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कमल पर विराजमान माँ महालक्ष्मी, दीपक और कमल पुष्प के साथ श्रीसूक्त पाठ का दिव्य दृश्य
ॐ मंत्र संग्रह

श्रीसूक्तम् | माँ लक्ष्मी के 15 वैदिक मंत्र, सरल हिंदी अर्थ और पाठ

श्रीसूक्त की 15 मुख्य ऋचाएँ, फलश्रुति और परंपरा में पढ़े जाने वाले अतिरिक्त श्लोक उनके सरल हिंदी अर्थ सहित पढ़ें। साथ ही जानें श्रीसूक्त पाठ का सही समय, बैठने की दिशा, उच्चारण और चार दिनों में मंत्र याद करने का तरीका।

श्रवण झा 30 अक्टूबर 2026⏱ 19 मिनट पढ़ें👁 10

संक्षेप में: श्रीसूक्त देवी लक्ष्मी की 15 ऋचाओं वाली वैदिक स्तुति है। इसे सुबह स्नान के बाद या शाम को दीपक जलाते समय, पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके पढ़ा जाता है। धीरे पढ़ने पर 15 ऋचाओं में लगभग 6 से 8 मिनट लगते हैं। इस लेख में देवनागरी पाठ, रोमन पाठ, शब्द-अर्थ, सरल अर्थ और पाठ की विधि एक ही जगह दी गई है।

लेखक: श्रवण झा  |  अंतिम अपडेट: 30 अक्टूबर 2026
श्रवण झा ने केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से शास्त्री की शिक्षा प्राप्त की है। संस्कृत भाषा, वैदिक साहित्य और भारतीय धार्मिक परंपराओं में उनकी विशेष रुचि है। वे SanskritPeeth के माध्यम से संस्कृत एवं धार्मिक विषयों से जुड़ी उपयोगी सामग्री पाठकों तक पहुँचाते हैं।
स्रोत: श्रीसूक्तम्, यज्ञ मार्तण्ड (पं. कुशेश्वर झा), पृ. 336 और 337। श्रीसूक्त ऋग्वेद के खिल-सूक्त के रूप में प्रसिद्ध है।

श्रीसूक्त क्या है

श्रीसूक्त देवी लक्ष्मी की स्तुति है। इसे ऋग्वेद का मंत्र-समूह माना जाता है और दीपावली, शुक्रवार की पूजा या किसी भी लक्ष्मी पूजन में इसका पाठ बहुत प्रेम से किया जाता है। इसमें 15 मुख्य मंत्र (ऋचाएँ) हैं। उनके बाद पाठ का फल बताने वाला एक श्लोक आता है, और फिर कई अतिरिक्त श्लोक हैं जो परंपरा में श्रीसूक्त के साथ पढ़े जाते हैं।

पहली बार पढ़ने वाले के मन में सबसे पहला सवाल यही आता है कि इसमें माँगा क्या गया है। सच यह है कि श्रीसूक्त में सिर्फ़ धन नहीं माँगा गया। इसमें माँगा गया है: साथ न छोड़ने वाली लक्ष्मी, यश, अच्छी बुद्धि, सत्य वाणी, पोषण, स्वच्छ घर, और दरिद्रता, आलस्य और अशुभता से मुक्ति। यानी पूरे जीवन की सुख-समृद्धि।

श्रीसूक्त का पाठ कब और कैसे करें

  • कब: सुबह स्नान के बाद, या शाम को दीपक जलाने के समय। शुक्रवार और दीपावली को इसका पाठ खास माना जाता है। तिथि और समय स्थान और परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकता है।
  • कहाँ और कैसे बैठें: स्वच्छ स्थान पर आसन बिछाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। सामने लक्ष्मीजी का चित्र या मूर्ति रखें, घी का दीपक जलाएँ और एक कमल या कोई ताज़ा फूल रखें।
  • कितनी बार: एक बार पूरा पाठ भी पर्याप्त माना जाता है। श्रद्धा से कुछ लोग 3, 5, 11 या 16 बार पढ़ते हैं। यह कुल-परंपरा या गुरु के अनुसार तय होता है।
  • पाठ से पहले: मन शांत करें, हाथ जोड़ें और लक्ष्मीजी का ध्यान करें। चाहें तो पहले गणेशजी को प्रणाम कर लें।
  • पाठ के बाद: हाथ जोड़कर प्रणाम करें और थोड़ी देर शांत बैठ जाएँ।

