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परमेश्वर स्तोत्रम् के 8 श्लोक हिंदी अर्थ सहित
❖ स्तोत्र

परमेश्वर स्तोत्रम्: हिंदी अर्थ और पढ़ने की विधि

परमेश्वर स्तोत्रम् के सभी 8 श्लोक मूल पाठ, आसान हिंदी अर्थ और तोड़कर पढ़ने की विधि सहित जानें। स्तोत्र का महत्व, पाठ विधि और कठिन शब्दों के सरल अर्थ पढ़ें।

श्रवण झा 24 अक्टूबर 2026⏱ 7 मिनट पढ़ें👁 6

परिचय

परमेश्वर स्तोत्र एक छोटी और सरल प्रार्थना है। इसमें भक्त अपने मन की सच्ची बात कहता है: "मैं कमज़ोर हूँ, गलतियों से भरा हूँ, पर आपकी शरण में आया हूँ, मुझे इस संसार के दुखों से पार लगाइए।" इसमें 8 श्लोक हैं। हर श्लोक की आखिरी पंक्ति एक जैसी है: "जनतारण तारय तापितकम्"। इसलिए एक-दो बार पढ़ते ही यह जुबान पर चढ़ जाता है। इस लेख में हर श्लोक मूल रूप में, फिर तोड़कर, और उसके बाद आसान हिंदी अर्थ के साथ दिया गया है।

हर श्लोक के अंत की पंक्ति

हर श्लोक की चौथी पंक्ति यही है: जनतारण तारय तापितकम्

तोड़कर: जन-तारण तारय तापि-तकम्

सरल अर्थ: हे लोगों को तारने वाले, मुझ दुखी को पार लगाइए।

तोड़कर पढ़ने का आसान तरीका

हर श्लोक पहले मूल रूप में दिया है, उसके नीचे वही श्लोक छोटे टुकड़ों में तोड़कर दिया है। हाइफ़न (-) का मतलब है हल्का रुकना। पहले टूटी हुई पंक्तियाँ धीरे-धीरे पढ़ें, फिर वही पंक्ति बिना रुके जोड़कर बोलें। तोड़ने में कोई अक्षर बदला या हटाया नहीं गया है।

मूल पाठ और सरल अर्थ

श्लोक 1

जगदीश सुधीश भवेश विभो
परमेश परात्पर पूत पितः ।
प्रणतं पतितं हतबुद्धिबलं
जनतारण तारय तापितकम् ॥१॥

तोड़कर पढ़ें:
जग-दीश सु-धीश भवेश विभो
परमेश परात्-पर पूत पितः
प्रणतं पतितं हत-बुद्धि-बलं
जन-तारण तारय तापि-तकम् ॥१॥

सरल अर्थ: हे जगत के स्वामी, हे उत्तम बुद्धि के स्वामी, हे संसार के ईश्वर, हे सर्वव्यापक, हे परमेश्वर, हे सबसे श्रेष्ठ, हे पवित्र पिता! मैं आपके आगे झुका हुआ हूँ, गिरा हुआ हूँ और बुद्धि-बल से कमज़ोर हूँ। हे सबको तारने वाले, मुझ दुखी को पार लगाइए।

श्लोक 2

गुणहीनसुदीनमलीनमतिं
त्वयि पातरि दातरि चापरतिम् ।
तमसा रजसावृतवृत्तिमिमं
जनतारण तारय तापितकम् ॥२॥

तोड़कर पढ़ें:
गुण-हीन-सुदीन-मलीन-मतिं
त्वयि पातरि दातरि चापरतिम्
तमसा रजसा-वृत-वृत्ति-मिमं
जन-तारण तारय तापि-तकम् ॥२॥

सरल अर्थ: मैं गुणहीन हूँ, बहुत दीन हूँ और मेरा मन मैला है। आप रक्षक भी हैं और देने वाले भी, फिर भी मेरा मन आपकी तरफ़ नहीं लगता। मेरा स्वभाव आलस्य और बेचैनी (तमस और रजस) से घिरा हुआ है। हे तारने वाले, इस दुखी का उद्धार कीजिए।

