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माँ दुर्गा का दिव्य स्वरूप और देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र का धार्मिक कवर चित्र
❖ स्तोत्र

देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र | मूल पाठ, सरल हिंदी अर्थ और उच्चारण

देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र के 12 संस्कृत श्लोक, सरल हिंदी अर्थ और शुद्ध उच्चारण पढ़ें। माँ भगवती से पूजा में हुई भूलों की क्षमा माँगने की प्रार्थना जानें।

श्रवण झा 25 अक्टूबर 2026⏱ 12 मिनट पढ़ें👁 6

परिचय

देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र माँ भगवती से क्षमा माँगने की प्रार्थना है। इसमें भक्त सीधे अपनी माँ से कहता है: "मुझे न मंत्र आते हैं, न पूजा की विधि, न मैंने ठीक से सेवा की। फिर भी मैं आपका ही बालक हूँ, मेरी भूल क्षमा कर दीजिए।" इसमें 12 श्लोक हैं। श्लोक 2, 3 और 4 की आखिरी पंक्ति एक जैसी है: "कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति", यानी बेटा बुरा हो सकता है, पर माँ कभी बुरी नहीं होती। परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है, और हमारे स्रोत की पुस्तक में भी यही नाम लिखा है। इस लेख में हर श्लोक मूल रूप में, फिर तोड़कर, और उसके बाद आसान हिंदी अर्थ के साथ दिया गया है।

इस स्तोत्र की बनावट (एक नज़र में)

  • श्लोक 1: "मैं कुछ नहीं जानता, बस इतना जानता हूँ कि आपके पीछे चलने से सब कष्ट दूर होते हैं।"
  • श्लोक 2 से 4: भूल की क्षमा। हर श्लोक के अंत में वही पंक्ति: "कुपुत्र हो सकता है, कुमाता नहीं।"
  • श्लोक 5 से 7: भक्त की सच्ची स्थिति और माँ की शरण का महत्व।
  • श्लोक 8: भक्त क्या नहीं माँगता और क्या माँगता है।
  • श्लोक 9 से 11: माँ की करुणा पर भरोसा।
  • श्लोक 12: अंतिम प्रार्थना: "जैसा उचित लगे, वैसा कीजिए।"

तोड़कर पढ़ने का आसान तरीका

हर श्लोक पहले मूल रूप में दिया है, उसके नीचे वही श्लोक छोटे टुकड़ों में तोड़कर दिया है। हाइफ़न (-) का मतलब है हल्का रुकना। पहले टूटी हुई पंक्तियाँ धीरे-धीरे पढ़ें, फिर वही पंक्ति बिना रुके जोड़कर बोलें। तोड़ने में कोई अक्षर बदला या हटाया नहीं गया है।

उच्चारण के चार आसान सूत्र

  1. ऽ (अवग्रह): "तरलोऽहं" और "मदीयोऽयं" में ऽ का मतलब है कि वहाँ एक 'अ' दबा हुआ है। इन्हें "तरलो-हं" और "मदीयो-यं" की तरह हल्का जोड़कर बोलें।
  2. आह्वानं: इसमें "ह्वा" है। इसे "ह्-वा" की तरह तोड़कर बोलें: आ-ह्-वा-नं।
  3. ज्ञात्वा, विज्ञान: शुद्ध उच्चारण में "ज्ञ" को "ज्-ञ" की तरह बोलते हैं। बोलचाल वाला "ग्य" यहाँ नहीं बोलना है।
  4. लंबी पंक्तियाँ: श्लोक 1 से 8 की पंक्तियाँ लंबी हैं। पहले आधी पंक्ति पढ़ें, फिर पूरी।

मूल पाठ और सरल अर्थ

श्लोक 1

न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥१॥

तोड़कर पढ़ें:
न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुति-कथाः
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्-त्वदनुसरणं क्लेश-हरणम् ॥१॥

