोड़कर पढ़ें:
अयि शत-खण्ड-विखण्डित-रुण्ड-वितुण्डित-शुण्ड-गजा-धिपते
रिपु-गज-गण्ड-विदारण-चण्ड-पराक्रम-शुण्ड-मृगा-धिपते
निज-भुज-दण्ड-निपातित-खण्ड-विपातित-मुण्ड-भटा-धिपते
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥४॥

सरल भाव: आपने असुरों की सेना के उन हाथियों को सैकड़ों टुकड़ों में काट डाला। शत्रुओं के हाथियों को चीर देने वाले पराक्रमी सिंह की आप स्वामिनी हैं। अपनी भुजाओं की शक्ति से आपने मुंड नामक असुर-सेनापति को गिरा दिया।

श्लोक 5

अयि रणदुर्मदशत्रुवधोदितदुर्धरनिर्जरशक्तिभृते
चतुरविचारधुरीणमहाशिवदूतकृतप्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीहदुराशयदुर्मतिदानवदूतकृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥५॥

तोड़कर पढ़ें:
अयि रण-दुर्मद-शत्रु-वधोदित-दुर्धर-निर्जर-शक्ति-भृते
चतुर-विचार-धुरीण-महा-शिव-दूत-कृत-प्रमथा-धिपते
दुरित-दुरीह-दुराशय-दुर्मति-दानव-दूत-कृतान्त-मते
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥५॥

सरल भाव: युद्ध में घमंडी शत्रुओं के वध के लिए आपने देवताओं की कठिनता से रुकने वाली शक्ति धारण की। आपने समझदार महाशिव को अपना दूत बनाया और प्रमथगणों की अधिपति बनीं। बुरे इरादों और बुरी बुद्धि वाले दानवों के दूत के लिए आप यमराज जैसी हैं।

श्लोक 6

अयि शरणागतवैरिवधूवरवीरवराभयदायकरे
त्रिभुवनमस्तकशूलविरोधिशिरोधिकृतामलशूलकरे ।
दुमिदुमितामरदुन्दुभिनादमहोमुखरीकृततिग्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥६॥

तोड़कर पढ़ें:
अयि शरणागत-वैरि-वधू-वर-वीर-वराभय-दाय-करे
त्रिभुवन-मस्तक-शूल-विरोधि-शिरो-धिकृता-मल-शूल-करे
दुमि-दुमि-तामर-दुन्दुभि-नाद-महो-मुखरी-कृत-तिग्म-करे
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥६॥

सरल भाव: आपकी शरण में आए शत्रुओं के परिवारों को भी आप अभय देने वाली हैं। तीनों लोकों के विरोधी असुरों के सिर पर आप अपना निर्मल शूल चलाने वाली हैं। देवताओं की दुंदुभियों की "दुमि-दुमि" गूँज इतनी तेज़ है कि तेज किरणों वाला सूर्य भी जैसे गूँज उठता है।

श्लोक 7

अयि निजहुङ्कृतिमात्रनिराकृतधूम्रविलोचनधूम्रशते
समरविशोषितशोणितबीजसमुद्भवशोणितबीजलते ।
शिवशिवशुम्भनिशुम्भमहाहवतर्पितभूतपिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥७॥

तोड़कर पढ़ें:
अयि निज-हुङ्कृति-मात्र-निराकृत-धूम्र-विलोचन-धूम्र-शते
समर-विशोषित-शोणित-बीज-समुद्भव-शोणित-बीज-लते
शिव-शिव-शुम्भ-निशुम्भ-महाहव-तर्पित-भूत-पिशाच-रते
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥७॥

सरल भाव: आपकी एक हुंकार से ही धूम्रलोचन असुर और उसके सैकड़ों सैनिक भस्म हो गए। युद्ध में आपने रक्तबीज के रक्त से जन्मने वाले असुरों को समाप्त कर दिया। शुम्भ-निशुम्भ के महायुद्ध में आपने भूत-पिशाचों को तृप्त किया।

श्लोक 8

धनुरनुषङ्गरणक्षणसङ्गपरिस्फुरदङ्गनटत्कटके
कनकपिशङ्गपृषत्कनिषङ्गरसद्भटशृङ्गहताबटुके ।
कृतचतुरङ्गबलक्षितिरङ्गघटद्बहुरङ्गरटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥८॥

तोड़कर पढ़ें:
धनुर-नुषङ्ग-रण-क्षण-सङ्ग-परिस्फुरद-ङ्ग-नटत्-कटके
कनक-पिशङ्ग-पृषत्क-निषङ्ग-रसद्-भट-शृङ्ग-हता-बटुके
कृत-चतुरङ्ग-बल-क्षिति-रङ्ग-घटद्-बहु-रङ्ग-रटद्-बटुके
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥८॥

