परिचय
"जगजननी जय जय" माँ आदिशक्ति की स्तुति में गाई जाने वाली एक भावपूर्ण आरती है। इसमें माँ को जगत की जननी मानकर उनके अनेक रूपों का स्मरण किया गया है: ब्रह्मरूपा, लक्ष्मी, सरस्वती, उमा, काली और दस महाविद्या तक। आरती के अंत में भक्त अपनी दीनता निवेदन करके माँ की करुणा और चरण-शरण की प्रार्थना करता है। यह आरती माँ दुर्गा/जगदम्बा को समर्पित है।
आरती का मूल पाठ
जगजननी माँ की आरती
जगजननी जय जय! माँ जगजननी जय! जय!
भयहारिणि, भवतारिणि, भवभावनि जय! जय!! (जगजननी जय...)
तू ही सत्-चित्-सुखमय, शुद्ध ब्रह्मरूपा।
सत्य सनातन सुन्दर, पर शिव सुर-भूपा॥ १ ॥ (माँ जगजननी जय...)
आदि अनादि अनामय, अविचल अविनाशी।
अमल अनन्त अगोचर, अज आनन्दराशी॥ २ ॥ (माँ जगजननी जय...)
अविकारी अघहारी, अकल कलाधारी।
कर्ता विधि, भर्ता हरि, हर संहारकारी॥ ३ ॥ (माँ जगजननी जय...)
तू विधिवधू, रमा तू, उमा महामाया।
मूल प्रकृति विद्या तू, तू जननी जाया॥ ४ ॥ (माँ जगजननी जय...)
राम, कृष्ण तू सीता, व्रजरानी राधा।
तू वाञ्छाकल्पद्रुम, हारिणि सब बाधा॥ ५ ॥ (माँ जगजननी जय...)
दश विद्या, नव दुर्गा, नाना शस्त्रकरा।
अष्टमातृका योगिनी, नव-नव रूप धरा॥ ६ ॥ (माँ जगजननी जय...)
तू परधामनिवासिनी, महाविलासिनी तू।
तू ही श्मशानविहारिणी, ताण्डवलासिनी तू॥ ७ ॥ (माँ जगजननी जय...)
सुर-मुनि मोहिनी सौम्या, तू शोभाधारा।
विवसन विकट-सरूपा, प्रलयमयी धारा॥ ८ ॥ (माँ जगजननी जय...)
तू ही स्नेह-सुधामयी, तू अति गरलमना।
रत्नविभूषित तू ही, तू ही अस्थि-तना॥ ९ ॥ (माँ जगजननी जय...)
मूलाधारनिवासिनी, इह-पर सिद्धिप्रदे।
कालातीता काली, कमला तू वरदे॥ १० ॥ (माँ जगजननी जय...)
शक्ति-शक्तिधर तू ही, नित्य अभेदमयी।
भेद प्रदर्शिनि वाणी, विमले! वेदत्रयी॥ ११ ॥ (माँ जगजननी जय...)
हम अति दीन दुखी माँ, विपत-जाल घेरे।
हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे॥ १२ ॥ (माँ जगजननी जय...)
निज स्वभाववश जननी, दयादृष्टि कीजै।
करुणा कर करुणामयी, चरण-शरण दीजै॥ १३ ॥ (माँ जगजननी जय...)
