परिचय
किसी भी बड़ी पूजा की शुरुआत में सबसे पहले गणेशजी और अम्बिका (गौरी माता) का पूजन किया जाता है। इसे गणेशाम्बिका पूजन कहते हैं। इसमें दोनों का आवाहन करके उन्हें आसन, जल, स्नान, वस्त्र, चंदन, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य जैसी चीज़ें क्रम से अर्पित की जाती हैं, और हर चीज़ के साथ एक अलग मंत्र बोला जाता है। इस लेख में यह पूरा क्रम एक ही जगह दिया है। हर चरण में यह भी लिखा है कि क्या लेना है और क्या करना है (विधि)। हर मंत्र मूल रूप में, फिर तोड़कर, और उसके बाद आसान हिंदी भाव के साथ है।
पूजन का क्रम एक नज़र में
- संकल्प (अपने नाम, गोत्र और उद्देश्य के साथ, पुरोहित के अनुसार)
- गणेशजी और गौरी का आवाहन और प्रतिष्ठा
- आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन
- स्नान: पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर), गंधोदक और शुद्ध जल
- वस्त्र, उपवस्त्र, यज्ञोपवीत
- चंदन, अक्षत, फूल, दूर्वा, सिंदूर, अबीर-गुलाल, बिल्वपत्र, सुगंधित द्रव्य
- धूप, दीप, नैवेद्य, ऋतुफल, ताम्बूल, दक्षिणा
- आरती, पुष्पाञ्जलि, प्रदक्षिणा, विशेषार्घ्य
- प्रार्थना
संकल्प क्या होता है
संकल्प में पूजा करने वाला जल हाथ में लेकर अपना नाम, गोत्र, स्थान, तिथि और पूजा का उद्देश्य बोलकर कहता है कि मैं यह पूजा कर रहा हूँ। इसमें हर यजमान के नाम, गोत्र और समय के अनुसार शब्द बदलते हैं, इसलिए इसे पुरोहित के साथ या अपनी पूजा-पुस्तक से पढ़ना सबसे अच्छा है। यहाँ इसका पाठ नहीं दिया गया है।
पूजा से पहले की तैयारी
- स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा-स्थान साफ़ करें।
- पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें। यह आम परंपरा है।
- चौकी या पाटे पर साफ़ लाल या पीला कपड़ा बिछाएँ और उस पर अक्षत से आसन बनाएँ। उसी पर गणेशजी और गौरी को विराजमान करें।
- शुरुआत में तीन बार आचमन करें (हथेली में जल लेकर पिएँ), फिर जल से अपने ऊपर और पूजा-सामग्री पर छिड़काव करके शुद्धि करें।
- दीपक जलाएँ, फिर संकल्प लें।
- अगर कलश की स्थापना भी हो रही है, तो पहले कलश स्थापित करें, फिर गणेशाम्बिका पूजन करें।
यह आम पद्धति है। आपके पुरोहित या कुल-परंपरा में क्रम थोड़ा अलग हो सकता है।
पूजा की सामग्री सूची
| सामग्री | कितनी / कैसी |
|---|---|
| गणेशजी और गौरी | मूर्ति या चित्र। चाहें तो दो सुपारियाँ, जिन पर मौली लपेट दी जाए |
| चौकी या पाटा, लाल या पीला कपड़ा | एक |
| जल, गंगाजल, तांबे का लोटा, आचमनी | पर्याप्त शुद्ध जल |
| थाली या परात | स्नान और अर्घ्य का जल इकट्ठा करने के लिए |
| दूध, दही, घी, शहद, शक्कर | थोड़ा-थोड़ा, अलग-अलग पात्र में |
| अक्षत (साबुत चावल) | एक कटोरी |
| रोली, चंदन, हल्दी, सिंदूर, अबीर-गुलाल | थोड़ा-थोड़ा |
| मौली (कलावा) या वस्त्र, जनेऊ | वस्त्र और उपवस्त्र के लिए अलग-अलग |
| फूल, फूल की माला | ताज़े |
| दूर्वा | आम परंपरा में 21 दूर्वा |
| बेलपत्र | कुछ साफ़ पत्ते |
| इत्र | थोड़ा |
| धूप या अगरबत्ती | जलाने के लिए |
| घी का दीपक, बाती, माचिस | एक या दो |
| नैवेद्य (मोदक, लड्डू या मिठाई) | थाली में |
| ऋतुफल | मौसम के ताज़े फल |
| पान, सुपारी, इलायची, लौंग | ताम्बूल के लिए |
| सिक्का या दक्षिणा | अपनी श्रद्धा के अनुसार |
| कपूर, आरती की थाली, घंटी | आरती के लिए |
| साफ़ कपड़ा | स्नान के बाद पोंछने के लिए |
कुछ ज़रूरी बातें
- चीज़ें दाहिने हाथ से अर्पित करें।
- ताज़े फूल और साबुत अक्षत इस्तेमाल करें। बासी फूल और टूटे चावल नहीं।
- गणेशजी को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती। यह आम परंपरा है।
- सारी सामग्री पूजा शुरू करने से पहले अपने पास सजाकर रख लें, ताकि बीच में उठना न पड़े।
- सामग्री की मात्रा और क्रम में परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अंतर हो सकता है। अपने पुरोहित से पूछ लें।
हर चीज़ अर्पित करते समय बोलने का वाक्य
हर मंत्र के बाद यह वाक्य बोला जाता है, बस बीच में उस चीज़ का नाम बदल जाता है:
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, ____ समर्पयामि ।
अर्थ: "भू, भुवः और स्वः तीनों लोकों में गणेश और अम्बिका को नमस्कार। मैं यह ____ अर्पित करता हूँ।"
| क्रम | खाली जगह में क्या बोलें |
|---|---|
| आसन | आसनं |
| पाद्य | पादयोः पाद्यं |
| अर्घ्य | हस्तयोः अर्घ्यं |
| आचमन | आचमनीयं |
| स्नान | स्नानीयं जलं |
| दूध / दही / घी / शहद / शक्कर / पंचामृत | दुग्धस्नानं / दधिस्नानं / घृतस्नानं / मधुस्नानं / शर्करास्नानं / पंचामृतस्नानं |
| गंधोदक / शुद्ध जल | गन्धोदकस्नानं / शुद्धोदकस्नानं |
| वस्त्र / उपवस्त्र | वस्त्रं / उपवस्त्रं |