सरल अर्थ: हे माँ! मुझे न मंत्र आता है, न यंत्र, न स्तुति करना। न मुझे आपको बुलाना आता है, न ध्यान करना, न स्तुति की कथाएँ। न मुझे पूजा की मुद्राएँ आती हैं, और रोकर पुकारना भी नहीं आता। बस इतना जानता हूँ कि आपके पीछे-पीछे चलने से सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।

श्लोक 2

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥२॥

तोड़कर पढ़ें:
विधेरज्ञानेन द्रविण-विरहेणा-लसतया
विधेया-शक्यत्वात्-तव चरणयोर्-या च्युतिरभूत्
तदेतत्-क्षन्तव्यं जननि सकलो-द्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचि-दपि कुमाता न भवति ॥२॥

सरल अर्थ: पूजा की विधि न जानने, धन की कमी, आलस्य और सब कुछ ठीक से न कर पाने के कारण आपके चरणों की सेवा में जो चूक हुई, हे सबका उद्धार करने वाली कल्याणकारी माँ, उसे क्षमा कीजिए। संसार में बेटा बुरा निकल सकता है, पर माँ कभी बुरी नहीं होती।

श्लोक 3

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥३॥

तोड़कर पढ़ें:
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरल-तरलोऽहं तव सुतः
मदीयोऽयं त्यागः समुचित-मिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचि-दपि कुमाता न भवति ॥३॥

सरल अर्थ: हे माँ! धरती पर आपके बहुत से सीधे-सरल पुत्र हैं। उनमें मैं एक बहुत चंचल और अस्थिर पुत्र हूँ। फिर भी मुझे छोड़ देना आपके लिए उचित नहीं है। बेटा बुरा हो सकता है, पर माँ कभी बुरी नहीं होती।

श्लोक 4

जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥४॥

तोड़कर पढ़ें:
जगन्-मातर्-मातस्-तव चरण-सेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविण-मपि भूयस्-तव मया
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्-प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचि-दपि कुमाता न भवति ॥४॥

सरल अर्थ: हे जगत की माता! मैंने न आपके चरणों की सेवा की, न आपको बहुत सा धन अर्पित किया। फिर भी आप मुझ पर जो अनुपम स्नेह रखती हैं, वह इसी बात का प्रमाण है कि बेटा बुरा हो सकता है, पर माँ कभी बुरी नहीं होती।

श्लोक 5

परित्यक्ता देवा विविधविधिसेवाकुलतया
मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥५॥

तोड़कर पढ़ें:
परित्यक्ता देवा विविध-विधि-सेवा-कुलतया
मया पञ्चाशीते-रधिक-मपनीते तु वयसि
इदानीं चेन्-मातस्-तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदर-जननि कं यामि शरणम् ॥५॥

सरल अर्थ: अलग-अलग देवताओं की अलग-अलग पूजा-विधियों में उलझकर मैं घबरा गया और मैंने उन्हें छोड़ दिया। मेरी आयु पचासी वर्ष से भी ऊपर बीत चुकी है। हे गणेशजी की माँ! अब अगर आपकी कृपा भी न हुई, तो मैं बिना किसी सहारे के किसकी शरण में जाऊँ?

श्लोक 6

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥६॥

तोड़कर पढ़ें:
श्वपाको जल्पाको भवति मधु-पाको-पम-गिरा
निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटि-कनकैः
तवापर्णे कर्णे विशति मनु-वर्णे फल-मिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जप-विधौ ॥६॥

सरल अर्थ: हे अपर्णा (पार्वती)! इस श्लोक में कहा गया है कि आपके मंत्र का अक्षर कान में पड़ते ही कठोर बोलने वाला भी मीठी वाणी वाला हो जाता है, और बहुत गरीब भी निडर होकर करोड़ों की संपत्ति के बीच रहता है। जब मंत्र के एक अक्षर का ऐसा प्रभाव बताया गया है, तो जप की पूरी विधि का फल कौन जान सकता है?