शब्दार्थ और भावार्थ
प्रारम्भिक टेक: हे जगत की माता, आपकी जय हो। आप भय हरने वाली, संसार-सागर से पार लगाने वाली और सृष्टि का पोषण-भाव रखने वाली हैं। हर पद के बाद यही टेक दोहराई जाती है।
पद १: माँ को सत्, चित् और आनंद स्वरूप, शुद्ध ब्रह्म के रूप में देखा गया है। वे सत्य हैं, सनातन हैं, सुन्दर हैं और देवताओं की स्वामिनी हैं। यहाँ भक्त कहता है कि जो परम सत्ता है, वही माँ का रूप है।
पद २: आदि-अनादि का अर्थ है जिसका आरम्भ नहीं। अनामय यानी दोषरहित, अविचल यानी स्थिर, अविनाशी यानी जो नष्ट नहीं होती। अमल का अर्थ निर्मल, अगोचर का अर्थ जो इन्द्रियों की पकड़ से परे है, और अज का अर्थ अजन्मा। माँ आनंद की राशि हैं।
पद ३: माँ विकार से रहित हैं, पापों को हरने वाली हैं। "अकल" का अर्थ अखंड/निराकार और "कलाधारी" का अर्थ कलाओं को धारण करने वाली। आगे कहा गया है कि ब्रह्मा के रूप में सृजन, विष्णु के रूप में पालन और शिव के रूप में संहार, तीनों कार्य माँ की ही शक्ति से होते हैं।
पद ४: यहाँ माँ को ब्रह्माणी (सरस्वती), रमा (लक्ष्मी), उमा (पार्वती) और महामाया कहा गया है। वे मूल प्रकृति हैं, विद्या हैं और सबकी जननी हैं।
पद ५: भक्त मानता है कि राम, कृष्ण, सीता और ब्रज की रानी राधा के रूप में भी वही शक्ति प्रकट होती है। "वाञ्छाकल्पद्रुम" यानी इच्छाओं के लिए कल्पवृक्ष के समान। माँ सब बाधाओं को हरने वाली हैं।
पद ६: दस महाविद्याएँ, नौ दुर्गा, अनेक शस्त्र धारण करने वाला रूप, अष्टमातृकाएँ और योगिनियाँ, ये सब माँ के ही अनेक रूप बताए गए हैं।
पद ७: माँ परमधाम में निवास करती हैं और लीला-विलास करने वाली हैं। साथ ही वे श्मशान में विहार करने वाली और ताण्डव में लास्य करने वाली भी हैं। यानी शांत और उग्र, दोनों भाव उनमें हैं।
पद ८: एक ओर माँ सौम्य रूप में देवताओं और मुनियों को मोहित करती हैं और शोभा की आधार हैं। दूसरी ओर विवस्त्र, विकट और प्रलयकारी रूप भी उन्हीं का है।
पद ९: माँ स्नेह की अमृत-धारा भी हैं और उग्र/कठोर भाव वाली भी। वे रत्नों से सजी हैं और अस्थियों की माला वाली भी। इस पद में विरोधी दिखने वाले रूपों को एक ही शक्ति में देखा गया है।
पद १०: माँ मूलाधार (कुण्डलिनी के स्थान) में निवास करती हैं और इस लोक तथा परलोक, दोनों की सिद्धि देने वाली हैं। वे काल से परे काली हैं और कमला (लक्ष्मी) रूप में वर देने वाली हैं।
पद ११: शक्ति और शक्तिमान (शिव) में नित्य अभेद है। माँ की निर्मल वाणी वेदत्रयी (ऋक्, यजुः, साम) रूप में ज्ञान कराने वाली है।
पद १२: अब भक्त अपनी बात कहता है: हम दीन-दुखी हैं, विपत्तियों के जाल में घिरे हैं, अपने दोषों से कपटी और कपूत भी हैं, फिर भी आपके ही बालक हैं।
पद १३: माँ से प्रार्थना है कि आप अपने करुणामय स्वभाव के कारण हम पर दया की दृष्टि करें और अपने चरणों की शरण दें।
आरती की सरल पाठ-विधि
- समय: आमतौर पर पूजा के अंत में, खासकर संध्या-आरती में। नवरात्रि में बहुत से परिवार सुबह और शाम दोनों समय गाते हैं।