| यज्ञोपवीत | यज्ञोपवीतं |
| चंदन | चन्दनं |
| अक्षत / फूल / फूलमाला | अक्षतान् / पुष्पं / पुष्पमालां |
| दूर्वा | दूर्वाङ्कुरान् |
| सिंदूर | सिन्दूरं |
| अबीर-गुलाल | नानापरिमलद्रव्याणि |
| बिल्वपत्र | बिल्वपत्रं |
| सुगंधित द्रव्य | सुगन्धितद्रव्यं |
| धूप | धूपमाघ्रापयामि |
| दीप | दीपं दर्शयामि |
| नैवेद्य | नैवेद्यं निवेदयामि |
| ऋतुफल | ऋतुफलानि |
| ताम्बूल | ताम्बूलं |
| दक्षिणा | द्रव्यदक्षिणां |
| आरती | आरार्तिकं |
| पुष्पाञ्जलि | पुष्पाञ्जलिं |
| प्रदक्षिणा | प्रदक्षिणां |
| विशेषार्घ्य | विशेषार्घ्यं |
इस वाक्य का सटीक रूप आपकी पूजा-पुस्तक या पुरोहित की पद्धति के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है।
तोड़कर पढ़ने का आसान तरीका
हर मंत्र पहले मूल रूप में दिया है, उसके नीचे वही मंत्र छोटे टुकड़ों में तोड़कर दिया है। हाइफ़न (-) का मतलब है हल्का रुकना। पहले टूटी हुई पंक्तियाँ धीरे-धीरे पढ़ें, फिर बिना रुके जोड़कर बोलें। तोड़ने में कोई अक्षर बदला या हटाया नहीं गया है। ये वैदिक मंत्र हैं, इसलिए इनके अर्थ भाव के रूप में दिए हैं, और स्वर-सहित उच्चारण पुरोहित से सुनकर सीखना सबसे अच्छा है। यहाँ पाठ बिना स्वर-चिह्न के दिया गया है।
उच्चारण के चार आसान सूत्र
- ऋ: "ऋतायते", "ऋचः" जैसे शब्दों में "ऋ" को "रि" की तरह बोलते हैं।
- विसर्ग (ः): "नमः", "स्वः", "पतिः" के अंत में हल्की 'ह' जैसी ध्वनि।
- ऽ (अवग्रह): "पादोऽस्य" में ऽ का मतलब है कि एक 'अ' दबा हुआ है।
- जुड़े हुए अक्षर: "ज्यायाँश्च", "व्यक्रामत्", "शूघनासो" जैसे शब्दों को पहले अक्षर-अक्षर करके पढ़ें।
1. गणेशजी का आवाहन
विधि: क्या लें: दाहिने हाथ में थोड़े अक्षत (चावल) और एक फूल।
क्या करें: गणेशजी की मूर्ति या सुपारी के सामने खड़े या बैठे रहकर श्लोक और मंत्र बोलें। अंत में अक्षत-फूल उनके आसन पर छोड़ दें।
हे हेरम्ब त्वमेह्येहि अम्बिकात्र्यम्बकात्मज ।
सिद्धिबुद्धिपते त्र्यक्ष लक्षलाभपितुः पितः ॥
नागास्यं नागहारं त्वां गणराजं चतुर्भुजम् ।
भूषितं स्वायुधैर्दिव्यैः पाशाङ्कुशपरश्वधैः ॥
आवाहयामि पूजार्थं रक्षार्थं च मम क्रतोः ।
इहागत्य गृहाण त्वं पूजां यागं च रक्ष मे ॥
तोड़कर पढ़ें:
हे हेरम्ब त्वमेह्येहि अम्बिका-त्र्यम्बका-त्मज
सिद्धि-बुद्धि-पते त्र्यक्ष लक्ष-लाभ-पितुः पितः
नागास्यं नाग-हारं त्वां गणराजं चतुर्भुजम्
भूषितं स्वायुधैर्-दिव्यैः पाशाङ्कुश-परश्वधैः
आवाहयामि पूजार्थं रक्षार्थं च मम क्रतोः
इहागत्य गृहाण त्वं पूजां यागं च रक्ष मे
सरल अर्थ: हे हेरम्ब (गणेशजी)! आप आइए। आप अम्बिका और शिवजी के पुत्र हैं, सिद्धि और बुद्धि के पति हैं और तीन नेत्रों वाले हैं। हाथी के मुख वाले, नागों का हार पहनने वाले, चार भुजाओं वाले, पाश, अंकुश और फरसे जैसे दिव्य आयुधों से सजे हुए आपको मैं पूजा और अपने यज्ञ की रक्षा के लिए बुलाता हूँ। यहाँ आकर मेरी पूजा स्वीकार कीजिए और मेरे यज्ञ की रक्षा कीजिए।
ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे । निधीनां त्वा निधिपतिं हवामहे वसो मम । आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सिद्धिबुद्धिसहिताय श्रीमते गणपतये नमः । गणपतिमावाहयामि स्थापयामि ।
तोड़कर पढ़ें:
ॐ गणानां त्वा गण-पतिं हवामहे प्रियाणां त्वा प्रिय-पतिं हवामहे
निधीनां त्वा निधि-पतिं हवामहे वसो मम
आहम-जानि गर्भ-धमा त्वम-जासि गर्भ-धम्
ॐ भूर्-भुवः स्वः सिद्धि-बुद्धि-सहिताय श्रीमते गणपतये नमः
गणपति-मावाहयामि स्थापयामि
सरल अर्थ: हम आपको गणों के स्वामी, प्रिय जनों के स्वामी और निधियों के स्वामी के रूप में बुलाते हैं। हे धन के स्वामी, आप मेरे अपने हो जाइए। आगे के वाक्य का अर्थ: सिद्धि और बुद्धि के साथ विराजमान श्रीगणपति को नमस्कार। मैं गणपति का आवाहन करता हूँ और उन्हें स्थापित करता हूँ।
2. भगवती गौरी का आवाहन
विधि: क्या लें: दाहिने हाथ में अक्षत और फूल।
क्या करें: गौरी माता की मूर्ति या सुपारी (जिस पर मौली लपेटी हो) के सामने श्लोक और मंत्र बोलें। अंत में अक्षत-फूल अर्पित करें।
हेमाद्रितनयां देवीं वरदां शङ्करप्रियाम् ।
लम्बोदरस्य जननीं गौरीमावाहयाम्यहम् ॥
ॐ अम्बे अम्बिकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन । ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः गौर्यै नमः । गौरीमावाहयामि स्थापयामि ।
तोड़कर पढ़ें:
हेमाद्रि-तनयां देवीं वरदां शङ्कर-प्रियाम्
लम्बोदरस्य जननीं गौरी-मावाहयाम्यहम्
ॐ अम्बे अम्बिके-ऽम्बालिके न मा नयति कश्चन
ससस्त्य-श्वकः सुभद्रिकां काम्पील-वासिनीम्
ॐ भूर्-भुवः स्वः गौर्यै नमः
गौरी-मावाहयामि स्थापयामि