श्लोक 3

मम जीवनमीनमिमं पतितं
मरुघोरभुवीह सुवीहमहो ।
करुणाब्धिचलोर्मिजलानयनं
जनतारण तारय तापितकम् ॥३॥

तोड़कर पढ़ें:
मम जीवन-मीन-मिमं पतितं
मरु-घोर-भुवीह सुवीह-महो
करुणाब्धि-चलोर्मि-जला-नयनं
जन-तारण तारय तापि-तकम् ॥३॥

सरल अर्थ: मेरा जीवन एक मछली की तरह है, जो इस भयानक रेगिस्तान जैसी दुनिया में आ गिरी है और तड़प रही है। आपकी कृपा के सागर की लहरों का जल लाकर इसे बचा लीजिए। हे तारने वाले, इस दुखी को पार लगाइए।

श्लोक 4

भववारण कारण कर्मततौ
भवसिन्धुजले शिव मग्नमतः ।
करुणाञ्च समर्प्य तरिं त्वरितं
जनतारण तारय तापितकम् ॥४॥

तोड़कर पढ़ें:
भव-वारण कारण कर्म-ततौ
भव-सिन्धु-जले शिव मग्न-मतः
करुणाञ्च समर्प्य तरिं त्वरितं
जन-तारण तारय तापि-तकम् ॥४॥

सरल अर्थ: हे शिव! मैं कर्मों के जाल में फँसकर संसार रूपी सागर के पानी में डूब रहा हूँ। हे संसार से छुड़ाने वाले, अपनी कृपा की नाव देकर मुझे जल्दी पार लगाइए।

श्लोक 5

अतिनाश्य जनुर्मम पुण्यरुचे
दुरितौघभरैः परिपूर्णभुवः ।
सुजघन्यमगण्यमपुण्यरुचिं
जनतारण तारय तापितकम् ॥५॥

तोड़कर पढ़ें:
अतिनाश्य जनुर्-मम पुण्य-रुचे
दुरितौघ-भरैः परिपूर्ण-भुवः
सुजघन्य-मगण्य-मपुण्य-रुचिं
जन-तारण तारय तापि-तकम् ॥५॥

सरल अर्थ: मैं बहुत नीचे गिरा हुआ हूँ, मेरी कोई गिनती नहीं, और मेरा मन पुण्य में नहीं लगता। मेरे पापों के भार से धरती भी भरी हुई है। हे पुण्यस्वरूप, मेरे इस बार-बार के जन्म को मिटाकर मुझ दुखी का उद्धार कीजिए।

श्लोक 6

भवकारक नारकहारक हे
भवतारक पातकदारक हे ।
हर शङ्कर किङ्करकर्मचयं
जनतारण तारय तापितकम् ॥६॥

तोड़कर पढ़ें:
भव-कारक नारक-हारक हे
भव-तारक पातक-दारक हे
हर शङ्कर किङ्कर-कर्म-चयं
जन-तारण तारय तापि-तकम् ॥६॥

सरल अर्थ: हे संसार को रचने वाले, हे नरक की पीड़ा हरने वाले! हे संसार से पार लगाने वाले, हे पापों को चीर देने वाले! हे हर, हे शङ्कर! मुझ सेवक के कर्मों का ढेर दूर कीजिए और इस दुखी को पार लगाइए।

श्लोक 7

तृषितश्चिरमस्मि सुधां हि मेऽ
च्युत चिन्मय देहि वदान्यवर ।
अतिमोहवशेन विनष्टकृतं
जनतारण तारय तापितकम् ॥७॥

तोड़कर पढ़ें:
तृषितश्-चिरमस्मि सुधां हि मे-
ऽच्युत चिन्मय देहि वदान्य-वर
अतिमोह-वशेन विनष्ट-कृतं
जन-तारण तारय तापि-तकम् ॥७॥

सरल अर्थ: हे अटल, हे ज्ञान स्वरूप, हे सबसे उदार! मैं बहुत समय से प्यासा हूँ। मुझे ज्ञान रूपी अमृत पिलाइए। मोह के वश में आकर मैं बिगड़ता जा रहा हूँ। हे तारने वाले, मुझे पार लगाइए।

श्लोक 8

प्रणमामि नमामि नमामि भवं
भवजन्मकृतिप्रणिषूदनकम् ।
गुणहीनमनन्तमितं शरणं
जनतारण तारय तापितकम् ॥८॥