सरल भाव: युद्ध के क्षण में धनुष की डोरी खींचते समय आपके हाथ के कंगन खनक उठते हैं। सोने जैसे चमकते आपके तीरों ने शत्रु-वीरों को गिरा दिया। आपने चारों अंगों वाली असुर-सेना को रणभूमि में बिछा दिया।

श्लोक 9

सुरललनाततथेयितथेयितथाभिनयोत्तरनृत्यरते
हासविलासहुलासमयिप्रणतार्तजनेऽमितप्रेमभरे ।
धिमिकिटधिक्कटधिक्कटधिमिधिमिघोषमृदङ्गनिनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥९॥

तोड़कर पढ़ें:
सुर-ललना-तत-थेयि-तथेयि-तथा-भिनयो-त्तर-नृत्य-रते
हास-विलास-हुलास-मयि-प्रणतार्त-जनेऽमित-प्रेम-भरे
धिमि-किट-धिक्कट-धिक्कट-धिमि-धिमि-घोष-मृदङ्ग-निनाद-रते
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥९॥

सरल भाव: देवांगनाएँ "थेयि-थेयि" की ताल पर नृत्य करती हैं और आप उस नृत्य में रमी रहती हैं। आपकी शरण में आए दुखी लोगों पर आपका अपार प्रेम है। "धिमि-किट-धिक्कट" की मृदंग-ध्वनि में आप आनंदित रहती हैं।

श्लोक 10

जय जय जप्यजयेजयशब्दपरस्तुतितत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमिझिङ्कृतनूपुरशिञ्जितमोहितभूतपते ।
नटितनटार्धनटीनटनायकनाटितनाट्यसुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१०॥

तोड़कर पढ़ें:
जय जय जप्य-जये-जय-शब्द-पर-स्तुति-तत्पर-विश्व-नुते
झण-झण-झिञ्झिमि-झिङ्कृत-नूपुर-शिञ्जित-मोहित-भूत-पते
नटित-नटार्ध-नटी-नट-नायक-नाटित-नाट्य-सुगान-रते
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥१०॥

सरल भाव: "जय हो, जय हो" कहकर स्तुति में लगा पूरा संसार आपकी वंदना करता है। आपके घुँघरुओं की "झण-झण" झनकार से भूतनाथ शिवजी भी मोहित हो जाते हैं। आप नटों, नटियों और नायकों के नाट्य और सुंदर गायन में रमी रहती हैं।

श्लोक 11

अयि सुमनःसुमनःसुमनःसुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनीरजनीरजनीरजनीरजनीकरवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥११॥

तोड़कर पढ़ें:
अयि सुमनः-सुमनः-सुमनः-सुमनः-सुमनोहर-कान्ति-युते
श्रित-रजनी-रजनी-रजनी-रजनी-रजनी-कर-वक्त्र-वृते
सुनयन-विभ्रमर-भ्रमर-भ्रमर-भ्रमर-भ्रमरा-धिपते
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥११॥

सरल भाव: आपकी कांति सुंदर फूलों जैसी मनमोहक है। आपका मुख चंद्रमा जैसा शीतल और सुंदर है। आपकी सुंदर आँखों की चंचलता ऐसी है कि भौंरे भी भ्रम में पड़ जाते हैं।

श्लोक 12

सहितमहाहवमल्लमतल्लिकमल्लितरल्लकमल्लरते
विरचितवल्लिकपल्लिकमल्लिकझिल्लिकभिल्लिकवर्गवृते ।
शितकृतफुल्लसमुल्लसितारुणतल्लजपल्लवसल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१२॥

तोड़कर पढ़ें:
सहित-महाहव-मल्ल-मतल्लिक-मल्लित-रल्लक-मल्ल-रते
विरचित-वल्लिक-पल्लिक-मल्लिक-झिल्लिक-भिल्लिक-वर्ग-वृते
शित-कृत-फुल्ल-समुल्लसिता-रुण-तल्लज-पल्लव-सल्ललिते
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥१२॥

सरल भाव: आप बड़े-बड़े वीरों के महायुद्ध में रमने वाली हैं। लताओं और फूलों से घिरे वन में आप वनवासी जनों के बीच विराजती हैं। खिले हुए लाल कोमल कोंपलों वाले वृक्षों के बीच आप अत्यंत सुशोभित होती हैं।

