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तांडव मुद्रा में भगवान शिव, जटाओं से बहती गंगा और सिर पर चंद्रमा
❖ स्तोत्र

शिव तांडव स्तोत्र अर्थ सहित – सरल हिंदी में

रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र के 15 श्लोक शुद्ध संस्कृत पाठ में, हर श्लोक के नीचे आसान हिंदी अर्थ के साथ। साथ में उच्चारण के सूत्र, कठिन शब्दों की तालिका और तीन दिन में याद करने का तरीका भी है।

श्रवण झा 24 अक्टूबर 2026⏱ 12 मिनट पढ़ें👁 20

परिचय

शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव की स्तुति है। परंपरा इसे लंकापति रावण की रचना मानती है। इस लेख में दिया गया पाठ 15 श्लोकों का है। पहले श्लोक में शिवजी के तांडव नृत्य की झलक है, बीच के श्लोकों में उनके स्वरूप और महिमा का गान है, और अंत में भक्त की प्रार्थना और पाठ का फल है। हर श्लोक के नीचे उसका भाव बहुत आसान हिंदी में लिखा गया है, ताकि संस्कृत न जानने वाला भी पूरा स्तोत्र समझकर पढ़ सके।

इस स्तोत्र की बनावट (एक नज़र में)

  • श्लोक 1: शुरुआत सीधे तांडव से। जटाओं से बहती गंगा, गले में साँप, डमरू की ध्वनि।
  • श्लोक 2 से 10: शिवजी के रूप का वर्णन: गंगा, अग्नि, चंद्रमा, साँप, हाथी की खाल, नीला कंठ। साथ ही उनके विनाशकारी और कल्याणकारी दोनों रूपों की स्तुति।
  • श्लोक 11: तांडव की गूँज: साँपों की फुफकार, ललाट की अग्नि, मृदंग की ताल।
  • श्लोक 12 और 13: भक्त की अपनी इच्छा: "मैं कब सब में समान भाव रखूँगा?" और "मैं कब शांत मन से 'शिव' नाम जपूँगा?"
  • श्लोक 14 और 15: पाठ करने का फल, यानी फलश्रुति।

उच्चारण के चार आसान सूत्र

  1. ऽ (अवग्रह): यह बताता है कि यहाँ एक 'अ' दबा हुआ है। "गलेऽवलम्ब्य" को "गले-वलम्ब्य" की तरह हल्का सा जोड़कर बोलें।
  2. विसर्ग (ः): पिछले स्वर के बाद हल्की 'ह' जैसी ध्वनि। "शिवः" को "शिवह" जैसा हल्का बोलें, झटके से नहीं।
  3. संयुक्त अक्षर: "ज्ज्वल", "द्ध", "च्छिद" को तोड़कर धीरे-धीरे बोलें: ज्-ज्-वल, द्-ध, च्-छिद।
  4. लंबी पंक्तियाँ: शब्द जुड़े हुए हैं (जैसे "धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर")। पहले इन्हें अर्धविराम से 3-4 टुकड़ों में पढ़ें, फिर जोड़कर।

तोड़कर पढ़ने का आसान तरीका

हर श्लोक पहले मूल रूप में दिया है, उसके ठीक नीचे वही श्लोक छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर दिया है। हर टुकड़े के बीच का चिह्न (-) यह बताता है कि यहाँ हल्का रुकना है। पहले तोड़ी हुई पंक्तियाँ धीरे-धीरे पढ़ें, फिर वही पंक्ति बिना रुके जोड़कर बोलें। तोड़ने में कोई अक्षर बदला या हटाया नहीं गया है, सिर्फ़ रुकने की जगह दिखाई गई है।

मूल पाठ और सरल अर्थ

श्लोक 1

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥

तोड़कर पढ़ें:
जटा-टवी-गलज्-जल-प्रवाह-पावित-स्थले
गले-ऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्ग-तुङ्ग-मालिकाम्
डमड्-डमड्-डमड्-डमन्-निनाद-वड्-डमर्-वयं
चकार चण्ड-ताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥1॥