इसी श्रीसूक्त की ऋचाएँ लक्ष्मी पूजन में अलग-अलग चरणों के साथ भी बोली जाती हैं। उसका पूरा क्रम महालक्ष्मी पूजन वाले लेख में है।

मेरा अनुभव

श्रीसूक्त का पाठ करते समय संस्कृत के कुछ शब्दों और वैदिक उच्चारण को समझना आवश्यक है। विशेष रूप से ऋ, विसर्ग और अवग्रह वाले शब्दों को पढ़ने में शुरुआत में थोड़ी कठिनाई हो सकती है। इसलिए इस लेख में प्रत्येक ऋचा के साथ उसका रोमन पाठ, कठिन शब्दों के अर्थ और सरल हिंदी भावार्थ दिया गया है। संस्कृत के विद्यार्थी के रूप में मेरा प्रयास है कि वैदिक मंत्रों को केवल पढ़ा ही न जाए, बल्कि उनके शब्दों और भाव को भी समझा जाए। श्रीसूक्त का पाठ मेरे लिए भारतीय वैदिक साहित्य और हमारी पूजा-परंपरा से जुड़ने का एक माध्यम है।

उच्चारण में ध्यान रखें

  • ऋ: "ऋद्धिं", "ऋतु" जैसे शब्दों में "ऋ" को "रि" की तरह बोलते हैं।
  • विसर्ग (ः): "श्रीः", "नमः", "यशः" के अंत में हल्की 'ह' जैसी ध्वनि।
  • ऽ (अवग्रह): "दास्योऽश्वान्", "तपसोऽधिजातो" में ऽ का मतलब है कि एक 'अ' दबा हुआ है।
  • वैदिक मंत्रों में एक मात्रा का फ़र्क भी बहुत मायने रखता है। जल्दबाज़ी न करें, धीरे और साफ़ पढ़ें। संभव हो तो किसी जानकार से एक बार सुनकर मिला लें।

श्रीसूक्त की 15 ऋचाएँ और उनका अर्थ

हर ऋचा के नीचे रोमन पाठ, फिर शब्द-अर्थ, फिर सरल अर्थ दिया गया है। रोमन में "ṛ" को "रि" और "ḥ" को हल्के "ह" की तरह पढ़ें।

ऋचा 1

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१॥

Roman: Om hiraṇyavarṇāṃ hariṇīṃ suvarṇarajatasrajām | candrāṃ hiraṇmayīṃ lakṣmīṃ jātavedo ma āvaha ||1||

शब्द-अर्थ: हिरण्यवर्णाम् = सोने के रंग वाली | हरिणीम् = हरिणी जैसी कोमल | सुवर्णरजतस्रजाम् = सोने-चाँदी की माला वाली | चन्द्राम् = चंद्रमा-सी शीतल | हिरण्मयीम् = सुनहरी | लक्ष्मीम् = लक्ष्मी को | जातवेदः = हे अग्निदेव | म आवह = मेरे लिए ले आइए

सरल अर्थ: हे अग्निदेव (जातवेदा)! सोने जैसे रंग वाली, हरिणी जैसी कोमल, सोने और चाँदी की मालाएँ पहनने वाली, चंद्रमा जैसी शीतल और सुनहरी लक्ष्मी को मेरे पास लाइए।

ऋचा 2

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥२॥

Roman: tāṃ ma āvaha jātavedo lakṣmīmanapagāminīm | yasyāṃ hiraṇyaṃ vindeyaṃ gāmaśvaṃ puruṣānaham ||2||