- तैयारी: जगह साफ़ करें, माँ के चित्र या मूर्ति के सामने घी या तेल का दीपक या कपूर जलाएँ। थाली में दीप, पुष्प और अक्षत रखें।
- गाना: पहले शांत मन से माँ का ध्यान करें। फिर आरती गाते हुए थाली को माँ के सामने घड़ी की दिशा में घुमाएँ। घंटी या झाँझ धीमे सुर में बजाएँ।
- समापन: आरती के बाद थाली पर हाथ फेरकर आँखों से लगाएँ और प्रसाद बाँटें।
आरती की संख्या, बत्तियों की गिनती और बाकी नियम कुल-परंपरा या गुरु के अनुसार अलग हो सकते हैं। आपके घर में जो चलता है, वही अपनाएँ।
गाते समय किन बातों का ध्यान रखें
इस आरती की बनावट पढ़ने पर कुछ बातें साफ़ दिखती हैं, जो गाते समय काम आती हैं:
- टेक सबके लिए है। हर पद के बाद "माँ जगजननी जय" दोहराई जाती है। परिवार या मंडली में नया सदस्य पूरे पद न भी जानता हो तो टेक में साथ दे सकता है।
- पद ७ से ९ को हल्के में न पढ़ें। "श्मशानविहारिणी", "अस्थि-तना" जैसे शब्द सुनने में भारी लगते हैं, पर यहाँ भाव डराने का नहीं है। इनका मतलब है कि माँ जीवन के हर पक्ष में हैं, सुन्दर में भी और कठोर में भी। अर्थ पहले पढ़ लेंगे तो गाते समय सहज लगेगा।
- गति बदलें। शुरू के पद (१ से ६) स्थिर और धीमी-बराबर लय में अच्छे लगते हैं। पद १२ और १३ प्रार्थना हैं, इसलिए इन्हें थोड़ा और धीरे और भाव से गाएँ।
- पहले पढ़ें, फिर गाएँ। कई शब्द रोज़मर्रा की हिंदी में नहीं आते (अगोचर, अनामय, कालातीता)। एक बार ऊपर का कोश देख लेने से रटने के बजाय समझकर गाना हो जाता है।
उच्चारण के सुझाव
- "श्मशान" को श्म-शा-न की तरह बोलें, जहाँ "श्म" एक साथ बोला जाता है।
- "ताण्डव" का "ण" मूर्धन्य है (जीभ तालु की ओर मुड़ती है)।
- "वाञ्छा" में "ञ्" की नासिक्य ध्वनि है, यानी "वान्छा" के जैसा उच्चारण।
- "सिद्धिप्रदे" में "द्ध" को साफ़ बोलें।
आरती का महत्व
श्रद्धालु इस आरती को माँ के प्रति कृतज्ञता और समर्पण की अभिव्यक्ति मानते हैं। इसकी बनावट में पहले माँ के स्वरूप का गुणगान है और अंत में अपनी कमियों को स्वीकार करके शरण की प्रार्थना। इसलिए इसमें माँगने से पहले समझने और झुकने का भाव है। यह किसी फल की गारंटी नहीं, बल्कि श्रद्धा और साधना का एक सरल माध्यम है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
जगजननी माँ की आरती कब गानी चाहिए?
सामान्यतः देवी-पूजा के अंत में, खासकर नवरात्रि की सुबह-शाम की आरती में। नित्य पूजा में भी गा सकते हैं। समय और संख्या की परंपरा हर परिवार में अलग हो सकती है।
क्या यह आरती "जय अम्बे गौरी" से अलग है?
हाँ। दोनों देवी की आरतियाँ हैं, पर शब्द, छंद और भाव अलग हैं। जगजननी आरती में माँ के दार्शनिक और अनेक-रूप स्वरूप पर ज़्यादा ज़ोर है।
क्या संस्कृत जाने बिना यह आरती गा सकते हैं?
हाँ। इसमें संस्कृत के शब्द ज़्यादा हैं, पर अर्थ समझकर भाव से गाना सबसे ज़रूरी है। ऊपर दिए शब्दार्थ इसमें मदद करेंगे।
"आरती" को "नीराजन" क्यों कहते हैं?
नीराजन आरती का प्राचीन नाम है, यानी दीप आदि से देवता की आराधना करना।