सरल अर्थ: शिवजी की जटाएँ घने जंगल जैसी हैं। उनसे बहती गंगा की धारा ने आसपास की भूमि को पवित्र कर दिया है। गले में साँपों की लंबी माला लटक रही है। डमरू से "डम-डम" की आवाज़ उठ रही है और वे प्रचंड तांडव कर रहे हैं। वे शिव हमारा कल्याण करें।

श्लोक 2

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥

तोड़कर पढ़ें:
जटा-कटाह-सम्भ्रम-भ्रमन्-निलिम्प-निर्झरी
विलोल-वीचि-वल्लरी-विराजमान-मूर्द्धनि
धगद्-धगद्-धगज्-ज्वलल्-ललाट-पट्ट-पावके
किशोर-चन्द्र-शेखरे रतिः प्रति-क्षणं मम ॥2॥

सरल अर्थ: जटाओं के घेरे में गंगा की लहरें घूमती हुई उनके सिर की शोभा बढ़ा रही हैं। माथे पर अग्नि "धग-धग" जल रही है और सिर पर नन्हा चंद्रमा सजा है। ऐसे शिव में मेरा प्रेम हर पल बना रहे।

श्लोक 3

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

तोड़कर पढ़ें:
धराधरेन्द्र-नन्दिनी-विलास-बन्धु-बन्धुर
स्फुरद्-दिगन्त-सन्तति-प्रमोद-मान-मानसे
कृपा-कटाक्ष-धोरणी-निरुद्ध-दुर्धरा-पदि
क्वचिद्-दिगम्बरे मनो विनोद-मेतु वस्तुनि ॥3॥

सरल अर्थ: जो पर्वतराज की बेटी पार्वती के साथ आनंद से रहते हैं, जिनके मन में सब दिशाओं और सब प्राणियों के लिए प्रसन्नता है, और जिनकी कृपा-भरी नज़र से बड़ी से बड़ी मुसीबत भी रुक जाती है, उन दिगंबर शिव में मेरा मन रम जाए।

श्लोक 4

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥

तोड़कर पढ़ें:
जटा-भुजङ्ग-पिङ्गल-स्फुरत्-फणा-मणि-प्रभा
कदम्ब-कुङ्कुम-द्रव-प्रलिप्त-दिग्-वधू-मुखे
मदान्ध-सिन्धुर-स्फुरत्-त्वगुत्तरीय-मेदुरे
मनो विनोद-मद्भुतं बिभर्तु भूत-भर्तरि ॥4॥

सरल अर्थ: जटाओं में लिपटे साँपों के फनों की मणियों से पीली-लाल रोशनी चारों दिशाओं में फैल रही है, मानो दिशाओं के मुख पर केसर लगा हो। मतवाले हाथी की खाल को शिवजी ने चादर की तरह ओढ़ा है। सब प्राणियों के उन स्वामी में मेरा मन अद्भुत आनंद पाए।

श्लोक 5

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥

तोड़कर पढ़ें:
सहस्र-लोचन-प्रभृत्य-शेष-लेख-शेखर
प्रसून-धूलि-धोरणी-विधूसराङ्घ्रि-पीठ-भूः
भुजङ्ग-राज-मालया निबद्ध-जाट-जूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोर-बन्धु-शेखरः ॥5॥

सरल अर्थ: इंद्र जैसे सारे देवता जब शिवजी को प्रणाम करते हैं, तो उनके मुकुट के फूलों की धूल शिवजी के चरणों की चौकी पर बिखर जाती है। नागराज की माला से जिनकी जटाएँ बँधी हैं और जिनके सिर पर चंद्रमा है, वे शिव हमें लंबे समय तक सुख-संपदा दें।

श्लोक 6

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः ॥६॥

तोड़कर पढ़ें:
ललाट-चत्वर-ज्वलद्-धनञ्जय-स्फुलिङ्ग-भा
निपीत-पञ्च-सायकं नमन्-निलिम्प-नायकम्
सुधा-मयूख-लेखया विराजमान-शेखरं
महा-कपालि-सम्पदे शिरो-जटाल-मस्तु नः ॥6॥