शब्द-अर्थ: तां = उन | अनपगामिनीम् = साथ न छोड़ने वाली | यस्याम् = जिनकी कृपा से | हिरण्यम् = सोना | विन्देयम् = मैं पाऊँ | गाम् अश्वम् पुरुषान् = गाय, घोड़े, सहयोगी

सरल अर्थ: हे अग्निदेव! मेरे पास उन लक्ष्मी को लाइए जो कभी साथ छोड़कर न जाएँ, और जिनकी कृपा से मुझे सोना, गायें, घोड़े और सहयोगी मिलें।

ऋचा 3

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम् ।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥३॥

Roman: aśvapūrvāṃ rathamadhyāṃ hastinādaprabodhinīm | śriyaṃ devīmupahvaye śrīrmā devī juṣatām ||3||

शब्द-अर्थ: अश्वपूर्वाम् = जिनके आगे घोड़े चलते हैं | रथमध्याम् = रथ के मध्य में विराजमान | हस्तिनादप्रबोधिनीम् = हाथी की चिंघाड़ से जागने वाली | श्रियं देवीम् = श्री देवी को | उपह्वये = मैं बुलाता हूँ | जुषताम् = स्वीकार करें

सरल अर्थ: जिनके आगे घोड़े चलते हैं, बीच में रथ है, और जो हाथियों की चिंघाड़ से जगाई जाती हैं, उन श्री देवी को मैं बुलाता हूँ। श्री देवी मुझे स्वीकार करें।

ऋचा 4

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥४॥

Roman: kāṃ sosmitāṃ hiraṇyaprākārāmārdrāṃ jvalantīṃ tṛptāṃ tarpayantīm | padme sthitāṃ padmavarṇāṃ tāmihopahvaye śriyam ||4||

शब्द-अर्थ: सोस्मिताम् = मुस्कान सहित | हिरण्यप्राकाराम् = सोने के परकोटे वाली | आर्द्राम् = दयालु | ज्वलन्तीम् = तेजस्वी | तृप्ताम् = स्वयं तृप्त | तर्पयन्तीम् = सबको तृप्त करने वाली | पद्मे स्थिताम् = कमल पर स्थित | पद्मवर्णाम् = कमल जैसे रंग वाली

सरल अर्थ: मुस्कुराती हुई, सोने के परकोटे वाली, दयालु, तेजस्वी, स्वयं तृप्त और सबको तृप्त करने वाली, कमल पर विराजमान और कमल जैसे रंग वाली श्री को मैं यहाँ बुलाता हूँ।

ऋचा 5

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥५॥

Roman: candrāṃ prabhāsāṃ yaśasā jvalantīṃ śriyaṃ loke devajuṣṭāmudārām | tāṃ padminīmīṃ śaraṇamahaṃ prapadye'lakṣmīrme naśyatāṃ tvāṃ vṛṇe ||5||

शब्द-अर्थ: प्रभासाम् = प्रकाशमान | यशसा ज्वलन्तीम् = यश से दमकती | देवजुष्टाम् = देवताओं से सेवित | उदाराम् = उदार | शरणं प्रपद्ये = शरण लेता हूँ | अलक्ष्मीः मे नश्यताम् = मेरी दरिद्रता नष्ट हो | त्वां वृणे = मैं आपको चुनता हूँ

सरल अर्थ: चंद्रमा जैसी शीतल, प्रकाशमान, यश से दमकती, देवताओं से सेवित और उदार श्री देवी की मैं शरण लेता हूँ। मेरी दरिद्रता और अशुभता नष्ट हो। मैं आपको ही चुनता हूँ।

ऋचा 6

आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥६॥

Roman: ādityavarṇe tapaso'dhijāto vanaspatistava vṛkṣo'tha bilvaḥ | tasya phalāni tapasānudantu māyāntarāyāśca bāhyā alakṣmīḥ ||6||