सरल अर्थ: हिमालय की पुत्री, वर देने वाली, शिवजी की प्रिय और गणेशजी की माता गौरी देवी को मैं बुलाता हूँ। दूसरा मंत्र माता को आदर के साथ पुकारने का वैदिक मंत्र है ("अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका")। अंत में: गौरी को नमस्कार, मैं गौरी का आवाहन और स्थापन करता हूँ।
3. प्रतिष्ठा (देवताओं को स्थापित करना)
विधि: क्या लें: अक्षत और फूल।
क्या करें: मंत्र बोलते हुए दोनों देवताओं पर अक्षत-फूल छोड़ें। भाव यह है कि अब वे यहाँ स्थिर रूप से विराजमान हैं।
ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञँ समिमं दधातु । विश्वे देवास इह मादयन्तामो३म्प्रतिष्ठ ॥
ॐ अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च । अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिके सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम् ।
तोड़कर पढ़ें:
ॐ मनो जूतिर्-जुषता-माज्यस्य बृहस्पतिर्-यज्ञ-मिमं तनोत्व-रिष्टं यज्ञँ समि-मं दधातु
विश्वे देवास इह मादयन्ता-मो३म्-प्रतिष्ठ
ॐ अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च
अस्यै देवत्व-मर्चायै मामहेति च कश्चन
ॐ भूर्-भुवः स्वः गणेशाम्बिके सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम्
सरल अर्थ: मेरा मन घी की आहुति को स्नेह से स्वीकार करे। बृहस्पति इस यज्ञ को बिना बाधा के फैलाएँ और इसे सँभालकर रखें। सब देवता यहाँ प्रसन्नता से रहें। आप प्रतिष्ठित हों। इस प्रतिमा में प्राण स्थिर रहें और इसमें देवत्व आए। गणेश और अम्बिका सुप्रतिष्ठित होकर वर देने वाले हों।
4. आसन
विधि: क्या लें: एक फूल या कुछ अक्षत।
क्या करें: देवताओं के बैठने के भाव से उन्हें आसन के रूप में अर्पित करें।
ॐ पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥
आगच्छ भगवन् देवस्थाने चात्र स्थिरो भव ।
यावत्पूजां करिष्यामि तावत्त्वं सन्निधौ भव ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम्
उतामृत-त्वस्येशानो यदन्नेना-तिरोहति
आगच्छ भगवन् देवस्थाने चात्र स्थिरो भव
यावत्-पूजां करिष्यामि तावत्-त्वं सन्निधौ भव
सरल अर्थ: जो हो चुका और जो होने वाला है, वह सब वही परम पुरुष हैं। वे अमरता के स्वामी हैं और अन्न से बढ़ने वाले जगत के भी ऊपर हैं। हे भगवन्! आइए और इस देवस्थान में स्थिर होकर बैठिए। जब तक मैं पूजा करूँ, तब तक आप मेरे पास रहिए।
5. पाद्य
विधि: क्या लें: आचमनी से थोड़ा शुद्ध जल।
क्या करें: जल को देवताओं के चरणों की ओर अर्पित करें। जल नीचे रखी थाली या परात में गिरने दें।
ॐ एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ एतावा-नस्य महिमा-तो ज्यायाँश्-च पूरुषः
पादो-ऽस्य विश्वा भूतानि त्रि-पाद-स्यामृतं दिवि
सरल अर्थ: यह सारा जगत उन परम पुरुष की महिमा है, और वे इससे भी बड़े हैं। सब प्राणी उनका एक अंश हैं, और उनके तीन अंश अमृत रूप होकर प्रकाशमय लोक में हैं। (चरण धोने के लिए जल अर्पित करते समय।)
6. अर्घ्य
विधि: क्या लें: आचमनी में जल, उसमें थोड़ा चंदन, अक्षत और फूल।
क्या करें: जल को हाथों की ओर अर्पित करने के भाव से थाली में छोड़ें।
ॐ त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः ।
ततो विष्वङ्व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ त्रि-पादूर्ध्व उदैत्-पुरुषः पादो-ऽस्येहा-भवत्-पुनः
ततो विष्वङ्-व्यक्रामत्-साशना-नशने अभि
सरल अर्थ: परम पुरुष तीन अंश से ऊपर उठे हुए हैं और उनका एक अंश बार-बार इस संसार में प्रकट होता है। फिर वे सब ओर फैलकर खाने वाले जीवों और बिना खाने वाली जड़ वस्तुओं, दोनों में व्याप्त हुए। (हाथ धोने के लिए जल अर्पित करते समय।)
7. आचमन
विधि: क्या लें: आचमनी से शुद्ध जल।
क्या करें: मुख शुद्धि (आचमन) के भाव से जल अर्पित करें और थाली में गिरने दें।
ॐ तस्माद्विराडजायत विराजो अधि पूरुषः ।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ तस्मा-द्विराड-जायत विराजो अधि पूरुषः
स जातो अत्य-रिच्यत पश्चाद्-भूमि-मथो पुरः
सरल अर्थ: उन परम पुरुष से विराट जगत प्रकट हुआ। उस विराट में वही पुरुष सबसे ऊपर रहा। फिर उसी से भूमि और जीवों के शरीर बने। (आचमन के लिए जल अर्पित करते समय।)
8. स्नान
विधि: क्या लें: जल का पात्र, गंगाजल, थाली या परात।
क्या करें: देवताओं की मूर्ति पर धीरे-धीरे जल चढ़ाएँ। सुपारी वाले स्वरूप पर थोड़ा-थोड़ा जल छिड़कें। नीचे थाली में पानी इकट्ठा होने दें।
ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् ।
पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ तस्मा-द्यज्ञात्-सर्व-हुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्
पशूँस्-ताँश्-चक्रे वायव्या-नारण्या ग्राम्याश्-च ये
