परिचय
किसी भी पूजा, हवन या यज्ञ के शुरू में एक तय क्रम से मंत्र पढ़े जाते हैं। सबसे पहले स्वस्तिवाचन होता है, जिसकी शुरुआत "ॐ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" से होती है। फिर शांतिपाठ, फिर गणेशजी और सब देवताओं को नमस्कार, गणेशजी के 12 नाम, ध्यान-श्लोक और मंगल श्लोक होते हैं, और आखिर में "वक्रतुण्ड महाकाय" मंत्र आता है। इस लेख में यह पूरा क्रम एक ही जगह दिया है। हर मंत्र मूल रूप में, फिर तोड़कर, और उसके बाद आसान हिंदी अर्थ के साथ है।
पूरा क्रम एक नज़र में
- भाग 1: स्वस्तिवाचन के 10 मंत्र ("आ नो भद्राः..." से "अदितिर्द्यौः..." तक)
- भाग 2: शांतिपाठ, अभय की प्रार्थना और "सुशान्तिर्भवतु"
- भाग 3: प्रारंभिक नमस्कार मंत्र
- भाग 4: गणेशजी के 12 नाम
- भाग 5: गणेशजी का ध्यान
- भाग 6: 10 मंगल श्लोक, जिनमें आखिरी "वक्रतुण्ड महाकाय..." है
अलग-अलग परंपराओं में क्रम और मंत्रों की संख्या में थोड़ा अंतर हो सकता है। अपनी कुल-परंपरा या पुरोहित के अनुसार चलें।
तोड़कर पढ़ने का आसान तरीका
हर मंत्र पहले मूल रूप में दिया है, उसके नीचे वही मंत्र छोटे टुकड़ों में तोड़कर दिया है। हाइफ़न (-) का मतलब है हल्का रुकना। पहले टूटी हुई पंक्तियाँ धीरे-धीरे पढ़ें, फिर वही पंक्ति बिना रुके जोड़कर बोलें। तोड़ने में कोई अक्षर बदला या हटाया नहीं गया है। वैदिक मंत्र होने के कारण इनका स्वर-सहित उच्चारण गुरु या पुरोहित से सुनकर सीखना सबसे अच्छा है। यहाँ पाठ बिना स्वर-चिह्न के दिया गया है, ताकि कोई भी आसानी से पढ़ सके।
उच्चारण के पाँच आसान सूत्र
- ऋ: "सुमतिर्ऋजूयताम्" जैसे शब्दों में "ऋ" को "रि" की तरह बोलते हैं।
- विसर्ग (ः): "भद्राः", "देवाः", "शान्तिः", "नमः" के अंत में हल्की 'ह' जैसी ध्वनि आती है, झटके से नहीं।
- ऽ (अवग्रह): "विश्वतोऽदब्धासो", "नमोऽस्तु" में ऽ का मतलब है कि एक 'अ' दबा हुआ है। इसे हल्का जोड़कर बोलें।
- जुड़े हुए अक्षर: "ग्रावाणः", "व्यशेम", "तुष्टुवांसः", "ढुण्ढिं" को पहले अक्षर-अक्षर करके पढ़ें, फिर जोड़ें।
- लंबे शब्द: "सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये" जैसे शब्दों को टुकड़ों में तोड़कर पढ़ें।
भाग 1: स्वस्तिवाचन के 10 मंत्र
मंत्र 1
ॐ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः ।
देवा नो यथा सदमिद्वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे ॥१॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतो-ऽदब्धासो अपरीतास उद्-भिदः
देवा नो यथा सदमिद्-वृधे असन्-नप्रायुवो रक्षितारो दिवे-दिवे ॥१॥
सरल अर्थ: चारों दिशाओं से हमारे पास शुभ और अच्छे विचार आएँ। ऐसे विचार, जिन्हें कोई दबा न सके, जिन्हें कोई रोक न सके और जो हमें ऊपर उठाएँ। देवता रोज़ बिना आलस्य किए हमारी रक्षा करें और हमारी उन्नति बढ़ाते रहें।
मंत्र 2
देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम् ।
देवानां सख्यमुपसेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे ॥२॥
तोड़कर पढ़ें:
देवानां भद्रा सुमतिर्-ऋजूयतां देवानां रातिर-भि नो नि वर्तताम्
देवानां सख्य-मुपसेदि-मा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे ॥२॥
सरल अर्थ: जो सीधे और सच्चे रास्ते पर चलते हैं, उन पर देवताओं की कल्याणकारी बुद्धि और कृपा रहती है। वह कृपा हमारी तरफ़ भी आए। हम देवताओं की मित्रता पाएँ, और देवता हमारी आयु बढ़ाएँ, ताकि हम अच्छी तरह जी सकें।
मंत्र 3
तान्पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम् ।
अर्यमणं वरुणं सोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत् ॥३॥
तोड़कर पढ़ें:
