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भगवान विष्णु के विराट पुरुष स्वरूप का दिव्य चित्र, पुरुषसूक्त के वैदिक पाठ और सृष्टि रचना का प्रतीकात्मक दृश्य
ॐ मंत्र संग्रह

पुरुषसूक्तम् | ऋग्वेद के 16 मंत्र, देवनागरी पाठ, रोमन और सरल हिंदी अर्थ

ऋग्वेद के पुरुषसूक्त (मंडल 10, सूक्त 90) के सभी 16 मंत्र देवनागरी और रोमन लिपि में पढ़ें। प्रत्येक मंत्र का शब्द-अर्थ, सरल हिंदी भावार्थ, पाठ विधि, उच्चारण और कठिन शब्दों की व्याख्या भी जानें।

संपादकीय डेस्क 30 अक्टूबर 2026⏱ 17 मिनट पढ़ें👁 4

संक्षेप में: पुरुषसूक्त ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 90) का प्रसिद्ध सूक्त है, जिसमें सृष्टि के आधार विराट पुरुष की स्तुति है। प्रचलित पाठ में 16 मंत्र हैं। इसे विष्णु पूजन, अभिषेक और यज्ञ-अनुष्ठानों में पढ़ा जाता है। धीरे पढ़ने पर पूरे पाठ में लगभग 5 से 7 मिनट लगते हैं। इस लेख में देवनागरी पाठ, रोमन पाठ, शब्द-अर्थ और सरल अर्थ एक साथ दिए हैं।

लेखक:श्रवण झा (Shravan jha) |  अंतिम अपडेट: 30 अक्टूबर 2026

पुरुषसूक्त क्या है

पुरुषसूक्त वैदिक साहित्य के सबसे प्रसिद्ध सूक्तों में से एक है। इसमें एक विराट पुरुष का वर्णन है, जिसके हज़ारों सिर, आँखें और पैर हैं और जो पूरी सृष्टि में व्याप्त है। परंपरा में इस पुरुष को नारायण या परमात्मा के रूप में समझा जाता है। सूक्त बताता है कि यज्ञ से वेद, पशु, ऋतुएँ, चंद्रमा, सूर्य, आकाश और पृथ्वी कैसे प्रकट हुए।

पारंपरिक रूप से इस सूक्त के ऋषि नारायण, देवता पुरुष और छंद अनुष्टुप माना जाता है (अंतिम मंत्र त्रिष्टुप में है)। अलग-अलग परंपराओं में थोड़ा भेद मिल सकता है, इसलिए अपनी कुल-परंपरा या गुरु के पाठ को प्रमाण मानें।

पुरुषसूक्त का पाठ कब और कैसे करें

  • कब: सुबह स्नान के बाद, या विष्णु पूजन, अभिषेक, सत्यनारायण कथा और अन्य अनुष्ठानों के समय। तिथि और समय स्थान और परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकता है।
  • कहाँ और कैसे बैठें: स्वच्छ स्थान पर आसन बिछाकर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। सामने भगवान विष्णु या नारायण का चित्र या मूर्ति रखें और दीपक जलाएँ।
  • कितनी बार: एक बार पूरा पाठ पर्याप्त माना जाता है। अनुष्ठान में यह कितनी बार और किस क्रम से पढ़ा जाएगा, यह पुरोहित या कुल-परंपरा तय करती है।
  • पाठ से पहले: मन शांत करें, हाथ जोड़ें और नारायण का ध्यान करें।
  • पाठ के बाद: प्रणाम करें और थोड़ी देर शांत बैठें।

लक्ष्मीजी की स्तुति के लिए पढ़ा जाने वाला सूक्त श्री सूक्त अलग है। पुरुषसूक्त विष्णु या नारायण-तत्व पर केंद्रित है, और अक्सर पूजा में दोनों साथ पढ़े जाते हैं।