श्लोक 13

अविरलगण्डगलन्मदमेदुरमत्तमतङ्गजराजपते
त्रिभुवनभूषणभूतकलानिधिरूपपयोनिधिराजसुते ।
अयि सुदतीजनलालसमानसमोहनमन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१३॥

तोड़कर पढ़ें:
अविरल-गण्ड-गलन्मद-मेदुर-मत्त-मतङ्गज-राज-पते
त्रिभुवन-भूषण-भूत-कलानिधि-रूप-पयोनिधि-राज-सुते
अयि सुदती-जन-लालस-मानस-मोहन-मन्मथ-राज-सुते
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥१३॥

सरल भाव: आप मद बहाने वाले मतवाले हाथियों के राजा की भी स्वामिनी हैं। आप तीनों लोकों का आभूषण हैं, और आपका रूप चंद्रमा और समुद्र जैसा सुंदर है। आपका सौंदर्य सुंदर स्त्रियों के मन को भी मोह लेता है।

श्लोक 14

कमलदलामलकोमलकान्तिकलाकलितामलभाललते
सकलविलासकलानिलयक्रमकेलिचलत्कलहंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुलकुवलयमण्डलमौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१४॥

तोड़कर पढ़ें:
कमल-दला-मल-कोमल-कान्ति-कला-कलिता-मल-भाल-लते
सकल-विलास-कला-निलय-क्रम-केलि-चलत्-कल-हंस-कुले
अलि-कुल-सङ्कुल-कुवलय-मण्डल-मौलि-मिलद्-बकुला-लि-कुले
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥१४॥

सरल भाव: आपका मस्तक कमल की पंखुड़ी जैसी निर्मल और कोमल कांति से चमकता है। आप सब कलाओं का घर हैं और आपकी चाल हंसों के झुंड जैसी सुंदर है। भौंरों से भरे नीले कमलों और बकुल के फूलों की माला से आपका मुकुट सजा है।

श्लोक 15

करमुरलीरववर्जितकूजितलज्जितकोकिलमञ्जुमते
मिलितपुलिन्दमनोहरगुञ्जितरञ्जितशैलनिकुञ्जगते ।
निजगणभूतमहाशबरीगणरङ्गणसम्भृतकेलिरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१५॥

तोड़कर पढ़ें:
कर-मुरली-रव-वर्जित-कूजित-लज्जित-कोकिल-मञ्जु-मते
मिलित-पुलिन्द-मनोहर-गुञ्जित-रञ्जित-शैल-निकुञ्ज-गते
निज-गण-भूत-महा-शबरी-गण-रङ्गण-सम्भृत-केलि-रते
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥१५॥

सरल भाव: आपके हाथ की मुरली की मधुर ध्वनि से कोयल भी लज्जित हो जाती है। पर्वतों की निकुंजों में वनवासी जनों के सुंदर गुंजन के बीच आप विचरती हैं। अपने गणों और वनवासिनी स्त्रियों के साथ आप आनंद-क्रीड़ा में रमी रहती हैं।

श्लोक 16

कटितटपीतदुकूलविचित्रमयूखतिरस्कृतचन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुरमौलिमणिस्फुरदंशुलसन्नखचन्द्ररुचे ।
जितकनकाचलमौलिपदोर्जितनिर्भरकुञ्जरकुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१६॥

तोड़कर पढ़ें:
कटि-तट-पीत-दुकूल-विचित्र-मयूख-तिरस्कृत-चन्द्र-रुचे
प्रणत-सुरासुर-मौलि-मणि-स्फुरदं-शुल-सन्नख-चन्द्र-रुचे
जित-कनका-चल-मौलि-पदोर्जित-निर्भर-कुञ्जर-कुम्भ-कुचे
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥१६॥

सरल भाव: आपके पीले रेशमी वस्त्र की रंग-बिरंगी किरणों के सामने चंद्रमा की चमक भी फीकी पड़ जाती है। झुके हुए देवताओं और असुरों के मुकुट की मणियों की किरणें आपके नखों पर पड़कर चमकती हैं। आपकी शोभा ने सोने के पर्वत सुमेरु और विशाल हाथी के मस्तक की शोभा को भी जीत लिया है।

श्लोक 17

विजितसहस्रकरैकसहस्रकरैकसहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारकसङ्गरतारकसङ्गरतारकसूनुसुते ।
सुरथसमाधिसमानसमाधिसमाधिसमाधिसुजातरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१७॥

तोड़कर पढ़ें:
विजित-सहस्र-करैक-सहस्र-करैक-सहस्र-करैक-नुते
कृत-सुर-तारक-सङ्गर-तारक-सङ्गर-तारक-सूनु-सुते
सुरथ-समाधि-समान-समाधि-समाधि-समाधि-सुजात-रते
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥१७॥