सरल अर्थ: उस सब कुछ अर्पित हो जाने वाले यज्ञ से दही-घी जैसी वस्तुएँ बनीं और हवा में उड़ने वाले, जंगल के और गाँव के पशु उत्पन्न हुए। (स्नान के लिए जल अर्पित करते समय।)
9. पंचामृत स्नान
विधि: क्या लें: दूध, दही, घी, शहद और शक्कर, अलग-अलग छोटे पात्रों में। साथ में शुद्ध जल।
क्या करें: मंत्र के साथ एक-एक चीज़ क्रम से चढ़ाएँ: पहले दूध, फिर दही, घी, शहद और शक्कर। फिर पाँचों का मिश्रण (पंचामृत), फिर गंधोदक और अंत में शुद्ध जल से स्नान। हर चीज़ के बाद थोड़ा शुद्ध जल चढ़ाने की भी परंपरा है।
दूध
ॐ पयः पृथिव्यां पय ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धाः ।
पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम् ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ पयः पृथिव्यां पय ओषधीषु पयो दिव्य-न्तरिक्षे पयो धाः
पयस्वतीः प्र-दिशः सन्तु मह्यम्
सरल अर्थ: पृथ्वी में, औषधियों में, आकाश और अंतरिक्ष में रस और पोषण रहे। सब दिशाएँ मेरे लिए रस-भरी हों।
दही
ॐ दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः ।
सुरभि नो मुखा करत्प्र ण आयूँषि तारिषत् ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ दधि-क्राव्णो अकारिषं जिष्णो-रश्वस्य वाजिनः
सुरभि नो मुखा करत्-प्र ण आयूँषि तारिषत्
सरल अर्थ: मैं विजयी और वेगवान दधिक्रा नामक अश्व की स्तुति करता हूँ। वे हमारे मुखों को सुगंधित करें और हमारी आयु बढ़ाएँ।
घी
ॐ घृतं मिमिक्षे घृतमस्य योनिर्घृते श्रितो घृतम्वस्य धाम ।
अनुष्वधमा वह मादयस्व स्वाहाकृतं वृषभ वक्षि हव्यम् ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ घृतं मिमिक्षे घृत-मस्य योनिर्-घृते श्रितो घृत-म्वस्य धाम
अनुष्वध-मा वह मादयस्व स्वाहाकृतं वृषभ वक्षि हव्यम्
सरल अर्थ: मैं घी से अग्नि को सींचता हूँ। घी इनका घर है, इनमें घी ही बसा है। आप आहुति को देवताओं तक पहुँचाइए और स्वयं भी प्रसन्न होइए।
शहद
ॐ मधुवाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ॥
मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवँ रजः । मधु द्यौरस्तु नः पिता ॥
मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्यः । माध्वीर्गावो भवन्तु नः ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ मधुवाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्-नः सन्त्वोषधीः
मधु नक्त-मुतोषसो मधुमत्-पार्थिवँ रजः मधु द्यौर-स्तु नः पिता
मधुमान्-नो वनस्पतिर्-मधुमाँ अस्तु सूर्यः माध्वीर्-गावो भवन्तु नः
सरल अर्थ: सत्य के मार्ग पर चलने वाले के लिए हवाएँ मधुर बहें, नदियाँ मिठास बहाएँ, औषधियाँ मीठी हों। रात, सुबह और धरती की धूल मधुर हो, पिता आकाश मधुर हो। वृक्ष मधुर हों, सूर्य मधुर हो और गायें मधुर हों।
शक्कर
ॐ अपाँ रसमुद्वयसँ सूर्ये सन्तँ समाहितम् ।
अपाँ रसस्य यो रसस्तं वो गृह्णाम्युत्तममुपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम् ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ अपाँ रस-मुद्वयसँ सूर्ये सन्तँ समाहितम्
अपाँ रसस्य यो रसस्तं वो गृह्णाम्यु-त्तम-मुपयाम-गृहीतो-ऽसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिर्-इन्द्राय त्वा जुष्टतमम्
सरल अर्थ: जल का जो सार सूर्य में स्थापित है, मैं जल के उस श्रेष्ठ रस को आपके लिए स्वीकार करता हूँ। (मिठास और रस का स्मरण करते हुए शक्कर अर्पित की जाती है।)
पंचामृत
ॐ पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतसः ।
सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेऽभवत्सरित् ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ पञ्च नद्यः सरस्वती-मपि यन्ति सस्रोतसः
सरस्वती तु पञ्चधा सो देशे-ऽभवत्-सरित्
सरल अर्थ: पाँच नदियाँ अपनी धाराओं के साथ सरस्वती में मिलती हैं। इसी तरह सरस्वती पाँच धाराओं वाली होकर उस प्रदेश में नदी बनी। (पंचामृत के पाँच रसों के मिलने का भाव।)
गंधोदक
ॐ अंशुना ते अंशुः पृच्यतां परुषा परुः ।
गन्धस्ते सोममवतु मदाय रसो अच्युतः ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ अंशुना ते अंशुः पृच्यतां परुषा परुः
गन्धस्ते सोम-मवतु मदाय रसो अच्युतः
सरल अर्थ: आपका सुगंधित रस और आपके अंश आपस में मिल जाएँ। आपकी सुगंध आनंद के लिए सोम की रक्षा करे और आपका रस कभी क्षीण न हो।
शुद्ध जल
ॐ शुद्धवालः सर्वशुद्धवालो मणिवालस्त आश्विनाः ।
श्येतः श्येताक्षोऽरुणस्ते रुद्राय पशुपतये कर्णा यामा अवलिप्ता रौद्रा नभोरूपाः पार्जन्याः ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ शुद्ध-वालः सर्व-शुद्ध-वालो मणि-वालस्-त आश्विनाः
श्येतः श्येता-क्षो-ऽरुणस्-ते रुद्राय पशु-पतये कर्णा यामा अवलिप्ता रौद्रा नभो-रूपाः पार्जन्याः