सरल अर्थ: माथे की अग्नि की चिंगारी से जिन्होंने कामदेव को भस्म कर दिया, जिन्हें इंद्र भी झुककर प्रणाम करते हैं, और जिनके मस्तक पर चंद्रमा की किरण सजी है, उन जटाधारी शिव की कृपा से हमें संपदा मिले।

श्लोक 7

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥

तोड़कर पढ़ें:
कराल-भाल-पट्टिका-धगद्-धगद्-धगज्-ज्वल
द्धनञ्जयाहुती-कृत-प्रचण्ड-पञ्च-सायके
धराधरेन्द्र-नन्दिनी-कुचाग्र-चित्र-पत्रक
प्रकल्पनैक-शिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्-मम ॥7॥

सरल अर्थ: जिनके विशाल माथे की धधकती अग्नि ने कामदेव के प्रचंड बाणों को स्वाहा कर दिया, और जो पार्वतीजी के श्रृंगार की सुंदर रचना करने वाले अकेले कलाकार हैं, उन तीन नेत्रों वाले शिव में मेरा प्रेम रहे।

श्लोक 8

नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥८॥

तोड़कर पढ़ें:
नवीन-मेघ-मण्डली-निरुद्ध-दुर्धर-स्फुर
त्कुहू-निशीथिनी-तमः प्रबन्ध-बद्ध-कन्धरः
निलिम्प-निर्झरी-धरस्-तनोतु कृत्ति-सिन्धुरः
कला-निधान-बन्धुरः श्रियं जगद्-धुरन्धरः ॥8॥

सरल अर्थ: जिनका कंठ अमावस्या की रात के घने अंधेरे और काले बादलों जैसा गहरा है, जो गंगा को धारण करते हैं, हाथी की खाल पहनते हैं, चंद्रमा से सुंदर लगते हैं और पूरे जगत का भार उठाते हैं, वे शिव हमें संपत्ति दें।

श्लोक 9

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥९॥

तोड़कर पढ़ें:
प्रफुल्ल-नील-पङ्कज-प्रपञ्च-कालिम-प्रभा
वलम्बि-कण्ठ-कन्दली-रुचि-प्रबद्ध-कन्धरम्
स्मर-च्छिदं पुर-च्छिदं भव-च्छिदं मख-च्छिदं
गज-च्छिदान्धक-च्छिदं तमन्तक-च्छिदं भजे ॥9॥

सरल अर्थ: जिनका कंठ खिले हुए नीले कमलों की श्याम आभा जैसा चमकता है, और जिन्होंने कामदेव, त्रिपुरासुर, संसार के बंधन, दक्ष का यज्ञ, गजासुर, अंधकासुर और यमराज का अंत किया, मैं उन शिव को भजता हूँ।

श्लोक 10

अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी-
रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम् ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥

तोड़कर पढ़ें:
अखर्व-सर्व-मङ्गला-कला-कदम्ब-मञ्जरी
रस-प्रवाह-माधुरी-विजृम्भणा-मधु-व्रतम्
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्-धकान्तकं तमन्तकान्-तकं भजे ॥10॥

सरल अर्थ: जो सब प्रकार के मंगल और कलाओं के मधुर रस का आनंद लेने वाले भौंरे जैसे हैं, और जिन्होंने कामदेव, त्रिपुर, संसार, दक्ष-यज्ञ, गजासुर, अंधकासुर तथा यमराज को भी समाप्त किया, उन शिव को मैं भजता हूँ।

श्लोक 11

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥

तोड़कर पढ़ें:
जयत्व-दभ्र-विभ्रम-भ्रमद्-भुजङ्गम-श्वस
द्विनिर्गमत्-क्रम-स्फुरत्-कराल-भाल-हव्य-वाट्
धिमिद्-धिमिद्-धिमि-ध्वनन्-मृदङ्ग-तुङ्ग-मङ्गल
ध्वनि-क्रम-प्रवर्तित-प्रचण्ड-ताण्डवः शिवः ॥11॥