श्लोक 7

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥७॥

तोड़कर पढ़ें:
चिता-भस्मा-लेपो गरल-मशनं दिक्-पट-धरो
जटा-धारी कण्ठे भुजग-पति-हारी पशु-पतिः
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैक-पदवीं
भवानि त्वत्-पाणि-ग्रहण-परिपाटी-फल-मिदम् ॥७॥

सरल अर्थ: शिवजी चिता की राख लगाते हैं, विष पीते हैं, दिशाओं को ही वस्त्र बनाकर रहते हैं, जटाएँ रखते हैं, गले में नागराज का हार पहनते हैं और हाथ में कपाल रखते हैं। वे पशुओं और भूतगणों के स्वामी हैं। फिर भी उन्हें जो "जगत के ईश्वर" का पद मिला है, हे भवानी! वह आपसे विवाह होने का ही फल है।

श्लोक 8

न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥८॥

तोड़कर पढ़ें:
न मोक्षस्या-काङ्क्षा भव-विभव-वाञ्छापि च न मे
न विज्ञाना-पेक्षा शशि-मुखि सुखेच्छापि न पुनः
अतस्-त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥८॥

सरल अर्थ: हे चंद्रमुखी माँ! मुझे न मोक्ष की इच्छा है, न संसार के वैभव की, न बड़े ज्ञान की, न सुख की। इसलिए मैं आपसे बस यह माँगता हूँ कि मेरी सारी आयु मृडानी, रुद्राणी, शिव-शिव, भवानी, इन नामों को जपते हुए बीते।

श्लोक 9

नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः ।
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥

तोड़कर पढ़ें:
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रुक्ष-चिन्तन-परैर्-न कृतं वचोभिः
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपा-मुचित-मम्ब परं तवैव ॥९॥

सरल अर्थ: हे श्यामा माँ! मैंने नियम से, अनेक उपचारों के साथ आपकी पूजा नहीं की। यही नहीं, कठोर विचारों में डूबे अपने शब्दों से मैंने क्या-क्या बुरा नहीं किया। फिर भी यदि आप मुझ अनाथ पर थोड़ी भी कृपा रखती हैं, तो हे माँ, ऐसा करना केवल आपके ही योग्य है।

श्लोक 10

आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥

तोड़कर पढ़ें:
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि
नैतच्-छठत्वं मम भावयेथाः
क्षुधा-तृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥

सरल अर्थ: हे दुर्गा, हे करुणा के सागर की स्वामिनी! जब मैं मुसीबत में डूबता हूँ, तभी आपको याद करता हूँ। इसे मेरी चालाकी मत समझिएगा। भूख और प्यास से बेहाल बच्चे अपनी माँ को ही तो याद करते हैं।

श्लोक 11

जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।
अपराधपरम्परावृतं न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥११॥

तोड़कर पढ़ें:
जगदम्ब विचित्र-मत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्-मयि
अपराध-परम्परा-वृतं न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥११॥

सरल अर्थ: हे जगदम्बा! अगर आपकी पूरी करुणा मुझ पर है, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? गलतियों से घिरे बेटे की भी माँ कभी उपेक्षा नहीं करती।

श्लोक 12

मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु ॥१२॥

तोड़कर पढ़ें:
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु ॥१२॥

सरल अर्थ: मेरे जैसा गलती करने वाला कोई नहीं, और आपके जैसा पापों को हरने वाला भी कोई नहीं। हे महादेवी! यह जानकर जैसा आपको उचित लगे, वैसा कीजिए।