उच्चारण में ध्यान रखें

  • ऋ: "ऋचः", "ऋषयः" में "ऋ" को "रि" की तरह बोलते हैं।
  • विसर्ग (ः): "पुरुषः", "सहस्राक्षः" के अंत में हल्की 'ह' जैसी ध्वनि।
  • ऽ (अवग्रह): "पादोऽस्य", "ब्राह्मणोऽस्य" में एक 'अ' दबा हुआ है।
  • वैदिक स्वर: वेद में उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वरों का नियम है। यहाँ सामान्य पाठ की सरल रीति दी गई है। स्वर-सहित पाठ के लिए किसी वैदिक पंडित से सीखना सबसे अच्छा है।
  • जल्दबाज़ी न करें, धीरे और साफ़ पढ़ें।

पुरुषसूक्त के 16 मंत्र और उनका अर्थ

हर मंत्र के नीचे रोमन पाठ, फिर शब्द-अर्थ, फिर सरल अर्थ दिया गया है। रोमन में "ṛ" को "रि" और "ḥ" को हल्के "ह" की तरह पढ़ें।

मंत्र 1

ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
स भूमि ᳪ सर्वत स्पृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥१॥

Roman: Om sahasraśīrṣā puruṣaḥ sahasrākṣaḥ sahasrapāt | sa bhūmiṃ viśvato vṛtvātyatiṣṭhaddaśāṅgulam ||1||

शब्द-अर्थ: सहस्रशीर्षा = हज़ार सिरों वाला | पुरुषः = विराट पुरुष | सहस्राक्षः = हज़ार आँखों वाला | सहस्रपात् = हज़ार पैरों वाला | भूमिम् = पृथ्वी को | विश्वतः वृत्वा = सब ओर से घेरकर | दशाङ्गुलम् = दस अंगुल (सीमा से परे)

सरल अर्थ: वह विराट पुरुष हज़ार सिर, हज़ार आँखों और हज़ार पैरों वाला है। वह पृथ्वी को सब ओर से घेरकर भी उससे दस अंगुल ऊपर स्थित है। "हज़ार" यहाँ असीम का संकेत है।

मंत्र 2

पुरुष एवेद ᳪसर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥२॥

Roman: puruṣa evedaṃ sarvaṃ yadbhūtaṃ yacca bhāvyam | utāmṛtatvasyeśāno yadannenātirohati ||2||

शब्द-अर्थ: इदं सर्वम् = यह सब | यद् भूतम् = जो बीत चुका | यच्च भाव्यम् = जो होने वाला है | अमृतत्वस्य ईशानः = अमरता का स्वामी | अन्नेन अतिरोहति = अन्न से (जगत के रूप में) आगे बढ़ता है

सरल अर्थ: जो कुछ बीत चुका और जो आगे होगा, यह सब पुरुष ही है। वही अमरता का स्वामी भी है, और अन्न के सहारे चलने वाले जगत से भी आगे है।

मंत्र 3

एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥३॥

Roman: etāvānasya mahimāto jyāyāṃśca pūruṣaḥ | pādo'sya viśvā bhūtāni tripādasyāmṛtaṃ divi ||3||

शब्द-अर्थ: एतावान् = इतनी (ही) | महिमा = महिमा | ज्यायान् = उससे भी बड़ा | पादः = एक चौथाई | विश्वा भूतानि = सारे प्राणी | त्रिपात् = तीन चौथाई | अमृतम् दिवि = प्रकाशमय लोक में अमर

सरल अर्थ: यह सारा जगत उसकी महिमा है, पर वह स्वयं इससे कहीं बड़ा है। सारे प्राणी उसका एक चौथाई हैं, और उसके तीन चौथाई अंश प्रकाशमय अमर लोक में हैं।

मंत्र 4

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः ।
ततो विष्वङ्व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥४॥

Roman: tripādūrdhva udaitpuruṣaḥ pādo'syehābhavatpunaḥ | tato viṣvaṅvyakrāmatsāśanānaśane abhi ||4||