शब्द-अर्थ: आदित्यवर्णे = सूर्य जैसे तेज वाली | तपसः अधिजातः = तप से उत्पन्न | वनस्पतिः = वृक्ष | बिल्वः = बेल | तस्य फलानि = उसके फल | मायान्तरायाः = भीतर की बाधाएँ | बाह्याः = बाहर की | अलक्ष्मीः = दरिद्रता

सरल अर्थ: हे सूर्य जैसे तेज वाली देवी! आपके तप से बेल का वृक्ष उत्पन्न हुआ। उसके फल मेरे भीतर और बाहर की बाधाओं और दरिद्रता को दूर करें।

ऋचा 7

उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥७॥

Roman: upaitu māṃ devasakhaḥ kīrtiśca maṇinā saha | prādurbhūto'smi rāṣṭre'smin kīrtimṛddhiṃ dadātu me ||7||

शब्द-अर्थ: उपैतु = समीप आएँ | देवसखः = देवताओं के मित्र (कुबेर) | कीर्तिः = यश | मणिना सह = मणि के साथ | प्रादुर्भूतः अस्मि = मैं जन्मा हूँ | राष्ट्रे = राष्ट्र में | ऋद्धिम् = समृद्धि

सरल अर्थ: देवताओं के मित्र (कुबेर) और कीर्ति, मणि के साथ मेरे पास आएँ। मैं इस राष्ट्र में जन्मा हूँ। मुझे यश और समृद्धि दीजिए।

ऋचा 8

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥८॥

Roman: kṣutpipāsāmalāṃ jyeṣṭhāmalakṣmīṃ nāśayāmyaham | abhūtimasamṛddhiṃ ca sarvāṃ nirṇuda me gṛhāt ||8||

शब्द-अर्थ: क्षुत्पिपासामलाम् = भूख, प्यास और मलिनता वाली | ज्येष्ठाम् = बड़ी बहन | नाशयामि = मैं दूर करता हूँ | अभूतिम् = अशोभा | असमृद्धिम् = कमी | निर्णुद = बाहर कीजिए | गृहात् = घर से

सरल अर्थ: भूख, प्यास और मलिनता से जुड़ी बड़ी बहन अलक्ष्मी, यानी दरिद्रता को मैं दूर करता हूँ। मेरे घर से सारी अशोभा और कमी को बाहर कीजिए।

ऋचा 9

गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥९॥

Roman: gandhadvārāṃ durādharṣāṃ nityapuṣṭāṃ karīṣiṇīm | īśvarīṃ sarvabhūtānāṃ tāmihopahvaye śriyam ||9||

शब्द-अर्थ: गन्धद्वाराम् = सुगंध से पहचानी जाने वाली | दुराधर्षाम् = जिन्हें कोई दबा न सके | नित्यपुष्टाम् = सदा पुष्ट | करीषिणीम् = गोधन से भरपूर | ईश्वरीम् = स्वामिनी | सर्वभूतानाम् = सब प्राणियों की

सरल अर्थ: जिनकी सुगंध से उनकी उपस्थिति पहचानी जाती है, जिन्हें कोई दबा नहीं सकता, जो सदा पुष्ट रहती हैं और गोधन से भरपूर हैं, सब प्राणियों की उन स्वामिनी श्री को मैं यहाँ बुलाता हूँ।

ऋचा 10

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥१०॥

Roman: manasaḥ kāmamākūtiṃ vācaḥ satyamaśīmahi | paśūnāṃ rūpamannasya mayi śrīḥ śrayatāṃ yaśaḥ ||10||

शब्द-अर्थ: मनसः कामम् आकूतिम् = मन की इच्छा और संकल्प | वाचः सत्यम् = वाणी की सत्यता | अशीमहि = हम पाएँ | पशूनां रूपम् = पशुधन का वैभव | अन्नस्य = अन्न का | श्रयताम् = निवास करें