सरल अर्थ: जिनके चारों ओर घूमते साँपों की फुफकार से माथे की अग्नि और भड़क रही है, और मृदंग की "धिमिद-धिमिद" मंगल ध्वनि की ताल पर जो प्रचंड तांडव कर रहे हैं, उन शिव की जय हो।

श्लोक 12

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥१२॥

तोड़कर पढ़ें:
दृषद्-विचित्र-तल्पयोर्-भुजङ्ग-मौक्तिक-स्रजो
र्गरिष्ठ-रत्न-लोष्ठयोः सुहृद्-विपक्ष-पक्षयोः
तृणा-रविन्द-चक्षुषोः प्रजा-मही-महेन्द्रयोः
सम-प्रवृत्तिकः कदा सदा-शिवं भजाम्यहम् ॥12॥

सरल अर्थ: पत्थर हो या मुलायम बिस्तर, साँप हो या मोतियों की माला, कीमती रत्न हो या मिट्टी का ढेला, मित्र हो या शत्रु, तिनका हो या कमल जैसी आँखें, प्रजा हो या राजा: इन सब में समान भाव रखते हुए मैं कब सदाशिव को भजूँगा?

श्लोक 13

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।
विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥

तोड़कर पढ़ें:
कदा निलिम्प-निर्झरी-निकुञ्ज-कोटरे वसन्
विमुक्त-दुर्मतिः सदा शिरः-स्थ-मञ्जलिं वहन्
विलोल-लोल-लोचनो ललाम-भाल-लग्नकः
शिवेति मन्त्र-मुच्-चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥13॥

सरल अर्थ: मैं गंगा किनारे किसी कुंज की गुफा में रहकर, बुरे विचार छोड़कर, सिर पर हाथ जोड़े, चंचल आँखों को शांत करके और "शिव" मंत्र बोलते हुए कब सुखी होऊँगा?

श्लोक 14

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम् ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥१४॥

तोड़कर पढ़ें:
इमं हि नित्य-मेव-मुक्त-मुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्-स्मरन्-ब्रुवन्-नरो विशुद्धि-मेति सन्ततम्
हरे गुरौ सुभक्ति-माशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥14॥

सरल अर्थ: जो व्यक्ति इस श्रेष्ठ स्तोत्र को रोज़ पढ़ता, याद करता और बोलता है, उसका मन शुद्ध होता जाता है। शिव और गुरु में उसकी भक्ति जल्दी बढ़ती है। शिवजी का चिंतन प्राणियों का मोह दूर करने वाला माना गया है।

श्लोक 15

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१५॥

तोड़कर पढ़ें:
पूजा-वसान-समये दश-वक्त्र-गीतं
यः शम्भु-पूजन-परं पठति प्रदोषे
तस्य स्थिरां रथ-गजेन्द्र-तुरङ्ग-युक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥15॥

सरल अर्थ: दस मुखों वाले रावण के गाए इस स्तोत्र को जो पूजा के अंत में, प्रदोष काल में पढ़ता है, उसे शिवजी स्थिर संपदा देते हैं, ऐसा इस श्लोक में कहा गया है। यह श्रद्धा की बात है, कोई पक्का वादा नहीं।

इति श्रीरावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

कठिन शब्दों के आसान अर्थ

शब्दआसान अर्थ
जटाशिवजी के लंबे, उलझे हुए बाल
अटवीजंगल
भुजङ्गसाँप
निलिम्पनिर्झरीदेवनदी, यानी गंगा
पावक, हव्यवाट्अग्नि
चकोरबन्धुचंद्रमा (चकोर पक्षी का साथी)
धराधरेन्द्रनन्दिनीपर्वतराज की पुत्री, पार्वती
दिगम्बरदिशाएँ ही जिनके वस्त्र हैं
भूतभर्तासब प्राणियों के स्वामी
पञ्चसायकपाँच बाणों वाला, कामदेव
कृत्ति, सिन्धुरखाल, हाथी
कलानिधानचंद्रमा (कलाओं का भंडार)
कन्धरगर्दन, कंठ
मृदङ्गढोलक जैसा वाद्य
प्रदोषसूर्यास्त के आसपास का समय
दशवक्त्रदस मुखों वाला, रावण

