शिवजी की आरती (जय शिव ओंकारा)
परिचय
सनातन धर्म और शिवोपासना में भगवान शिव की आरती 'जय शिव ओंकारा' का अत्यंत पवित्र और सर्वव्यापी स्थान है। यह आरती संपूर्ण उत्तर भारत और देश-विदेश के शिव मंदिरों तथा घरों में महाशिवरात्रि, सावन मास और प्रदोष व्रत के पावन अवसरों पर पूरी श्रद्धा के साथ गाई जाती है। इस आरती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें त्रिगुणात्मक स्वरूप (ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव) तथा भगवान भोलेनाथ के डमरू, त्रिशूल, जटा में गंगा और मृगछाला धारण करने वाले साक्षात् कल्याणकारी स्वरूप का बहुत ही सुंदर दर्शन होता है।
आरती का पाठ (सम्पूर्णम)
जय शिव ओंकारा, हर जय शिव ओंकारा ।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्धांगी धारा । हर-हर-हर महादेव ॥ १ ॥
एकानन चतुरानन पञ्चानन राजै। हो शिव......
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजै । हर-हर-हर महादेव ॥ २ ॥
दो भुज चार चतुर्भुज, दशमुख अति सोहे। हो शिव....
तीनों रुप निरखता, त्रिभुवन जन मोहे । ॐ हर-हर-हर महादेव ॥ ३ ॥
अक्षमाला वनमाला रुण्डमाला धारी। हो शिव...
चन्दन मृगमद चन्दा भाले शुभकारी । हर-हर-हर महादेव ॥ ४ ॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघाम्बर अङ्गे । हो शिव......
सनकादिक गरुडादिक भूतादिक सङगे । हर-हर-हर महादेव ॥ ५ ॥
कर मध्ये सुकमण्डलु चक्र त्रिशूल धरता। हो शिव......
जगकर्ता जगभर्ता जगपालन कर्ता । ॐ हर-हर-हर महादेव ॥ ६ ॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। हो शिव.....
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका ।
हर-हर-हर महादेव ॥ ७ ॥
काशी में विश्वनाथ विराजै नन्दी ब्रह्मचारी। हो शिव.....
नित उठ दर्शन पावै महिमा अति भारी ।
हर-हर-हर महादेव ॥ ८ ॥
त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे। हो शिव....
भनत शिवानन्द स्वामी मनवाञ्छित फल पावे ।
ॐ हर-हर-हर महादेव ॥ ९ ॥
जय शिव ओंकार, हो मन भज शिव ओंकारा।
हो मन रट शिव ओंकारा, हो शिव गल रुण्डमाला ।
हो शिव ओढत मृगछाला, हो शिव पार्वती प्यारा ।
हो शिव ऊपर जलधारा, हो शिव पिबत भंगप्याला ।
हो शिव रहते मतवाला, हो शिव जय-जय-जय कारा ।
जटा में गंग विराजत ओढत मृगछाला ।
हर-हर-हर महादेव ॥ १० ॥
आरती का भावार्थ एवं सार
इस आरती के माध्यम से साधक भगवान शिव के उस विराट स्वरूप की वंदना करता है जिसमें सृष्टि के संचालक ब्रह्मा, विष्णु और खुद महेश्वर का अभेद भाव समाहित है। भगवान शिव के विभिन्न मुखों, वस्त्रों (बाघाम्बर), आभूषणों (रुण्डमाला, चन्द्रमा) और उनके दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का स्मरण करते हुए भक्त अपनी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए उनकी शरण में जाता है। अंत में स्वामी शिवानन्द जी कहते हैं कि जो कोई भी इस त्रिगुण स्वामी की आरती गाता है, उसे मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।
आरती करने का समय एवं विधि
- शुभ समय: प्रातःकाल स्नान के बाद या संध्या बेला (प्रदोष काल) में शिवलिंग या भगवान शिव की तस्वीर के समक्ष इस आरती का गान करना श्रेष्ठ माना गया है।
- विशेष अवसर: महाशिवरात्रि, सावन के सोमवार, त्रयोदशी (प्रदोष व्रत) और दैनिक पूजा के समापन पर इसे विशेष रूप से गाया जाता है।
- विधि: भगवान शिव के समक्ष शुद्ध घी का दीपक और धूप प्रज्वलित करें। जल, बेलपत्र और अक्षत अर्पित करने के पश्चात समवेत स्वर में कर्पूर या दीपक के साथ यह आरती करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
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प्रश्न: शिवजी की प्रसिद्ध आरती "जय शिव ओंकारा" के रचयिता कौन हैं?
उत्तर: इस आरती के अंतिम छंद के अनुसार इसके रचयिता स्वामी शिवानन्द जी माने जाते हैं। -
प्रश्न: क्या इस आरती का पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है?
उत्तर: हाँ, घर या मंदिर में प्रतिदिन संध्या के समय इस आरती का गान करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा और शांति बनी रहती है।