सरल अर्थ: हमारे मन की शुभ इच्छाएँ और संकल्प पूरे हों। हमारी वाणी में सत्य रहे। पशुधन, अन्न और सुंदरता का वैभव हमें मिले, और श्री तथा यश मुझमें निवास करें।

ऋचा 11

कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम ।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥११॥

Roman: kardamena prajā bhūtā mayi sambhava kardama | śriyaṃ vāsaya me kule mātaraṃ padmamālinīm ||11||

शब्द-अर्थ: कर्दमेन = कर्दम से | प्रजा भूता = प्रजा उत्पन्न हुई | सम्भव = आइए | वासय = बसाइए | कुले = कुल में | मातरम् = माता को | पद्ममालिनीम् = कमल माला वाली

सरल अर्थ: हे कर्दम ऋषि (लक्ष्मीजी के पुत्र)! आपसे प्रजा उत्पन्न हुई। आप मेरे पास भी आइए और कमल की माला पहनने वाली माता श्री को मेरे कुल में बसाइए।

ऋचा 12

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे ।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥१२॥

Roman: āpaḥ sṛjantu snigdhāni ciklīta vasa me gṛhe | ni ca devīṃ mātaraṃ śriyaṃ vāsaya me kule ||12||

शब्द-अर्थ: आपः = जल | सृजन्तु = रचें | स्निग्धानि = स्निग्धता, सुख | चिक्लीत = लक्ष्मीजी के पुत्र का नाम | वस = रहिए | गृहे = घर में | नि = स्थायी रूप से

सरल अर्थ: जल स्निग्धता और सुख दे। हे चिक्लीत (लक्ष्मीजी के पुत्र)! आप मेरे घर में रहिए और माता श्री देवी को मेरे कुल में स्थायी रूप से बसाइए।

ऋचा 13

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१३॥

Roman: ārdrāṃ puṣkariṇīṃ puṣṭiṃ piṅgalāṃ padmamālinīm | candrāṃ hiraṇmayīṃ lakṣmīṃ jātavedo ma āvaha ||13||

शब्द-अर्थ: आर्द्राम् = कोमल, दयालु | पुष्करिणीम् = कमलों के सरोवर वाली | पुष्टिम् = पोषण देने वाली | पिङ्गलाम् = सुनहरे वर्ण की | पद्ममालिनीम् = कमल माला वाली

सरल अर्थ: कोमल और दयालु, कमलों के सरोवर वाली, पोषण देने वाली, सुनहरे वर्ण की, कमल की माला पहनने वाली, चंद्रमा जैसी शीतल और सुनहरी लक्ष्मी को मेरे पास लाइए।

ऋचा 14

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् ।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१४॥

Roman: ārdrāṃ yaḥ kariṇīṃ yaṣṭiṃ suvarṇāṃ hemamālinīm | sūryāṃ hiraṇmayīṃ lakṣmīṃ jātavedo ma āvaha ||14||

शब्द-अर्थ: करिणीम् = हाथियों वाली | यष्टिम् = दंड धारण करने वाली | सुवर्णाम् = सुनहरे रंग की | हेममालिनीम् = सोने की माला वाली | सूर्याम् = सूर्य जैसी तेजस्वी

सरल अर्थ: दया से भरी, हाथियों और दंड वाली, सुनहरे रंग की, सोने की माला पहनने वाली, सूर्य जैसी तेजस्वी और स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे पास लाइए।

ऋचा 15

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान्विन्देयं पुरुषानहम् ॥१५॥

Roman: tāṃ ma āvaha jātavedo lakṣmīmanapagāminīm | yasyāṃ hiraṇyaṃ prabhūtaṃ gāvo dāsyo'śvānvindeyaṃ puruṣānaham ||15||

शब्द-अर्थ: प्रभूतम् = प्रचुर | गावः = गायें | दास्यः = सेविकाएँ, सहायक | अश्वान् = घोड़े | विन्देयम् = मैं पाऊँ | पुरुषान् = सहयोगी