शब्द-अर्थ: त्रिपात् ऊर्ध्वः = तीन चौथाई ऊपर | उदैत् = उठा, स्थित रहा | इह अभवत् पुनः = यहाँ फिर प्रकट हुआ | विष्वङ् = सब दिशाओं में | व्यक्रामत् = फैल गया | साशनानशने = खाने वाले (जीव) और न खाने वाले (जड़)

सरल अर्थ: पुरुष का तीन चौथाई भाग ऊपर रहा, और एक चौथाई यहाँ बार-बार प्रकट हुआ। फिर वह सब दिशाओं में फैलकर चेतन और जड़, दोनों रूपों में व्याप्त हो गया।

मंत्र 5

ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः ।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥५॥

Roman: tato virāḍajāyata virājo adhi pūruṣaḥ | sa jāto atyaricyata paścādbhūmimatho puraḥ ||5||

शब्द-अर्थ: विराट् = विराट ब्रह्मांड | अजायत = उत्पन्न हुआ | अधि पूरुषः = उस पर अधिष्ठित पुरुष | अत्यरिच्यत = उससे आगे बढ़ गया | पश्चात् भूमिम् = बाद में पृथ्वी (रची) | पुरः = फिर शरीर-रूप जीव

सरल अर्थ: उस पुरुष से विराट ब्रह्मांड उत्पन्न हुआ, और उस ब्रह्मांड में वही पुरुष अधिष्ठाता बना। वह उत्पन्न होकर सबसे आगे निकल गया, फिर पृथ्वी और जीवों के शरीर रचे गए।

मंत्र 6

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् ।
पशूँस्तांश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ॥६॥

Roman: tasmādyajñātsarvahutaḥ sambhṛtaṃ pṛṣadājyam | paśūṃstāṃścakre vāyavyānāraṇyā grāmyāśca ye ||6||

शब्द-अर्थ: सर्वहुतः यज्ञः = जिसमें सब कुछ आहुति हुआ | सम्भृतम् = इकट्ठा हुआ | पृषदाज्यम् = दही मिला घी | वायव्यान् = आकाश-वायु में रहने वाले | आरण्याः = जंगली | ग्राम्याः = घरेलू

सरल अर्थ: उस सर्वहुत यज्ञ से दही मिला घी प्राप्त हुआ। उसी से हवा में उड़ने वाले, जंगल के और गाँव के पशु-पक्षी रचे गए।

मंत्र 7

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दाँसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥७॥

Roman: tasmādyajñātsarvahuta ṛcaḥ sāmāni jajñire | chandāṃsi jajñire tasmādyajustasmādajāyata ||7||

शब्द-अर्थ: ऋचः = ऋग्वेद के मंत्र | सामानि = सामवेद के गान | छन्दांसि = छंद | यजुः = यजुर्वेद | जज्ञिरे / अजायत = उत्पन्न हुए

सरल अर्थ: उसी सर्वहुत यज्ञ से ऋचाएँ, साम, छंद और यजुर्वेद उत्पन्न हुए। यानी वैदिक ज्ञान की उत्पत्ति भी उसी से बताई गई है।

मंत्र 8

तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः ।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः ॥८॥

Roman: tasmādaśvā ajāyanta ye ke cobhayādataḥ | gāvo ha jajñire tasmāttasmājjātā ajāvayaḥ ||8||

शब्द-अर्थ: अश्वाः = घोड़े | उभयादतः = दोनों ओर दाँतों वाले | गावः = गायें | अजावयः = बकरियाँ और भेड़ें

सरल अर्थ: उसी से घोड़े और दोनों जबड़ों में दाँतों वाले दूसरे पशु उत्पन्न हुए। उसी से गायें, बकरियाँ और भेड़ें भी उत्पन्न हुईं।

मंत्र 9

तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः ।
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥९॥