सरल भाव: यह मंत्र शुद्धता और अलग-अलग रंगों के साथ देवताओं को नमस्कार का है। इसके साथ शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है। इसका शब्द-दर-शब्द अर्थ कठिन है, इसलिए भाव ही याद रखें: "शुद्ध जल से पवित्र स्नान।"
10. वस्त्र और उपवस्त्र
विधि: क्या लें: साफ़ कपड़ा या मौली (कलावा)।
क्या करें: पहला वस्त्र मंत्र के साथ अर्पित करें। फिर उपवस्त्र के रूप में छोटा कपड़ा या मौली अर्पित करें।
वस्त्र
ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगात्स उ श्रेयान्भवति जायमानः ।
तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो३ मनसा देवयन्तः ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगात्-स उ श्रेयान्-भवति जायमानः
तं धीरासः कवय उन्-नयन्ति स्वाध्यो३ मनसा देवयन्तः
सरल अर्थ: सुंदर वस्त्र पहने एक तरुण आता है, और जन्म लेकर वह और भी श्रेष्ठ बनता है। धैर्यवान ज्ञानी लोग अच्छे मन से उसे ऊँचा उठाते हैं।
उपवस्त्र
ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमासदत्स्वः ।
वासो अग्ने विश्वरूपं सं व्ययस्व विभावसो ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथ-मासदत्-स्वः
वासो अग्ने विश्व-रूपं सं व्ययस्व विभावसो
सरल अर्थ: सुंदर जन्म वाले तेजस्वी देव सुख और रक्षा देते हैं। हे तेजस्वी अग्नि देव! अनेक रूपों वाला यह वस्त्र आप धारण कीजिए।
11. यज्ञोपवीत
विधि: क्या लें: जनेऊ या मौली का धागा।
क्या करें: मंत्र बोलते हुए गणेशजी को अर्पित करें।
ॐ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन आवः ।
स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः ॥
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्-वि सीमतः सुरुचो वेन आवः
स बुध्न्या उप-मा अस्य विष्ठाः सतश्-च योनि-मसतश्-च वि वः
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्-यत्-सहजं पुरस्तात्
आयुष्य-मग्र्यं प्रति-मुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बल-मस्तु तेजः
सरल अर्थ: सबसे पहले प्रकट हुई ब्रह्म की ज्योति ने सब दिशाओं में प्रकाश फैलाया, और वही सत् और असत् दोनों का आधार है। यज्ञोपवीत परम पवित्र है, प्रजापति के साथ जन्मा है। यह आयु देने वाला, श्रेष्ठ और उजला है। इसे धारण कीजिए, इससे बल और तेज बढ़े।
12. चंदन
विधि: क्या लें: चंदन या रोली-चंदन का लेप।
क्या करें: अनामिका उंगली (सबसे छोटी के पास वाली) से देवताओं को तिलक या लेप लगाएँ।
ॐ त्वां गन्धर्वा अखनंस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः ।
त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान्यक्ष्मादमुच्यत ॥
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ॐ त्वां गन्धर्वा अखनंस्-त्वा-मिन्द्रस्-त्वां बृहस्पतिः
त्वा-मोषधे सोमो राजा विद्वान्-यक्ष्मा-दमुच्यत
सरल अर्थ: हे औषधि (चंदन)! गंधर्वों ने, इन्द्र ने और बृहस्पति ने आपको पाया। आपके प्रभाव से सोम राजा कष्ट से मुक्त हुए।
13. अक्षत
विधि: क्या लें: साबुत अक्षत (टूटे चावल नहीं)।
क्या करें: दाहिने हाथ से देवताओं पर अक्षत चढ़ाएँ।
ॐ अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत ।
अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी ॥
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ॐ अक्षन्-नमी-मदन्त ह्यव प्रिया अधूषत
अस्तोषत स्व-भानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्वि-न्द्र ते हरी
सरल अर्थ: प्रिय देवताओं ने भोजन किया और तृप्त हुए। अपने तेज से चमकने वाले ज्ञानी लोग नई स्तुति से उनकी स्तुति करते हैं। हे इन्द्र! अब आप अपने दोनों घोड़ों को जोड़िए।
14. फूल
विधि: क्या लें: ताज़े फूल और फूल की माला।
क्या करें: पहले एक-एक फूल, फिर माला अर्पित करें। बासी या मुरझाए फूल न चढ़ाएँ।
ॐ ओषधीः प्रति मोदध्वं पुष्पवतीः प्रसूवरीः ।
अश्वा इव सजित्वरीर्वीरुधः पारयिष्णवः ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ ओषधीः प्रति मोदध्वं पुष्पवतीः प्रसूवरीः
अश्वा इव सजित्वरीर्-वीरुधः पारयिष्णवः
सरल अर्थ: हे फूलों वाली और फल देने वाली औषधियो और लताओ! आप प्रसन्न रहें। घोड़ों की तरह विजयी होकर आप हमें कष्टों से पार लगाइए।
15. दूर्वा
विधि: क्या लें: दूर्वा (दूब घास)। आम परंपरा में गणेशजी को 21 दूर्वा अर्पित की जाती हैं।
क्या करें: मंत्र के साथ दूर्वा चढ़ाएँ। संख्या अपनी कुल-परंपरा के अनुसार रखें। तुलसी गणेशजी को नहीं चढ़ाई जाती, यह आम परंपरा है।
ॐ काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि ।
एवा नो दूर्वे प्रतनु सहस्रेण शतेन च ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ काण्डात्-काण्डात्-प्ररोहन्ती परुषः परुषस्-परि
एवा नो दूर्वे प्र-तनु सहस्रेण शतेन च