तोड़कर पढ़ें:
प्रणमामि नमामि नमामि भवं
भव-जन्म-कृति-प्रणि-षूदनकम्
गुण-हीन-मनन्त-मितं शरणं
जन-तारण तारय तापि-तकम् ॥८॥

सरल अर्थ: मैं आपको बार-बार प्रणाम करता हूँ। आप जन्म-मरण के कारण बने कर्मों का नाश करने वाले हैं। मैं गुणहीन हूँ, फिर भी अनंत स्वरूप आपकी शरण में आया हूँ। हे तारने वाले, इस दुखी को पार लगाइए।

इति परमेश्वरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

कठिन शब्दों के आसान अर्थ

शब्दआसान अर्थ
जगदीशजगत का स्वामी
सुधीशउत्तम बुद्धि वालों का स्वामी
भवेशसंसार का स्वामी
विभुसर्वव्यापक
परात्परश्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ
पूतपवित्र
प्रणतझुका हुआ
पतितगिरा हुआ
तापितदुख से तपा हुआ
मरुरेगिस्तान
ऊर्मिलहर
तरीनाव
तृषितप्यासा
सुधाअमृत
वदान्यउदार, दानी
भवसंसार (शिवजी का भी एक नाम)

दो दिन में याद करने का तरीका

  • पहला दिन: पहले आखिरी पंक्ति "जनतारण तारय तापितकम्" पक्की कर लें, क्योंकि वह हर श्लोक में आती है। फिर श्लोक 1 से 4 की पहली तीन पंक्तियाँ याद करें।
  • दूसरा दिन: श्लोक 5 से 8, फिर पूरा एक बार शुरू से अंत तक।
  • हर श्लोक का अर्थ एक बार पढ़ लें। अर्थ पता हो तो शब्द जल्दी याद रहते हैं।

पाठ कैसे करें

  • कब: सुबह या शाम, जब मन शांत हो। इसके लिए कोई कठिन नियम नहीं है। अपनी परंपरा या गुरु के अनुसार चलें।
  • कैसे: स्वच्छ स्थान पर बैठें, दीपक जलाएँ और धीरे-धीरे पढ़ें। पहले टूटी हुई पंक्तियाँ पढ़ें, फिर जोड़कर।
  • कितनी बार: एक बार पूरा पाठ। इससे ज़्यादा का नियम अपनी कुल-परंपरा के अनुसार।
  • सावधानी: जल्दबाज़ी न करें। धीरे और साफ़ पढ़ना तेज़ पढ़ने से बेहतर है।

महत्व

यह स्तोत्र प्रार्थना के रूप में लिखा गया है। इसमें न कोई माँग की लंबी सूची है, न कोई कठिन विधि। इसमें विनम्रता है: अपनी कमियों को मानना और ईश्वर की शरण लेना। श्रद्धालु इसे मन की शांति और भक्ति के लिए पढ़ते हैं। इसे चमत्कार या गारंटी की तरह नहीं, बल्कि प्रार्थना और एकाग्रता के साधन की तरह देखना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. परमेश्वर स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?
इस पाठ में 8 श्लोक हैं।

2. यह किस देवता को समर्पित है?
इसमें परमेश्वर को पुकारा गया है। बीच में हर, शङ्कर और शिव नाम आते हैं, और एक जगह अच्युत नाम भी आता है।

3. इसका रचयिता कौन है?
हमारे स्रोत के पन्नों में इस स्तोत्र के रचयिता का नाम नहीं मिलता, इसलिए अनुमान से कोई नाम नहीं लिखा गया है।

4. पाठ में कितना समय लगता है?
धीरे-धीरे पढ़ने में लगभग 4 से 6 मिनट।

5. शुरुआत करने वाले क्या करें?
पहले अर्थ समझें, फिर तोड़ी हुई पंक्तियाँ पढ़ें, और किसी जानकार से उच्चारण मिला लें।

पाठ-आधार: परमेश्वरस्तोत्रम्, स्तोत्ररत्नावली (विनयस्तोत्राणि), पृ. 9 से 11।

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✍
श्रवण झा

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