Roman: taṃ yajñaṃ barhiṣi praukṣanpuruṣaṃ jātamagrataḥ | tena devā ayajanta sādhyā ṛṣayaśca ye ||9||

शब्द-अर्थ: बर्हिषि = कुश के आसन पर | प्रौक्षन् = अभिषिक्त किया, जल छिड़का | जातम् अग्रतः = सबसे पहले उत्पन्न | साध्याः = साध्य देवगण | ऋषयः = ऋषि

सरल अर्थ: सबसे पहले उत्पन्न उस पुरुष को देवताओं ने कुश पर यज्ञ-रूप में अभिषिक्त किया। उसी से देवताओं, साध्यों और ऋषियों ने यज्ञ किया।

मंत्र 10

यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् ।
मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते ॥१०॥

Roman: yatpuruṣaṃ vyadadhuḥ katidhā vyakalpayan | mukhaṃ kimasya kau bāhū kā ūrū pādā ucyete ||10||

शब्द-अर्थ: व्यदधुः = विभाजित किया | कतिधा = कितने भागों में | किम् = क्या | कौ बाहू = दोनों भुजाएँ क्या हैं | का ऊरू = जंघाएँ क्या हैं | पादा = पैर

सरल अर्थ: जब उस पुरुष का विभाजन किया गया तो कितने भाग किए गए? उसका मुख क्या कहलाया, भुजाएँ क्या, जंघाएँ और पैर क्या कहलाए? यह प्रश्न अगले मंत्र का उत्तर तैयार करता है।

मंत्र 11

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः ।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥११॥

Roman: brāhmaṇo'sya mukhamāsīdbāhū rājanyaḥ kṛtaḥ | ūrū tadasya yadvaiśyaḥ padbhyāṃ śūdro ajāyata ||11||

शब्द-अर्थ: मुखम् = मुख | बाहू = भुजाएँ | राजन्यः = शासन और रक्षा करने वाला वर्ग | ऊरू = जंघाएँ | वैश्यः = व्यापार और कृषि करने वाला वर्ग | पद्भ्याम् = पैरों से | शूद्रः = सेवा करने वाला वर्ग

सरल अर्थ: इस मंत्र में समाज को एक विराट शरीर के रूप में देखा गया है, जिसमें ज्ञान, रक्षा, व्यापार और सेवा, ये चार कार्य उसके अंग हैं। यह मंत्र बाद में वर्ण-व्यवस्था पर होने वाली बहसों में बहुत उद्धृत होता है। इसकी व्याख्या परंपरागत और आधुनिक विद्वानों में अलग-अलग मिलती है। पाठ करते समय इसे उसी रूप में पढ़ें जैसा मूल वैदिक पाठ में आया है, और अर्थ के लिए अपने गुरु या विश्वसनीय भाष्य को देखें।

मंत्र 12

चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत ।
श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत ॥१२॥

Roman: candramā manaso jātaścakṣoḥ sūryo ajāyata | mukhādindraścāgniśca prāṇādvāyurajāyata ||12||

शब्द-अर्थ: चन्द्रमा = चंद्रमा | मनसः = मन से | चक्षोः = आँख से | सूर्यः = सूर्य | मुखात् = मुख से | प्राणात् = प्राण से | वायुः = वायु

सरल अर्थ: उसके मन से चंद्रमा और आँख से सूर्य उत्पन्न हुआ। मुख से इंद्र और अग्नि, और प्राण से वायु उत्पन्न हुआ।

मंत्र 13

नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन् ॥१३॥

Roman: nābhyā āsīdantarikṣaṃ śīrṣṇo dyauḥ samavartata | padbhyāṃ bhūmirdiśaḥ śrotrāttathā lokāṃ akalpayan ||13||

शब्द-अर्थ: नाभ्याः = नाभि से | अन्तरिक्षम् = अंतरिक्ष, बीच का आकाश | शीर्ष्णः = सिर से | द्यौः = आकाश, स्वर्ग | पद्भ्याम् = पैरों से | भूमिः = पृथ्वी | दिशः = दिशाएँ | श्रोत्रात् = कान से | लोकान् = लोकों को