तान्-पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्र-मदितिं दक्ष-मस्रिधम्
अर्यमणं वरुणं सोम-मश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्-करत् ॥३॥
सरल अर्थ: हम प्राचीन समय की स्तुति-वाणी से उन देवताओं को बुलाते हैं: भग, मित्र, अदिति, दक्ष, अर्यमा, वरुण, सोम और दोनों अश्विनीकुमार। सौभाग्य देने वाली देवी सरस्वती हमें सुख दें।
मंत्र 4
तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः ।
तद्ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम् ॥४॥
तोड़कर पढ़ें:
तन्-नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्-माता पृथिवी तत्-पिता द्यौः
तद्-ग्रावाणः सोम-सुतो मयोभुवस्-तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम् ॥४॥
सरल अर्थ: हवा हमारे लिए सुख देने वाली औषधि की तरह बहे। माता पृथ्वी और पिता आकाश भी हमें वही सुख और स्वास्थ्य दें। यज्ञ में सोम निकालने वाले पत्थर भी सुखदायी हों। हे अश्विनीकुमारो, आप दोनों हमारी यह प्रार्थना सुनिए।
मंत्र 5
तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम् ।
पूषा नो यथा वेदसामसद्वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये ॥५॥
तोड़कर पढ़ें:
तमी-शानं जगतस्-तस्थुषस्-पतिं धियं-जिन्व-मवसे हूमहे वयम्
पूषा नो यथा वेदसा-मसद्-वृधे रक्षिता पायुर-दब्धः स्वस्तये ॥५॥
सरल अर्थ: जो चलने वाले और स्थिर, दोनों तरह के जगत के स्वामी हैं और जो बुद्धि को प्रेरणा देते हैं, उन्हें हम अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं। पूषा देवता हमारी संपत्ति बढ़ाएँ और कभी न हारने वाले रक्षक बनकर हमारा कल्याण करें।
मंत्र 6
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥६॥
तोड़कर पढ़ें:
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्ध-श्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्व-वेदाः
स्वस्ति नस्-तार्क्ष्यो अरिष्ट-नेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्-दधातु ॥६॥
सरल अर्थ: जिनकी कीर्ति दूर-दूर तक फैली है, वे इन्द्र हमारा कल्याण करें। सब कुछ जानने वाले पूषा हमारा कल्याण करें। बाधाओं को दूर करने वाले तार्क्ष्य (गरुड़) हमारा कल्याण करें। और बृहस्पति भी हमें कल्याण दें। यह सबसे प्रसिद्ध स्वस्तिवाचन मंत्र है।
मंत्र 7
पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः ।
अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह ॥७॥
तोड़कर पढ़ें:
पृषद्-अश्वा मरुतः पृश्नि-मातरः शुभं-यावानो विदथेषु जग्मयः
अग्नि-जिह्वा मनवः सूर-चक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्-निह ॥७॥
सरल अर्थ: चितकबरे घोड़ों वाले मरुद्गण, जो शुभ मार्ग से चलते हैं और यज्ञों में पहुँचते हैं, जिनकी वाणी अग्नि जैसी तेज़ और दृष्टि सूर्य जैसी है, वे सब देवता अपनी रक्षा के साथ यहाँ आएँ।
मंत्र 8
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥८॥
तोड़कर पढ़ें:
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमा-क्षभिर्-यजत्राः
स्थिरैर-ङ्गैस्-तुष्टुवां-सस्-तनूभिर्-व्यशेम देवहितं यदायुः ॥८॥
सरल अर्थ: हे देवताओ! हम अपने कानों से शुभ सुनें और आँखों से शुभ देखें। मज़बूत अंगों और स्वस्थ शरीर के साथ आपकी स्तुति करते हुए हम वह पूरी आयु जिएँ, जो देवताओं के लिए भी हितकारी हो।
मंत्र 9
शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम् ।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥९॥
तोड़कर पढ़ें:
शत-मिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्-चक्रा जरसं तनूनाम्
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषता-युर्-गन्तोः ॥९॥