सरल अर्थ: जैसे आप हर गाँठ और हर पोर से फिर-फिर उग आती हैं, हे दूर्वा, वैसे ही सैकड़ों-हज़ारों रूपों में हमारे वंश और समृद्धि को बढ़ाइए। गणेशजी को दूर्वा बहुत प्रिय मानी जाती है।
16. सिंदूर
विधि: क्या लें: सिंदूर।
क्या करें: अनामिका या अँगूठे से गणेशजी को तिलक लगाएँ। गौरी माता को भी सिंदूर चढ़ाने की परंपरा है।
ॐ सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः ।
घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वात-प्रमियः पतयन्ति यह्वाः
घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्-नूर्मिभिः पिन्वमानः
सरल भाव: जैसे नदी की तेज़ लहरें आगे बढ़ती हैं और जैसे लाल घोड़ा अपनी राह की रुकावटें तोड़कर दौड़ता है, वैसे ही घी की धाराएँ तेज़ी से बहती हैं। इसमें गति, ऊर्जा और लालिमा का भाव है।
17. अबीर-गुलाल आदि सुगंधित द्रव्य
विधि: क्या लें: अबीर, गुलाल, हल्दी या कुंकुम।
क्या करें: एक चुटकी लेकर मंत्र के साथ अर्पित करें।
ॐ अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं परिबाधमानः ।
हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान् पुमाँसं परि पातु विश्वतः ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं परि-बाधमानः
हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान् पुमाँसं परि पातु विश्वतः
सरल भाव: यह रक्षा की प्रार्थना है। जैसे धनुष की डोरी हाथ को घेरकर बाण का आघात रोकती है, वैसे ही सब कुछ जानने वाला रक्षक हमें हर ओर से बचाए।
18. बिल्वपत्र
विधि: क्या लें: साफ़ धुला हुआ बेलपत्र।
क्या करें: मंत्र बोलते हुए बेलपत्र अर्पित करें। चिकना हिस्सा नीचे की ओर रखा जाता है, यह आम परंपरा है।
ॐ नमो बिल्मिने च कवचिने च नमो वर्मिणे च वरूथिने च नमः श्रुताय च श्रुतसेनाय च नमो दुन्दुभ्याय चाहनन्याय च ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ नमो बिल्मिने च कवचिने च नमो वर्मिणे च वरूथिने च
नमः श्रुताय च श्रुत-सेनाय च नमो दुन्दुभ्याय चाहनन्याय च
सरल अर्थ: कवच और रक्षा के साधन धारण करने वाले, प्रसिद्ध और सेना वाले, दुंदुभि के स्वामी को बार-बार नमस्कार।
19. सुगंधित द्रव्य
विधि: क्या लें: इत्र या सुगंधित द्रव्य।
क्या करें: एक-दो बूँद देवताओं पर या उनके पास लगाएँ।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि-वर्धनम्
उर्वारुक-मिव बन्धनान्-मृत्योर्-मुक्षीय मा-ऽमृतात्
सरल अर्थ: हम तीन नेत्रों वाले, सुगंध फैलाने वाले और पोषण बढ़ाने वाले शिवजी की आराधना करते हैं। जैसे पका हुआ खीरा बेल से अपने आप छूट जाता है, वैसे ही हम मृत्यु के बंधन से छूटें, अमरता से नहीं।
20. धूप
विधि: क्या लें: धूप या अगरबत्ती।
क्या करें: जलाकर दाहिने हाथ से देवताओं के सामने हल्के से घुमाएँ।
ॐ धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व तं योऽस्मान्धूर्वति तं धूर्वं यं वयं धूर्वामः ।
देवानामसि वह्नितमँ सस्नितमं पप्रितमं जुष्टतमं देवहूतमम् ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ धूर-सि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व तं योऽस्मान्-धूर्वति तं धूर्वं यं वयं धूर्वामः
देवाना-मसि वह्नि-तमँ सस्नि-तमं पप्रि-तमं जुष्ट-तमं देव-हूतमम्
सरल भाव: यह धूप के लिए है। हे धूप! जो हमें हानि पहुँचाए, उसे आप दूर कीजिए। आप देवताओं तक आहुति पहुँचाने वाली, उन्हें प्रिय और उन्हें बुलाने वाली हैं।
21. दीप
विधि: क्या लें: घी का दीपक (बाती के साथ)।
क्या करें: दीपक जलाकर देवताओं को दिखाएँ और पास में स्थापित कर दें।
ॐ अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा ।
अग्निर्वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा ।
ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ अग्निर्-ज्योतिर्-ज्योतिर-ग्निः स्वाहा सूर्यो ज्योतिर्-ज्योतिः सूर्यः स्वाहा
अग्निर्-वर्चो ज्योतिर्-वर्चः स्वाहा सूर्यो वर्चो ज्योतिर्-वर्चः स्वाहा
ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा
सरल अर्थ: अग्नि ही ज्योति है और ज्योति ही अग्नि है। सूर्य ही ज्योति है और ज्योति ही सूर्य है। अग्नि और सूर्य के तेज को स्वाहा, यानी यह अर्पण।
22. नैवेद्य
विधि: क्या लें: मोदक, लड्डू या मिठाई, थाली में।
क्या करें: नैवेद्य की थाली के चारों ओर जल से छोटी रेखा बनाएँ। फिर पाँच बार प्राण आदि का नाम लेकर थोड़ा जल चढ़ाएँ और थाली देवताओं के सामने रखें।
ॐ नाभ्या आसीदन्तरिक्षँ शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ२ अकल्पयन् ॥
ॐ प्राणाय स्वाहा । ॐ अपानाय स्वाहा । ॐ समानाय स्वाहा । ॐ उदानाय स्वाहा । ॐ व्यानाय स्वाहा ।
तोड़कर पढ़ें:
ॐ नाभ्या आसीद-न्तरिक्षँ शीर्ष्णो द्यौः सम-वर्तत