सरल अर्थ: नाभि से अंतरिक्ष, सिर से आकाश, पैरों से पृथ्वी और कान से दिशाएँ उत्पन्न हुईं। इस तरह देवताओं ने सारे लोकों की रचना की।

मंत्र 14

यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।
वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म ऽइध्मः शरद्धविः ॥१४॥

Roman: yatpuruṣeṇa haviṣā devā yajñamatanvata | vasanto asyāsīdājyaṃ grīṣma idhmaḥ śaraddhaviḥ ||14||

शब्द-अर्थ: हविषा = आहुति की सामग्री से | अतन्वत = विस्तार किया, किया | आज्यम् = घी | इध्मः = ईंधन, समिधा | शरद् = शरद ऋतु | हविः = हवि

सरल अर्थ: जब देवताओं ने पुरुष को ही हवि बनाकर यज्ञ किया, तब बसंत उसका घी, ग्रीष्म ईंधन और शरद ऋतु हवि बनी।

मंत्र 15

सप्तास्यासन्परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः ।
देवा यद्यज्ञं तन्वानाऽबध्नन्पुरुषं पशुम् ॥१५॥

Roman: saptāsyāsanparidhayastriḥ sapta samidhaḥ kṛtāḥ | devā yadyajñaṃ tanvānā'badhnanpuruṣaṃ paśum ||15||

शब्द-अर्थ: सप्त परिधयः = सात परिधियाँ (यज्ञ की सीमा की लकड़ियाँ) | त्रिः सप्त = तीन गुना सात, यानी इक्कीस | समिधः = समिधाएँ | अबध्नन् = बाँधा | पशुम् = यज्ञ-पशु के रूप में

सरल अर्थ: उस यज्ञ की सात परिधियाँ थीं और इक्कीस समिधाएँ बनाई गईं। जब देवताओं ने यज्ञ का विस्तार किया, तब उन्होंने पुरुष को ही यज्ञ-पशु के रूप में बाँधा। यह सृष्टि के प्रतीकात्मक यज्ञ का वर्णन है।

मंत्र 16

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥१६॥

Roman: yajñena yajñamayajanta devāstāni dharmāṇi prathamānyāsan | te ha nākaṃ mahimānaḥ sacanta yatra pūrve sādhyāḥ santi devāḥ ||16||

शब्द-अर्थ: यज्ञेन यज्ञम् = यज्ञ के द्वारा यज्ञ-स्वरूप की | अयजन्त = पूजा की | धर्माणि = धारण करने वाले नियम | प्रथमानि = आदि, पहले के | नाकम् = दुःखरहित स्वर्ग | महिमानः = महान लोग | सचन्त = पहुँचते हैं | पूर्वे साध्याः = प्राचीन साध्य देवता

सरल अर्थ: देवताओं ने यज्ञ से यज्ञ-स्वरूप की उपासना की, और वही सबसे पहले के धर्म (नियम) थे। जो महान लोग इन्हें अपनाते हैं, वे उस दुःखरहित लोक को पाते हैं जहाँ प्राचीन साध्य देवता रहते हैं।

॥ इति पुरुषसूक्तं सम्पूर्णम् ॥

पूरे सूक्त का सार

  • मंत्र 1 से 5: विराट पुरुष का स्वरूप और उससे ब्रह्मांड की उत्पत्ति।
  • मंत्र 6 से 9: सर्वहुत यज्ञ से पशु, वेद और देवताओं का प्रकट होना।
  • मंत्र 10 से 13: पुरुष के अंगों से समाज, चंद्र-सूर्य, देवता और लोकों की रचना।
  • मंत्र 14 से 16: ऋतुओं के साथ यज्ञ का विस्तार और धर्म की शुरुआत।