सरल अर्थ: हे देवताओ! हमारी आयु के सौ वर्ष आपके पास ही हैं, जहाँ हमारे शरीरों को बुढ़ापा आता है और जहाँ पुत्र भी पिता बन जाते हैं। इस बीच आप हमारी आयु को बीच रास्ते में न काटिए।
मंत्र 10
अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः ।
विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् ॥१०॥
तोड़कर पढ़ें:
अदितिर्-द्यौर-दितिर-न्तरिक्ष-मदितिर्-माता स पिता स पुत्रः
विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्-जात-मदितिर्-जनित्वम् ॥१०॥
सरल अर्थ: अदिति, यानी असीम दिव्य शक्ति ही आकाश है, वही अंतरिक्ष है, वही माता है, वही पिता और वही पुत्र है। सब देवता, पाँचों वर्ग के लोग, जो जन्म ले चुका और जो जन्म लेगा, सब कुछ अदिति ही है। इस मंत्र का भाव यह है कि पूरा संसार एक ही दिव्य शक्ति से जुड़ा है।
भाग 2: शांतिपाठ
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः ।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ द्यौः शान्तिर-न्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिर-आपः शान्तिर-ओषधयः शान्तिः
वनस्पतयः शान्तिर्-विश्वे देवाः शान्तिर्-ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिर्-एधि
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
सरल अर्थ: आकाश में शांति हो, अंतरिक्ष में शांति हो, पृथ्वी पर शांति हो, जल में शांति हो, जड़ी-बूटियों में शांति हो, वृक्षों में शांति हो, सब देवताओं में शांति हो, ब्रह्म में शांति हो, सबमें शांति हो, और वह शांति मुझे भी मिले। तीन बार "शांतिः" इसलिए बोला जाता है कि शांति अपने भीतर, अपने आसपास और संसार, तीनों जगह बनी रहे।
अभय की प्रार्थना
ॐ यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु ।
शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु
शं नः कुरु प्रजाभ्यो-ऽभयं नः पशुभ्यः ॥
सरल अर्थ: हे प्रभु! आप जहाँ-जहाँ से भी हमारी रक्षा करना चाहें, वहाँ से हमें भय-रहित कीजिए। हमारी संतान और पशुओं को भी सुख और निर्भयता दीजिए।
अंतिम शांति वचन
ॐ सुशान्तिर्भवतु ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ सु-शान्तिर्-भवतु ॥
सरल अर्थ: उत्तम शांति हो।
भाग 3: प्रारंभिक नमस्कार मंत्र
पूजा के आरंभ में एक-एक करके सब देवताओं, माता-पिता और बड़ों को नमस्कार किया जाता है।
ॐ श्रीमन्महागणाधिपतये नमः ।
अर्थ: गणों के स्वामी श्रीगणेश को नमस्कार।
लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः ।
अर्थ: लक्ष्मीजी और नारायण को नमस्कार।
उमामहेश्वराभ्यां नमः ।
अर्थ: उमा (पार्वती) और महेश्वर (शिव) को नमस्कार।
वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः ।
अर्थ: वाणी की देवी सरस्वती और ब्रह्माजी को नमस्कार।
शचीपुरन्दराभ्यां नमः ।
अर्थ: शची और इन्द्र (पुरन्दर) को नमस्कार।
मातृपितृचरणकमलेभ्यो नमः ।
अर्थ: माता और पिता के चरणकमलों को नमस्कार।
इष्टदेवताभ्यो नमः ।
अर्थ: अपने इष्टदेव को नमस्कार।
कुलदेवताभ्यो नमः ।
अर्थ: अपने कुल के देवता को नमस्कार।
ग्रामदेवताभ्यो नमः ।
अर्थ: अपने गाँव के देवता को नमस्कार।
वास्तुदेवताभ्यो नमः ।
अर्थ: घर या भूमि के देवता को नमस्कार।
स्थानदेवताभ्यो नमः ।
अर्थ: जिस स्थान पर पूजा हो रही है, वहाँ के देवता को नमस्कार।
सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः ।
अर्थ: सब देवताओं को नमस्कार।
सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः ।
अर्थ: सब ब्राह्मणों को नमस्कार।
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय श्रीमन्महागणाधिपतये नमः ।
अर्थ: सिद्धि और बुद्धि के साथ विराजमान श्रीगणेश को नमस्कार।
भाग 4: गणेशजी के 12 नाम
