❁ श्लोक संग्रह
दैनिक श्लोक
श्लोक 1
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
अर्थ
हे वक्रतुण्ड (गणेश जी)! आप विशाल शरीर वाले हैं और करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी हैं।
हे देव! आप मेरे सभी कार्यों में सदा विघ्नों का निवारण करें।
श्लोक 2
विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद् धनमाप्नोति धनाद् धर्मं ततः सुखम्॥
पात्रत्वाद् धनमाप्नोति धनाद् धर्मं ततः सुखम्॥
अर्थ
विद्या से विनम्रता आती है, विनम्रता से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख प्राप्त होता है।
श्लोक 3
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥
अर्थ
सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी का कल्याण हो और कोई भी दुःख का भागी न बने।