मुख्य भाव यह है कि सारा जगत एक ही परम तत्व से निकला है और उसी में जुड़ा है।

कठिन शब्दों के आसान अर्थ

शब्दआसान अर्थ
पुरुषइस सूक्त में विराट परम तत्व, नारायण
सहस्रहज़ार, यहाँ असीम का संकेत
विराट्विशाल ब्रह्मांड
सर्वहुतजिसमें सब कुछ आहुति हो जाए
पृषदाज्यदही मिला घी
बर्हिःयज्ञ में बिछाई जाने वाली कुश
साध्यएक देवगण
परिधियज्ञ-अग्नि के चारों ओर रखी जाने वाली लकड़ियाँ
समिधाहवन की लकड़ी
नाकदुःखरहित स्वर्ग

याद करने का तरीका

  • पहला दिन: मंत्र 1 से 4।
  • दूसरा दिन: मंत्र 5 से 9। मंत्र 6, 7 और 8 की शुरुआत "तस्माद्यज्ञात्" या "तस्मात्" से होती है, इससे याद रखना आसान है।
  • तीसरा दिन: मंत्र 10 से 13।
  • चौथा दिन: मंत्र 14 से 16, फिर पूरा पाठ एक बार।
  • हर मंत्र का भाव एक बार पढ़ लें।

मेरे अनुभव में मंत्र 6, 7 और 8 की समान शुरुआत पहले-पहले उलझाती है। [एक पंक्ति में लिखें कि आपको कौन सा मंत्र सबसे कठिन लगा।]

शुरुआत की आम गलतियाँ

  • मंत्र 6, 7, 8 को मिला देना: तीनों "तस्मात्" से शुरू होते हैं। हर एक का अलग विषय याद रखें: पशु, वेद, घोड़े-गायें।
  • "ऋ" को "रु" बोलना: इसका उच्चारण "रि" जैसा है।
  • जल्दबाज़ी: संयुक्त शब्दों वाले मंत्र जल्दी पढ़ने से बिगड़ते हैं।
  • मंत्र 11 का सतही अर्थ निकालना: इसकी व्याख्या पर विद्वानों में मतभेद है। केवल एक पंक्ति पर रुककर निष्कर्ष न निकालें।
  • अर्थ के बिना रटना: पूरे सूक्त का सार पढ़ लेने से पाठ में मन लगता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. पुरुषसूक्त में कितने मंत्र हैं?
प्रचलित पाठ में 16 मंत्र हैं। यह ऋग्वेद के मंडल 10 का सूक्त 90 है। कुछ परंपराओं में, जैसे यजुर्वेद के पाठ में, कुछ अतिरिक्त मंत्र जुड़े मिलते हैं।

2. पुरुषसूक्त किसे समर्पित है?
विराट पुरुष को, जिसे परंपरा में नारायण या विष्णु के रूप में समझा जाता है।

3. क्या इसे रोज़ पढ़ सकते हैं?
हाँ, श्रद्धालु इसे पूजा के साथ पढ़ते हैं। नियम अपनी कुल-परंपरा या गुरु के अनुसार रखें।

4. पाठ में कितना समय लगता है?
धीरे पढ़ने पर लगभग 5 से 7 मिनट।

5. क्या इसे पढ़ने से कोई फल मिलने की गारंटी है?
नहीं। यह श्रद्धा और चिंतन का पाठ है, किसी लाभ की गारंटी नहीं।

6. पुरुषसूक्त और श्रीसूक्त में क्या अंतर है?
श्रीसूक्त लक्ष्मीजी की स्तुति है, जबकि पुरुषसूक्त विराट पुरुष यानी नारायण-तत्व और सृष्टि की उत्पत्ति पर केंद्रित है।

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पाठ-आधार: पुरुषसूक्तम्, यज्ञ मार्तण्ड (पं. कुशेश्वर झा), पृ. 338 और 339; ऋग्वेद 10.90।

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संपादकीय डेस्क

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