पद्भ्यां भूमिर्-दिशः श्रोत्रात्-तथा लोकाँ२ अकल्पयन्
ॐ प्राणाय स्वाहा ॐ अपानाय स्वाहा ॐ समानाय स्वाहा ॐ उदानाय स्वाहा ॐ व्यानाय स्वाहा
सरल अर्थ: परम पुरुष की नाभि से अंतरिक्ष, सिर से आकाश, चरणों से भूमि और कानों से दिशाएँ बनीं। इस तरह सारे लोक रचे गए। फिर पाँचों प्राणों (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान) को नैवेद्य का अर्पण स्वाहा के साथ होता है।
23. ऋतुफल
विधि: क्या लें: मौसम के ताज़े फल।
क्या करें: फल थाली में रखकर अर्पित करें।
ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः ।
बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ याः फलिनीर्-या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः
बृहस्पति-प्रसूतास्-ता नो मुञ्चन्त्वं-हसः
सरल अर्थ: जो फल वाली हैं, जो बिना फल की हैं, जो बिना फूल की और जो फूल वाली हैं, बृहस्पति से प्रेरित वे सब औषधियाँ हमें कष्ट से मुक्त करें।
24. ताम्बूल
विधि: क्या लें: पान, सुपारी, इलायची, लौंग।
क्या करें: पान के पत्ते पर सुपारी आदि रखकर देवताओं के सामने अर्पित करें।
ॐ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।
वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ यत्-पुरुषेण हविषा देवा यज्ञ-मतन्वत
वसन्तो-ऽस्यासी-दाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्-धविः
सरल अर्थ: जब देवताओं ने परम पुरुष को हवि मानकर यज्ञ किया, तब वसंत घी बना, ग्रीष्म समिधा बनी और शरद ऋतु हवि बनी।
25. दक्षिणा
विधि: क्या लें: सिक्का या कुछ द्रव्य।
क्या करें: हाथ में लेकर मंत्र बोलें और देवताओं के पास रख दें। बाद में यह पुरोहित या दान के लिए रखा जाता है।
ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ हिरण्य-गर्भः सम-वर्तता-ग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम
सरल अर्थ: सृष्टि से पहले हिरण्यगर्भ प्रकट हुए और वे सब प्राणियों के अकेले स्वामी हुए। उन्होंने पृथ्वी और आकाश को धारण किया। हम किस देव की हवि से पूजा करें? उसी की।
26. आरती
विधि: क्या लें: कपूर या घी की बाती वाली आरती की थाली, घंटी, फूल, जल।
क्या करें: थाली में दीपक जलाकर देवताओं के सामने घड़ी की दिशा में घुमाएँ और घंटी बजाएँ। फिर आरती लेकर थाली पर जल छिड़कें।
ॐ आ रात्रि पार्थिवं रजः पितुरप्रायि धामभिः ।
दिवः सदाँसि बृहती वि तिष्ठस आ त्वेषं वर्तते तमः ॥
ॐ इदँ हविः प्रजननं मे अस्तु दशवीरँ सर्वगणँ स्वस्तये ।
आत्मसनि प्रजासनि पशुसनि लोकसन्यभयसनि ।
अग्निः प्रजां बहुलां मे करोत्वन्नं पयो रेतो अस्मासु धत्त ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ आ रात्रि पार्थिवं रजः पितु-रप्रायि धामभिः
दिवः सदाँसि बृहती वि तिष्ठस आ त्वेषं वर्तते तमः
ॐ इदँ हविः प्र-जननं मे अस्तु दश-वीरँ सर्व-गणँ स्वस्तये
आत्मसनि प्रजा-सनि पशु-सनि लोक-सन्य-भय-सनि
अग्निः प्रजां बहुलां मे करोत्वन्नं पयो रेतो अस्मासु धत्त
सरल अर्थ: रात्रि ने धरती के लोक को अपने तेज से भर दिया है और आकाश के ऊँचे स्थानों तक फैली है, फिर अंधकार दूर होता है। यह हवि हमारे कल्याण और संतान-वृद्धि के लिए हो। अग्नि हमारे परिवार को बढ़ाएँ और हमें अन्न, दूध और शक्ति दें।
27. पुष्पाञ्जलि
विधि: क्या लें: दोनों हाथों में भरकर फूल।
क्या करें: खड़े होकर मंत्र बोलें और दोनों हाथ जोड़कर फूल अर्पित करें।
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥
नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद्भवानि च ।
पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तो गृहाण परमेश्वर ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ यज्ञेन यज्ञ-मयजन्त देवास्-तानि धर्माणि प्रथमा-न्यासन्
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः
नाना-सुगन्धि-पुष्पाणि यथा-कालो-द्भवानि च
पुष्पाञ्जलिर्-मया दत्तो गृहाण परमेश्वर
सरल अर्थ: देवताओं ने यज्ञ के द्वारा ही यज्ञ की पूजा की, और वही पहले के धर्म थे। ऐसे महान लोग उस स्वर्ग को पाते हैं जहाँ पुराने साध्य देवता रहते हैं। मैं अनेक सुगंधित और समय पर खिले फूलों की यह अंजलि देता हूँ। हे परमेश्वर, इसे स्वीकार कीजिए।
28. प्रदक्षिणा
विधि: क्या लें: हाथ में फूल या अक्षत (चाहें तो)।
क्या करें: अपनी जगह पर खड़े होकर दाहिनी ओर से घूमकर देवताओं की परिक्रमा करें। संख्या कुल-परंपरा के अनुसार रखें। जगह कम हो तो अपनी जगह पर घूम जाएँ।
ॐ ये तीर्थानि प्रचरन्ति सृकाहस्ता निषङ्गिणः ।
तेषाँ सहस्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि ॥
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च ।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणे पदे पदे ॥
