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गणेश श्लोक
श्लोक/सुभाषित

गणेश श्लोक

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
📖 स्रोत: गणेश पुराण
भावार्थ:
यह श्लोक भगवान गणेश की स्तुति में है। किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में इसका पाठ विघ्नों के नाश हेतु किया जाता है।
यथा तमो नाशयितुं प्रभाते
भानुः स्वयं लोकमलं करोति।
तथा समारम्भकृतेषु कार्येषु
गणेश एको विघ्नविनाशकर्ता॥
अज्ञानपङ्के पतितस्य जन्तोः
करावलम्बं विदधाति बुद्धिः।
या बुद्धिदाता गणनायकस्य
प्रसादजा सा हृदि सन्निधत्ते॥
न यज्ञकार्यं न च शास्त्रपाठः
न दानदीक्षा न तपःप्रवृत्तिः।
सिध्येत किञ्चित् प्रणिपातहीना
यत्रादिमः पूज्यते विघ्ननाथः॥
यथा विनाऽर्थं न हि शब्दशोभा
विनाऽधिनाथं न च सिद्धिकार्यम्।
तथा जगत्यां प्रथमं प्रणम्य
गणेशमेव प्रविशन्ति सन्तः॥
न शस्त्रतेजः न च बाहुबाहुः
न क्रोधनादो न च भीषणास्यः।
कृपैकशक्त्या विनिहन्ति विघ्नान्
स देवदेवो गणनायकः स्यात्॥
यथा नदी मार्गमवाप्य शुद्धं
सागरमेवाभिमुखी प्रयाति।
तथा मनो विघ्नविनाशकस्य
प्रसादयोगात् सफलं प्रयाति॥
नादेन युक्ता न च नादहीना
बुद्धिः स्वभावेन विवेकयुक्ता।
यस्य प्रसादात् प्रविशन्ति सिद्धिं
तं विघ्नराजं सततं नमामि॥
यथा शिशोर्मातृकृपावलम्बः
भयं विनाश्य स्वपथं प्रदर्शेत्।
तथा गणेशः शरणागतानां
विघ्नान् निहत्य शुभमार्गदर्शी॥
न रूपगर्वो न च वंशमानः
नैव श्रुतिर्नापि च बाहुशक्तिः।
एकं हि कारणमिहास्ति सिद्धेः
गणेशपादार्पितमानसत्वम्॥
यथा प्रभाते कमलं विकस्रं
तमोविनाशे रविणा प्रवृद्धम्।
तथा हि चित्तं गणनायकस्य
प्रसादयोगात् प्रसरं प्रयाति॥
न क्लेशबाधा न च संशयाश्च
न विघ्नराशिर्न च दैन्यमेव।
यत्र स्मृतो विघ्नविनायकः स्यात्
तत्रैव सिद्धिः स्वयमेव याति॥
गणानधिश्याय विवेकमूर्तये
विघ्नैकहन्त्रे करुणानिधये।
समस्तकार्यप्रथमप्रपूज्ये
श्रीविघ्नराजाय नमो नमस्ते॥
📖 स्रोत: गणेश स्तुति (संस्कृत)