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥
तोड़कर पढ़ें:
सुमुखश्-चैकदन्तश्-च कपिलो गज-कर्णकः
लम्बोदरश्-च विकटो विघ्न-नाशो विनायकः
धूम्र-केतुर्-गणाध्यक्षो भाल-चन्द्रो गजाननः
द्वादशै-तानि नामानि यः पठेच्-छृणुया-दपि
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्-तस्य न जायते
सरल अर्थ: ये गणेशजी के बारह नाम हैं: सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्णक, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाश, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र और गजानन। श्लोक में कहा गया है कि जो इन्हें पढ़ता या सुनता है, उसके काम में विद्या शुरू करते समय, विवाह में, घर में प्रवेश या यात्रा पर निकलते समय, युद्ध में और संकट में कोई विघ्न नहीं आता। यह श्रद्धा की बात है, कोई पक्का वादा नहीं।
| नाम | आसान अर्थ |
|---|---|
| सुमुख | सुंदर मुख वाले |
| एकदन्त | एक दाँत वाले |
| कपिल | कपिल वर्ण (भूरे रंग) वाले |
| गजकर्णक | हाथी जैसे कानों वाले |
| लम्बोदर | बड़े पेट वाले |
| विकट | विशाल रूप वाले |
| विघ्ननाश | विघ्नों को मिटाने वाले |
| विनायक | सबके विशेष नायक |
| धूम्रकेतु | धुएँ जैसे रंग की ध्वजा वाले |
| गणाध्यक्ष | गणों के अध्यक्ष |
| भालचन्द्र | माथे पर चंद्रमा वाले |
| गजानन | हाथी के मुख वाले |
भाग 5: गणेशजी का ध्यान
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
तोड़कर पढ़ें:
शुक्लाम्बर-धरं देवं शशि-वर्णं चतुर्भुजम्
प्रसन्न-वदनं ध्यायेत्-सर्व-विघ्नो-पशान्तये
सरल अर्थ: जो सफ़ेद वस्त्र पहने हैं, चंद्रमा जैसे उजले वर्ण वाले हैं, चार भुजाओं वाले हैं और जिनका मुख प्रसन्न है, उन देव का सब विघ्नों की शांति के लिए ध्यान करना चाहिए।
भाग 6: मंगल श्लोक (अंत में "वक्रतुण्ड महाकाय")
श्लोक 1
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥१॥
तोड़कर पढ़ें:
सर्व-मङ्गल-माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ-साधिके
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमो-ऽस्तु ते ॥१॥
सरल अर्थ: हे सब मंगलों में भी मंगल करने वाली, कल्याणमयी, सब कार्य सिद्ध करने वाली, शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी, हे नारायणी! आपको नमस्कार।
श्लोक 2
सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम् ।
येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनं हरिः ॥२॥
तोड़कर पढ़ें:
सर्वदा सर्व-कार्येषु नास्ति तेषा-ममङ्गलम्
येषां हृदि-स्थो भगवान् मङ्गला-यतनं हरिः ॥२॥
सरल अर्थ: जिनके हृदय में मंगल के घर भगवान हरि बसते हैं, उनके किसी भी काम में कभी अमंगल नहीं होता।
श्लोक 3
तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव ।
विद्याबलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेऽङ्घ्रियुगं स्मरामि ॥३॥
तोड़कर पढ़ें:
तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्र-बलं तदेव
विद्या-बलं दैव-बलं तदेव लक्ष्मी-पते ते-ऽङ्घ्रि-युगं स्मरामि ॥३॥
सरल अर्थ: हे लक्ष्मीपति! जब मैं आपके दोनों चरणों को याद करता हूँ, तभी वही समय शुभ लग्न है, वही शुभ दिन है, वही तारों और चंद्रमा का बल है, और वही विद्या और भाग्य का बल है।
श्लोक 4
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः ।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ॥४॥
तोड़कर पढ़ें:
लाभस्-तेषां जयस्-तेषां कुतस्-तेषां पराजयः
येषा-मिन्दीवर-श्यामो हृदय-स्थो जनार्दनः ॥४॥
सरल अर्थ: जिनके हृदय में नीले कमल जैसे साँवले जनार्दन (विष्णु) बसते हैं, उन्हें लाभ और जीत मिलती है। उनकी हार कहाँ से होगी?