सरल अर्थ: उन अटल रहने वाली लक्ष्मी को मेरे पास लाइए, जिनकी कृपा से मुझे प्रचुर सोना, गायें, घोड़े और सहायक मिलें।

फलश्रुति

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥१६॥

Roman: yaḥ śuciḥ prayato bhūtvā juhuyādājyamanvaham | sūktaṃ pañcadaśarcaṃ ca śrīkāmaḥ satataṃ japet ||16||

सरल अर्थ: इस श्लोक में कहा गया है कि जो शुद्ध और संयमित होकर रोज़ घी की आहुति दे और जो लक्ष्मी की कामना करे, वह श्रीसूक्त की पंद्रह ऋचाओं का नियम से जप करे। यह श्रद्धा की बात है, कोई पक्का वादा नहीं।

श्रीसूक्त के साथ पढ़े जाने वाले अतिरिक्त श्लोक

पंद्रह ऋचाओं के बाद परंपरा में कई और श्लोक पढ़े जाते हैं। इनमें लक्ष्मीजी को नमस्कार, उनके चरणों में रहने की प्रार्थना, और क्रोध, लोभ तथा बुरे विचारों से बचने की बात है। संख्या और क्रम अलग-अलग पुस्तकों में थोड़ा अलग हो सकते हैं।

अतिरिक्त श्लोक 1: चरणों में स्थान की प्रार्थना

पद्मानने पद्मिनि पद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि ।
विश्वप्रिये विष्णुमनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व ॥

सरल अर्थ: हे कमल जैसे मुख वाली, कमल पर रहने वाली, कमल के पत्तों जैसी, कमल से प्रेम करने वाली, कमल की पंखुड़ी जैसी बड़ी आँखों वाली! हे सबकी प्रिय और विष्णुजी के मन के अनुकूल रहने वाली देवी! अपने चरणकमल मेरे पास रखिए, यानी मुझे अपनी कृपा दीजिए।

अतिरिक्त श्लोक 2

पुत्रपौत्रं धनं धान्यं हस्त्यश्वाजाविगोरथम् ।
प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे ॥

सरल अर्थ: आप संतान, धन-धान्य और पशुओं की देने वाली, और सब प्राणियों की माता हैं। आप मुझे दीर्घायु और परिवार का सुख दीजिए।

अतिरिक्त श्लोक 3: धन देने वाले देवताओं का स्मरण

धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः ।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणो धनमश्विना ॥

सरल अर्थ: अग्नि भी धन है, वायु भी धन है, सूर्य भी धन है और वसु देवता भी धन हैं। इन्द्र, बृहस्पति, वरुण और अश्विनीकुमार भी धन के रूप हैं। इस श्लोक का भाव यह है कि संसार की सारी शक्तियाँ ही हमारी असली संपदा हैं।

अतिरिक्त श्लोक 4

वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा ।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः ॥

सरल अर्थ: हे गरुड़ (विनता के पुत्र)! आप सोम का पान कीजिए। वृत्र का वध करने वाले इन्द्र भी सोम का पान करें। जो सोम और धन के स्वामी हैं, वे मुझे भी धन दें।

अतिरिक्त श्लोक 5: मन की शुद्धता

न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः ।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां श्रीसूक्तजापिनाम् ॥

सरल अर्थ: कहा गया है कि जिन पुण्यात्मा भक्तों में श्रीसूक्त का जप होता है, उनके मन में क्रोध, ईर्ष्या, लालच और बुरे विचार नहीं टिकते। यह श्लोक सिखाता है कि लक्ष्मीजी की कृपा के साथ अच्छा मन भी चाहिए।

अतिरिक्त श्लोक 6: लक्ष्मीजी की वंदना

सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुकगन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥

