🕉️ दशदिक्-रक्षा-विधानम् (दिक्-बन्धन विधि)
🔶 यह क्रिया कब करें?
संकल्प और कलश-स्थापन के पश्चात् तथा मुख्य पूजा प्रारम्भ करने से पूर्व दशदिक्-रक्षा की जाती है।
🔶 आवश्यक सामग्री
• अक्षत (चावल)
• पीली सरसों
• थोड़ा शुद्ध जल
• एक छोटी कटोरी
• पीली सरसों
• थोड़ा शुद्ध जल
• एक छोटी कटोरी
👉 अक्षत और पीली सरसों को मिलाकर रखें।
🔶 विधि
• पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
• दाहिने हाथ में अक्षत-सरसों लें।
• प्रत्येक मंत्र के साथ संबंधित दिशा में थोड़ा अक्षत छोड़ें।
• दाहिने हाथ में अक्षत-सरसों लें।
• प्रत्येक मंत्र के साथ संबंधित दिशा में थोड़ा अक्षत छोड़ें।
🔶 दिशा-रक्षा मंत्र
पूर्व रक्षतु वाराह आग्नेय्यां गरुड़ध्वजः ।
दक्षिणे पद्मनाभस्तु नैर्ऋत्यां मधुसूदनः ॥
दक्षिणे पद्मनाभस्तु नैर्ऋत्यां मधुसूदनः ॥
👉 पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य दिशा में अक्षत छोड़ें।
पश्चिमे चैव गोविन्दो वायव्यां तु जनार्दनः ।
उत्तरे श्रीपती रक्षेदैशान्यां तु महेश्वरः ॥
उत्तरे श्रीपती रक्षेदैशान्यां तु महेश्वरः ॥
👉 पश्चिम, वायव्य, उत्तर, ईशान दिशा में अक्षत छोड़ें।
ऊर्ध्व रक्षतु धाता वो अधोऽनन्तश्च रक्षतु ।
एवं दश दिशो रक्षेद् वासुदेवो जनार्दनः ॥
एवं दश दिशो रक्षेद् वासुदेवो जनार्दनः ॥
👉 ऊपर संकेत करें, फिर नीचे भूमि पर अक्षत छोड़ें।
🔶 विशेष रक्षा मंत्र
रक्षाहीनंतु यत्स्थानं रक्षत्वीशो ममाद्रिधिक् ॥
👉 चारों ओर थोड़ा अक्षत घुमा दें।
🔶 भूत-प्रेत निवारण मंत्र
यदत्र संस्थितं भूतं स्थानमाश्रित्य सर्वदा ।
स्थानं त्यक्त्वा तु तत्सर्व यत्रस्थं तत्र गच्छतु ॥
स्थानं त्यक्त्वा तु तत्सर्व यत्रस्थं तत्र गच्छतु ॥
अपक्रामन्तु ते भूता ये भूता भूमिसंस्थिताः ।
ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया ॥
ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया ॥
अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतो दिशम् ।
सर्वेषामविरोधेन पूजाकर्म समारभे ॥
सर्वेषामविरोधेन पूजाकर्म समारभे ॥
👉 अंत में सामने अक्षत छोड़कर हाथ झाड़ लें।
🔶 इसके बाद
• आचमन करें।
• हाथ शुद्ध करें।
• अब मुख्य पूजा प्रारम्भ करें।
• हाथ शुद्ध करें।
• अब मुख्य पूजा प्रारम्भ करें।
🔶 दशदिक्-रक्षा क्यों करनी चाहिए?
दशदिक्-रक्षा का अर्थ है दसों दिशाओं की आध्यात्मिक सुरक्षा।
यह क्रिया पूजा-स्थल को शुद्ध एवं सुरक्षित बनाती है।
🔶 लाभ
✔ पूजा निर्विघ्न सम्पन्न होती है।
✔ नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं।
✔ मानसिक एकाग्रता बढ़ती है।
✔ दिशा-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।
✔ साधना में सुरक्षा कवच बनता है।
✔ नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं।
✔ मानसिक एकाग्रता बढ़ती है।
✔ दिशा-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।
✔ साधना में सुरक्षा कवच बनता है।
🔶 शास्त्रीय महत्व
वेद एवं गृह्यसूत्रों में यज्ञ तथा पूजन से पूर्व दिशा-शुद्धि अनिवार्य मानी गई है।
यह दैवी संरक्षण की स्थापना है।
।। इति दशदिक्-रक्षा-विधानम् सम्पूर्णम् ।।