श्लोक 5
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥५॥
तोड़कर पढ़ें:
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्-धरः
तत्र श्रीर्-विजयो भूतिर्-ध्रुवा नीतिर्-मतिर्-मम ॥५॥
सरल अर्थ: जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और धनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ लक्ष्मी, विजय, ऐश्वर्य और स्थिर नीति रहती है। यह मेरा मत है।
श्लोक 6
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥६॥
तोड़कर पढ़ें:
अनन्याश्-चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते
तेषां नित्या-भियुक्तानां योग-क्षेमं वहाम्यहम् ॥६॥
सरल अर्थ: जो लोग किसी और का नहीं, सिर्फ़ मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन सदा लगे रहने वाले भक्तों के योग (जो पाना है) और क्षेम (जो पाया है, उसकी रक्षा) की ज़िम्मेदारी मैं उठाता हूँ।
श्लोक 7
स्मृतेः सकलकल्याणं भाजनं यत्र जायते ।
पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम् ॥७॥
तोड़कर पढ़ें:
स्मृतेः सकल-कल्याणं भाजनं यत्र जायते
पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम् ॥७॥
सरल अर्थ: जिनके स्मरण से सारा कल्याण प्राप्त होता है, उन अजन्मा और सदा रहने वाले पुरुष, भगवान हरि की मैं शरण लेता हूँ।
श्लोक 8
सर्वेष्वारम्भकार्येषु त्रयस्त्रिभुवनेश्वराः ।
देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दनाः ॥८॥
तोड़कर पढ़ें:
सर्वेष्वा-रम्भ-कार्येषु त्रयस्-त्रि-भुवनेश्वराः
देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशान-जनार्दनाः ॥८॥
सरल अर्थ: हमारे सब नए कामों की शुरुआत में तीनों लोकों के स्वामी तीन देव, ब्रह्मा, शिव और विष्णु, हमें सफलता दें।
श्लोक 9
विश्वेशं माधवं ढुण्ढिं दण्डपाणिं च भैरवम् ।
वन्दे काशीं गुहां गङ्गां भवानीं मणिकर्णिकाम् ॥९॥
तोड़कर पढ़ें:
विश्वेशं माधवं ढुण्ढिं दण्ड-पाणिं च भैरवम्
वन्दे काशीं गुहां गङ्गां भवानीं मणि-कर्णिकाम् ॥९॥
सरल अर्थ: मैं विश्वेश्वर (शिव), माधव (विष्णु), ढुण्ढिराज गणेश, दंडपाणि और भैरव की वंदना करता हूँ। साथ ही काशी, गुहा, गंगा, भवानी और मणिकर्णिका की भी वंदना करता हूँ।
श्लोक 10
वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥१०॥
तोड़कर पढ़ें:
वक्र-तुण्ड महा-काय कोटि-सूर्य-समप्रभ
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व-कार्येषु सर्वदा ॥१०॥
सरल अर्थ: हे टेढ़ी सूँड़ वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों जैसे तेज वाले देव! मेरे सब कामों को हमेशा बिना विघ्न के पूरा कीजिए।
कठिन शब्दों के आसान अर्थ
| शब्द | आसान अर्थ |
|---|---|
| स्वस्ति | कल्याण, मंगल |
| भद्र | शुभ, कल्याणकारी |
| क्रतु | संकल्प, शुभ विचार या कर्म |
| अदब्ध | जिसे कोई दबा न सके |
| सुमति | अच्छी बुद्धि |
| निविद् | प्राचीन स्तुति-वाणी |
| भेषज | औषधि |
| ग्रावा | पत्थर |
| तार्क्ष्य | गरुड़ |
| मरुत् | वायु के देवता |
| शरद् | वर्ष |
| जरस् | बुढ़ापा |
| अदिति | असीम दिव्य शक्ति, देवताओं की माता |
| द्यौ | आकाश |
| ओषधि | जड़ी-बूटी, पौधे |
| वनस्पति | वृक्ष |
| गणाधिपति | गणों के स्वामी, गणेश |
| शची | इन्द्र की पत्नी |
| पुरन्दर | इन्द्र का एक नाम |
| वाणी | सरस्वती |