सरल अर्थ: हे कमल में निवास करने वाली, हाथ में कमल लिए, उजले वस्त्र, सुगंध और माला से सजी हुई, भगवती, हरि (विष्णुजी) की प्रिय, मनमोहक देवी! आप तीनों लोकों को ऐश्वर्य देने वाली हैं। आप मुझ पर प्रसन्न हों।

अतिरिक्त श्लोक 7: नमस्कार

विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम् ।
लक्ष्मीं प्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम् ॥

सरल अर्थ: विष्णुजी की पत्नी, क्षमा करने वाली, माधव को प्रिय, लक्ष्मी देवी, जो अच्युत (विष्णुजी) की प्यारी सखी हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।

अतिरिक्त श्लोक 8: लक्ष्मी गायत्री

ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि ।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥

सरल अर्थ: हम महालक्ष्मी को जानें, हम विष्णुजी की पत्नी का ध्यान करें। वे लक्ष्मी हमारी बुद्धि को सही रास्ते पर प्रेरित करें।

अतिरिक्त श्लोक 9: ऋषि और देवता

आनन्दः कर्दमः श्रीदश्चिक्लीत इति विश्रुताः ।
ऋषयः श्रियः पुत्राश्च श्रीर्देवीर्देवता मताः ॥

सरल अर्थ: आनंद, कर्दम, श्रीद और चिक्लीत, ये लक्ष्मीजी के पुत्र कहे जाते हैं और इन्हें इस सूक्त के ऋषि माना गया है। देवता स्वयं श्री देवी मानी गई हैं।

अतिरिक्त श्लोक 10: कमियों से मुक्ति की प्रार्थना

ऋणरोगादिदारिद्र्यपापक्षुदपमृत्यवः ।
भयशोकमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥

सरल अर्थ: कर्ज़, रोग, गरीबी, पाप, भूख, अकाल मृत्यु, भय, शोक और मन का संताप मेरे जीवन से सदा दूर रहें। यह एक प्रार्थना है। इसे इलाज या आर्थिक सलाह की जगह नहीं समझना चाहिए। रोग हो तो डॉक्टर को दिखाएँ और पैसों के फ़ैसले सोच-समझकर लें।

अतिरिक्त श्लोक 11: अंतिम आशीर्वाद

श्रीर्वर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाविधात्पवमानं महीयते ।
धनं धान्यं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः ॥

सरल अर्थ: श्री से तेज, लंबी आयु, स्वास्थ्य, पवित्रता और सम्मान की प्राप्ति होती है। धन, अन्न, पशु, संतान और सौ वर्ष की लंबी आयु की कामना की गई है। यह श्रद्धा की बात है, कोई पक्का वादा नहीं।

॥ ऋग्वेदोक्तं श्रीसूक्तं सम्पूर्णम् ॥

कठिन शब्दों के आसान अर्थ

शब्दआसान अर्थ
जातवेदाअग्निदेव का एक नाम
हिरण्यसोना
हिरण्मयीस्वर्णमयी, सुनहरी
स्रज्माला
अनपगामिनीजो साथ छोड़कर न जाए
उपह्वयेमैं बुलाता हूँ
आर्द्राकोमल, दयालु
पद्मकमल
अलक्ष्मीदरिद्रता, अशुभता
करीषिणीगोधन से भरपूर
कर्दम, चिक्लीतलक्ष्मीजी के पुत्रों के नाम
देवसखदेवताओं के मित्र, कुबेर
वैनतेयगरुड़ (विनता के पुत्र)
सरसिज, सरोजकमल
सन्निधत्स्वपास रखिए, स्थापित कीजिए

चार दिन में याद करने का तरीका

  • पहला दिन: ऋचा 1 और 2। इनमें "हिरण्यवर्णां" और "तां म आवह" दो बार आते हैं, इसलिए आगे आसानी होगी।
  • दूसरा दिन: ऋचा 3 से 8।
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✍
श्रवण झा

यह लेख संपादकीय नीति के अनुसार तैयार किया गया है। कोई त्रुटि दिखे तो हमें बताएँ · संपादकीय नीति

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