सरल भाव: सहस्र किरणों वाले सूर्य जैसे तेजस्वी भी आपकी स्तुति करते हैं। आप तारकासुर से देवताओं को पार लगाने वाले और तारकासुर से युद्ध करने वाले पुत्र की माता हैं। राजा सुरथ और समाधि वैश्य की एकाग्र तपस्या से आप प्रसन्न हुईं।

श्लोक 18

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१८॥

तोड़कर पढ़ें:
पद-कमलं करुणा-निलये वरिवस्यति यो-ऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमला-निलये कमला-निलयः स कथं न भवेत्
तव पद-मेव परम्-पद-मित्य-नुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥१८॥

सरल भाव: हे करुणा की निवास! जो रोज़ आपके चरणकमलों की सेवा करता है, वह लक्ष्मी का निवास क्यों न बने? आपके चरण ही परम पद हैं, यह सोचकर जो उनका ध्यान करता है, उसे क्या नहीं मिल सकता?

श्लोक 19

कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवं
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवं
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१९॥

तोड़कर पढ़ें:
कनक-लसत्-कल-सिन्धु-जलैर-नुषिञ्चति ते-गुण-रङ्ग-भुवं
भजति स किं न शची-कुच-कुम्भ-तटी-परिरम्भ-सुखानुभवम्
तव चरणं शरणं करवाणि नतामर-वाणि निवासि शिवं
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥१९॥

सरल भाव: जो सुनहरे घड़ों में पवित्र जल लेकर आपके गुणों की रंगभूमि का अभिषेक करता है, वह इन्द्र जैसे स्वर्ग-सुख को क्यों न पाए? हे देवताओं की वाणी की देवी! मैं आपके चरणों की शरण लेता हूँ। आप मुझे कल्याण में निवास दीजिए।

श्लोक 20

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दुमुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥२०॥

तोड़कर पढ़ें:
तव विमले-न्दु-कुलं वदने-न्दु-मलं सकलं ननु कूल-यते
किमु पुरुहूत-पुरी-न्दु-मुखी सुमुखी-भिरसौ विमुखी-क्रियते
मम तु मतं शिव-नाम-धने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥२०॥

सरल भाव: आपके चंद्र जैसे मुख की शोभा के सामने चंद्रमा की सारी कलाएँ भी फीकी हैं। मेरा तो यही मत है कि शिव का नाम ही मेरा सच्चा धन है। हे माँ, आपकी कृपा हो तो क्या नहीं हो सकता?

श्लोक 21

अयि मयि दीनदयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥२१॥

तोड़कर पढ़ें:
अयि मयि दीन-दयालु-तया कृपयैव त्वया भवि-तव्य-मुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानु-मिता-सिरते
यदुचित-मत्र भवत्यु-ररी-कुरुता-दुरु-तापम-पाकुरुते
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते ॥२१॥

सरल भाव: हे उमा! मुझ दीन पर आपको दया करनी ही चाहिए। हे जगत की माता, जैसे आप कृपा करती आई हैं, वैसे ही अब भी कीजिए। जो आपको उचित लगे, वही कीजिए और मेरे भारी कष्टों को दूर कीजिए।

फलश्रुति (पाठ का फल)

स्तुतिमिमां स्तिमितः सुसमाधिना नियमतो यमतोऽनुदिनं पठेत् ।
परमया रमया स निषेव्यते परिजनोऽरिजनोऽपि च तं भजेत् ॥२२॥

तोड़कर पढ़ें:
स्तुति-मिमां स्तिमितः सु-समाधिना नियमतो यमतो-ऽनुदिनं पठेत्
परमया रमया स निषेव्यते परि-जनो-ऽरि-जनो-ऽपि च तं भजेत् ॥२२॥

सरल अर्थ: इस श्लोक में कहा गया है कि जो शांत मन से, एकाग्र होकर और नियम के साथ रोज़ इस स्तुति का पाठ करता है, उसे श्रेष्ठ लक्ष्मी की सेवा मिलती है, और उसके अपने ही नहीं, विरोधी लोग भी उसका आदर करने लगते हैं। यह श्रद्धा की बात है, कोई पक्का वादा नहीं।