श्लोक 9 और 10 के सात नाम

इन दोनों श्लोकों में एक ही ढाँचा बार-बार आता है: "स्मरच्छिदं पुरच्छिदं ..." और "स्मरान्तकं पुरान्तकं ..."। इसका अर्थ है "जिसने इसका अंत किया"। सात नाम याद कर लें तो दोनों श्लोक आसान हो जाते हैं।

शब्दकिसका अंत
स्मरकामदेव
पुरत्रिपुरासुर के तीन नगर
भवसंसार का बंधन
मखदक्ष का यज्ञ
गजगजासुर
अन्धकअंधकासुर
अन्तकयमराज, यानी मृत्यु

तीन दिन में याद करने का तरीका

  • पहला दिन: श्लोक 1 से 5। हर श्लोक का अर्थ पहले पढ़ें, फिर चार बार बोलें।
  • दूसरा दिन: श्लोक 6 से 10। सात नामों वाली तालिका साथ रखें।
  • तीसरा दिन: श्लोक 11 से 15, फिर पूरा एक बार शुरू से अंत तक।
  • हर श्लोक की पहली पंक्ति याद हो जाए तो बाकी अपने आप याद आने लगती है। इसलिए पहले सिर्फ पंक्तियों की शुरुआत दोहराएँ।

पाठ-विधि

  • कब: सुबह स्नान के बाद, या प्रदोष काल में। सोमवार और प्रदोष व्रत के दिन पाठ की परंपरा है। तिथि और समय स्थान के अनुसार भिन्न हो सकता है।
  • कैसे: स्वच्छ स्थान पर शिवलिंग या शिवजी के चित्र के सामने बैठें। दीपक जलाएँ, जल या बेलपत्र अर्पित करें।
  • कितनी बार: एक बार पूरा पाठ। इससे अधिक का नियम कुल-परंपरा या गुरु के अनुसार होता है।
  • किसे समर्पित: भगवान शिव (सदाशिव) को।
  • सावधानी: जल्दबाज़ी न करें। धीरे और शुद्ध पढ़ना तेज़ पढ़ने से बेहतर है।

महत्व

इस स्तोत्र की खासियत इसकी लय है। शब्द डमरू की ताल जैसे चलते हैं, इसलिए पढ़ते समय एक अलग ऊर्जा महसूस होती है। श्रद्धालु इसे मन की शांति और शिव-भक्ति के लिए पढ़ते हैं। इसे चमत्कार या गारंटी की तरह नहीं, भक्ति और एकाग्रता के साधन की तरह देखना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. शिव तांडव स्तोत्र किसने लिखा?
परंपरा के अनुसार रावण ने। अंतिम पंक्ति में भी इसे रावण की रचना बताया गया है।

2. इसमें कितने श्लोक हैं?
इस लेख का पाठ 15 श्लोकों का है। कुछ पुस्तकों और वेबसाइटों में 17 श्लोक और थोड़े अलग शब्द मिलते हैं, इसलिए अलग-अलग जगह पाठ में अंतर दिख सकता है।

3. क्या महिलाएँ इसका पाठ कर सकती हैं?
इस बारे में अलग-अलग कुल-परंपराओं की मान्यता अलग हो सकती है। अपनी कुल-परंपरा या गुरु से पूछ लेना अच्छा है।

4. पाठ में कितना समय लगता है?
धीरे-धीरे पढ़ने में लगभग 8 से 12 मिनट।

5. शुरुआत करने वाले क्या करें?
पहले अर्थ समझें, फिर रोज़ 2-3 श्लोक याद करें, और किसी जानकार या ऑडियो से उच्चारण मिला लें।

पाठ-आधार: श्रीरावणकृत शिवताण्डवस्तोत्रम्, स्तोत्ररत्नावली (शिवस्तोत्राणि), पृ. 33 से 37।

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✍
श्रवण झा

यह लेख संपादकीय नीति के अनुसार तैयार किया गया है। कोई त्रुटि दिखे तो हमें बताएँ · संपादकीय नीति

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