| हिरण्यगर्भ | ब्रह्माजी का एक नाम |
| शुक्लाम्बर | सफ़ेद वस्त्र |
| शरण्य | शरण देने वाला |
| त्र्यम्बका | तीन नेत्रों वाली |
| इन्दीवर | नीला कमल |
| योगक्षेम | जो नहीं मिला उसकी प्राप्ति और जो मिला उसकी रक्षा |
| मङ्गलायतन | मंगल का घर |
| जनार्दन | भगवान विष्णु का एक नाम |
| निर्विघ्न | बिना बाधा के |
पाँच दिन में याद करने का तरीका
- पहला दिन: "वक्रतुण्ड महाकाय..." और "शुक्लाम्बरधरं देवं...", फिर स्वस्तिवाचन का मंत्र 6 ("स्वस्ति न इन्द्रो...")।
- दूसरा दिन: गणेशजी के 12 नाम और शांतिपाठ।
- तीसरा दिन: स्वस्तिवाचन मंत्र 1, 2 और 8।
- चौथा दिन: स्वस्तिवाचन के बाकी मंत्र 3, 4, 5, 7, 9, 10।
- पाँचवाँ दिन: प्रारंभिक नमस्कार और मंगल श्लोक 1 से 9, फिर पूरा क्रम एक बार।
- हर मंत्र का अर्थ एक बार पढ़ लें। अर्थ पता हो तो शब्द जल्दी याद रहते हैं।
पाठ कैसे करें
- कब: पूजा या हवन की शुरुआत में। तिथि और समय स्थान और परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकता है।
- कैसे: स्वच्छ स्थान पर शांत बैठें, गणेशजी के चित्र या मूर्ति के सामने दीपक जलाएँ और धीरे-धीरे पढ़ें।
- कितने मंत्र: यहाँ पूरा क्रम दिया है। कितने पढ़ने हैं, यह आपकी कुल-परंपरा या पुरोहित के अनुसार होता है।
- सावधानी: जल्दबाज़ी न करें। वैदिक मंत्रों में एक मात्रा का फ़र्क भी उच्चारण बदल देता है, इसलिए धीरे और साफ़ पढ़ें। संभव हो तो किसी जानकार से सुनकर मिला लें।
महत्व
स्वस्तिवाचन में सिर्फ़ अपने लिए नहीं, पूरे संसार के लिए शुभ की कामना है: कानों से अच्छा सुनना, आँखों से अच्छा देखना, स्वस्थ शरीर, लंबी आयु और आकाश से लेकर पौधों तक सबके लिए शांति। इसके बाद गणेशजी, माता-पिता, कुलदेवता और सब देवताओं को नमस्कार करके मन में विनम्रता और शुभ भाव बनता है। श्रद्धालु इसे पूजा की शुरुआत में मन को शांत और एकाग्र करने के लिए पढ़ते हैं। इसे चमत्कार या गारंटी की तरह नहीं, बल्कि श्रद्धा और एकाग्रता के साधन की तरह देखना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. स्वस्तिवाचन क्या होता है?
पूजा या यज्ञ की शुरुआत में पढ़े जाने वाले कल्याण और शांति के मंत्र।
2. ये मंत्र किस ग्रंथ के हैं?
स्वस्तिवाचन के मंत्र 1 से 10 ऋग्वेद के पहले मंडल के सूक्त 89 से हैं। शांतिपाठ और अभय की प्रार्थना यजुर्वेद के मंत्र हैं। बाकी श्लोक पूजन-पद्धति में प्रचलित हैं।
3. गणेशजी के 12 नाम कौन से हैं?
सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्णक, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाश, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र और गजानन।
4. क्या सभी मंत्र पढ़ना ज़रूरी है?
नहीं। यह परंपरा और पुरोहित के अनुसार अलग हो सकता है। कई जगह सिर्फ़ कुछ प्रमुख मंत्र पढ़े जाते हैं।
5. पाठ में कितना समय लगता है?
धीरे-धीरे पूरा क्रम पढ़ने में लगभग 18 से 22 मिनट।
6. शुरुआत करने वाले क्या करें?
पहले "वक्रतुण्ड महाकाय...", गणेशजी के 12 नाम और स्वस्तिवाचन का मंत्र 6 याद करें, फिर बाकी। उच्चारण किसी जानकार या ऑडियो से मिला लें।
पाठ-आधार: यज्ञ मार्तण्ड (पं. कुशेश्वर झा), पृ. 5 से 7; ऋग्वेद, मंडल 1, सूक्त 89; यजुर्वेद, अध्याय 36।
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