इति सङ्कटास्तुतिः समाप्ता ।

कठिन शब्दों के आसान अर्थ

शब्दआसान अर्थ
गिरिनन्दिनीपर्वत की पुत्री, पार्वती
शितिकण्ठनीले कंठ वाले शिवजी
जिष्णुइन्द्र का एक नाम
कपर्दिनीजटाजूट वाली
शैलसुतापर्वत की पुत्री
दनुज, दितिसुतअसुर, दानव
निर्जरदेवता
प्रमथशिवजी के गण
रक्तबीज (शोणितबीज)एक असुर, जिसकी खून की बूँदों से नए असुर पैदा होते थे
धूम्रविलोचनएक असुर सेनापति
चतुरङ्ग बलहाथी, घोड़े, रथ और पैदल की चार अंगों वाली सेना
नूपुरपैरों के घुँघरू
पुलिन्द, शबरवनवासी समुदाय
दुकूलरेशमी वस्त्र
कनकाचलसोने का पर्वत, सुमेरु
तारकतारकासुर नामक असुर
सुरथ, समाधिदुर्गा सप्तशती की कथा के राजा सुरथ और वैश्य समाधि
परम्पदसबसे ऊँचा पद
रमालक्ष्मी

चार दिन में याद करने का तरीका

  • पहला दिन: आखिरी पंक्ति "जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते" पक्की करें। फिर श्लोक 1 और 2।
  • दूसरा दिन: श्लोक 3 से 7। वे कथा के क्रम में हैं, इसलिए अर्थ याद रखने पर शब्द आसानी से याद होते हैं।
  • तीसरा दिन: श्लोक 8 से 14। सबसे लंबे और ध्वनि वाले शब्द इन्हीं में हैं, इसलिए तोड़ी हुई पंक्तियों से पढ़ें।
  • चौथा दिन: श्लोक 15 से 21 और फलश्रुति, फिर पूरा एक बार।
  • हर श्लोक की पहली पंक्ति याद हो जाए तो बाकी अपने आप याद आने लगती है।

पाठ कैसे करें

  • कब: सुबह स्नान के बाद, या शाम को। नवरात्र और शुक्रवार को देवी के पाठ की परंपरा है। तिथि और समय स्थान के अनुसार भिन्न हो सकता है।
  • कैसे: स्वच्छ स्थान पर माँ दुर्गा के चित्र या मूर्ति के सामने दीपक जलाकर बैठें और धीरे-धीरे पढ़ें।
  • कितनी बार: एक बार पूरा पाठ। इससे ज़्यादा का नियम कुल-परंपरा या गुरु के अनुसार।
  • सावधानी: जल्दबाज़ी न करें। लंबे जुड़े शब्दों को टुकड़ों में तोड़कर पढ़ना अशुद्ध पाठ से बेहतर है।

महत्व

सङ्कटा स्तुति की सबसे बड़ी खासियत इसकी लय है। हर श्लोक के अंत में दोहराई जाने वाली पंक्ति इसे गाने में आसान बना देती है। इसमें माँ दुर्गा की शक्ति, करुणा और सौंदर्य, तीनों का वर्णन है, और अंत में भक्त अपनी दीनता मानकर माँ की कृपा माँगता है। श्रद्धालु इसे संकट के समय मन को सहारा देने के लिए पढ़ते हैं। इसे चमत्कार या गारंटी की तरह नहीं, श्रद्धा और एकाग्रता के साधन की तरह देखना चाहिए। किसी भी वास्तविक संकट में आवश्यक सहायता और विशेषज्ञ की सलाह लेना भी ज़रूरी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. सङ्कटा स्तुति में कितने श्लोक हैं?
इस पाठ में 21 श्लोक और 1 फलश्रुति श्लोक है।

2. क्या यह महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र ही है?
हाँ। इसे "अयि गिरिनन्दिनि" और "महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र" के नाम से भी जाना जाता है। हमारे स्रोत की पुस्तक में इसे "सङ्कटास्तुति" नाम दिया गया है।

3. इसे किसने रचा?
इस बारे में अलग-अलग मत मिलते हैं। हमारे स्रोत के पन्ने पर रचयिता का नाम नहीं मिलता, इसलिए अनुमान से कोई नाम नहीं लिखा गया है।

4. पाठ में कितना समय लगता है?
धीरे-धीरे पढ़ने में लगभग 12 से 15 मिनट।

5. शुरुआत करने वाले क्या करें?
पहले आखिरी पंक्ति पक्की करें, फिर रोज़ 4-5 श्लोक जोड़ते जाएँ। उच्चारण किसी जानकार या ऑडियो से मिला लें।

पाठ-आधार: सङ्कटास्तुतिः, यज्ञ मार्तण्ड (पं. कुशेश्वर झा), पृ. 331 से 334।

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✍
श्रवण झा

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