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् ।

कठिन शब्दों के आसान अर्थ

शब्दआसान अर्थ
आह्वानबुलाना, आमंत्रित करना
द्रविणधन
विधेयाशक्यत्वजो करना चाहिए, उसे कर पाने की असमर्थता
च्युतिचूक, भूल
क्षन्तव्यक्षमा करने योग्य
कुपुत्र, कुमाताबुरा पुत्र, बुरी माता
तरलचंचल
लम्बोदरगणेशजी का नाम
निरालम्बबिना सहारे का
अपर्णापार्वतीजी का एक नाम
पाणिग्रहणविवाह
दिक्पटदिशाएँ ही वस्त्र
शशिमुखिचंद्रमा जैसे मुख वाली
मृडानी, रुद्राणी, भवानीदेवी पार्वती के नाम
श्यामासाँवले रंग वाली, देवी का एक नाम
करुणार्णवकरुणा का सागर
शठत्वचालाकी, छल
पापघ्नीपापों का नाश करने वाली

तीन दिन में याद करने का तरीका

  • पहला दिन: श्लोक 1 से 4। श्लोक 2, 3 और 4 की आखिरी पंक्ति एक जैसी है, इसलिए पहले उसे पक्का करें: "कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति"।
  • दूसरा दिन: श्लोक 5 से 8।
  • तीसरा दिन: श्लोक 9 से 12, फिर पूरा एक बार शुरू से अंत तक।
  • हर श्लोक का अर्थ एक बार पढ़ लें। अर्थ पता हो तो शब्द जल्दी याद रहते हैं।

पाठ कैसे करें

  • कब: देवी की पूजा के बाद, या सुबह-शाम शांत मन से। नवरात्र और शुक्रवार को देवी के पाठ की परंपरा है। तिथि और समय स्थान के अनुसार भिन्न हो सकता है।
  • कैसे: स्वच्छ स्थान पर देवी के चित्र या मूर्ति के सामने बैठें। दीपक जलाएँ और धीरे-धीरे पढ़ें।
  • कितनी बार: एक बार पूरा पाठ। इससे ज़्यादा का नियम कुल-परंपरा या गुरु के अनुसार।
  • सावधानी: जल्दबाज़ी न करें। यह माँ से बात करने जैसा पाठ है, इसलिए भाव के साथ धीरे और साफ़ पढ़ें।

महत्व

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी बात इसकी सादगी है। इसमें कोई बड़ी माँग नहीं, कोई कठिन विधि नहीं। भक्त अपनी कमियाँ मानकर माँ की शरण लेता है। इसी कारण बहुत से श्रद्धालु पूजा के अंत में इसे पढ़ते हैं, ताकि पूजा में हुई किसी भी भूल की क्षमा माँग सकें। इसे चमत्कार या गारंटी की तरह नहीं, बल्कि विनम्र प्रार्थना की तरह देखना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?
इस पाठ में 12 श्लोक हैं।

2. इसका क्या अर्थ है?
"देवी से अपराधों की क्षमा माँगने वाला स्तोत्र"। इसमें भक्त पूजा में हुई अपनी सारी भूलों की क्षमा माँगता है।

3. इसे किसने रचा?
परंपरा के अनुसार आदि शंकराचार्य ने। हमारे स्रोत की पुस्तक में भी अंतिम पंक्ति में यही नाम है।

4. इसे कब पढ़ा जाता है?
कई लोग देवी की पूजा या पाठ के अंत में पढ़ते हैं। अपनी परंपरा या गुरु के अनुसार चलना अच्छा है।

5. पाठ में कितना समय लगता है?
धीरे-धीरे पढ़ने में लगभग 8 से 10 मिनट।

6. शुरुआत करने वाले क्या करें?
पहले श्लोक 2, 3, 4 की आखिरी पंक्ति पक्की करें, फिर अर्थ समझें, तोड़ी हुई पंक्तियाँ पढ़ें और किसी जानकार या ऑडियो से उच्चारण मिला लें।

पाठ-आधार: देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्, स्तोत्ररत्नावली (शक्तिस्तोत्राणि), पृ. 50 से 54।

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✍
श्रवण झा

यह लेख संपादकीय नीति के अनुसार तैयार किया गया है। कोई त्रुटि दिखे तो हमें बताएँ · संपादकीय नीति

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