तोड़कर पढ़ें:
ॐ ये तीर्थानि प्र-चरन्ति सृका-हस्ता निषङ्गिणः
तेषाँ सहस्र-योजने-ऽव धन्वानि तन्मसि
यानि कानि च पापानि जन्मान्तर-कृतानि च
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणे पदे पदे
सरल अर्थ: जो शस्त्र लिए हुए रुद्रगण तीर्थों में घूमते हैं, उनके धनुषों को हम हज़ार योजन दूर कर देते हैं, यानी उनके अनिष्ट से दूर रहें। जन्म-जन्मांतर में किए गए जो भी पाप हैं, वे प्रदक्षिणा के हर कदम पर नष्ट हों, ऐसी प्रार्थना।
29. विशेषार्घ्य
विधि: क्या लें: एक पात्र में जल, फल, फूल, चंदन और अक्षत।
क्या करें: दोनों हाथों से पात्र उठाकर श्लोक बोलें और अंत में देवताओं की ओर अर्पित करें।
रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्यरक्षक ।
भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात् ॥
द्वैमातुर कृपासिन्धो षाण्मातुराग्रज प्रभो ।
वरदस्त्वं वरं देहि वाञ्छितं वाञ्छितार्थद ॥
अनेन सफलार्घ्येण फलदोऽस्तु सदा मम ॥
तोड़कर पढ़ें:
रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्य-रक्षक
भक्तानाम-भयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात्
द्वैमातुर कृपा-सिन्धो षाण्मातुरा-ग्रज प्रभो
वरदस्-त्वं वरं देहि वाञ्छितं वाञ्छितार्थद
अनेन सफलार्घ्येण फलदो-ऽस्तु सदा मम
सरल अर्थ: हे गणों के स्वामी! हे तीनों लोकों के रक्षक! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए। आप भक्तों को निडर करते हैं, हमें संसार-सागर से पार लगाइए। हे दो माताओं वाले (गौरी और गंगा), कृपा के सागर, कार्तिकेय के बड़े भाई! आप वर देने वाले हैं। मेरी मनचाही इच्छा पूरी कीजिए। इस फल-सहित अर्घ्य से आप सदा मुझे फल देने वाले हों।
30. प्रार्थना
विधि: क्या लें: दाहिने हाथ में थोड़ा जल।
क्या करें: हाथ जोड़कर श्लोक बोलें। अंत में नमस्कार वाला वाक्य बोलकर जल को ज़मीन या थाली में छोड़ दें।
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय ।
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते ॥
भक्तार्तिनाशनपराय गणेश्वराय सर्वेश्वराय शुभदाय सुरेश्वराय ।
विद्याधराय विकटाय च वामनाय भक्तप्रसन्नवरदाय नमो नमस्ते ॥
नमस्ते ब्रह्मरूपाय विष्णुरूपाय ते नमः ।
नमस्ते रुद्ररूपाय करिरूपाय ते नमः ॥
विश्वरूपस्वरूपाय नमस्ते ब्रह्मचारिणे ।
भक्तप्रियाय देवाय नमस्तुभ्यं विनायक ॥
लम्बोदर नमस्तुभ्यं सततं मोदकप्रिय ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
त्वां विघ्नशत्रुदलनेति च सुन्दरेति भक्तप्रियेति सुखदेति फलप्रदेति ।
विद्याप्रदेत्यघहरेति च ये स्तुवन्ति तेभ्यो गणेश वरदो भव नित्यमेव ॥
या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः ।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् ॥
तोड़कर पढ़ें:
विघ्नेश्वराय वरदाय सुर-प्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्-धिताय
नागाननाय श्रुति-यज्ञ-विभूषिताय गौरी-सुताय गणनाथ नमो नमस्ते
भक्तार्ति-नाशन-पराय गणेश्वराय सर्वेश्वराय शुभदाय सुरेश्वराय
विद्याधराय विकटाय च वामनाय भक्त-प्रसन्न-वरदाय नमो नमस्ते
नमस्ते ब्रह्म-रूपाय विष्णु-रूपाय ते नमः
नमस्ते रुद्र-रूपाय करि-रूपाय ते नमः
विश्व-रूप-स्वरूपाय नमस्ते ब्रह्मचारिणे
भक्त-प्रियाय देवाय नमस्तुभ्यं विनायक
लम्बोदर नमस्तुभ्यं सततं मोदक-प्रिय
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व-कार्येषु सर्वदा
त्वां विघ्न-शत्रु-दलनेति च सुन्दरेति भक्त-प्रियेति सुखदेति फल-प्रदेति
विद्या-प्रदेत्य-घहरेति च ये स्तुवन्ति तेभ्यो गणेश वरदो भव नित्यमेव
या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्व-लक्ष्मीः पापात्मनां कृत-धियां हृदयेषु बुद्धिः
श्रद्धा सतां कुल-जन-प्रभवस्य लज्जा तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम्
सरल अर्थ: विघ्नों के स्वामी, वर देने वाले, देवताओं के प्रिय, बड़े पेट वाले, पूर्ण, जगत का भला करने वाले, हाथी के मुख वाले, वेद और यज्ञ से सजे, गौरी के पुत्र, गणों के नाथ आपको बार-बार नमस्कार। भक्तों का दुख मिटाने वाले, सबके ईश्वर, शुभ देने वाले, विद्या के धारण करने वाले, विकट रूप वाले और भक्तों से प्रसन्न होने वाले आपको नमस्कार। आप ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और हाथी, सब रूपों में हैं। हे मोदक प्रिय लम्बोदर! मेरे सब कामों को हमेशा बिना विघ्न के पूरा कीजिए। जो आपको "विघ्नों के शत्रु", "सुंदर", "भक्त-प्रिय", "सुख देने वाले", "फल देने वाले", "विद्या देने वाले", "पाप हरने वाले" कहकर स्तुति करते हैं, उन पर आप सदा कृपा कीजिए। अंतिम श्लोक का भाव: जो पुण्यात्माओं के घर में लक्ष्मी हैं, पापियों के घर में अलक्ष्मी हैं, समझदार लोगों के हृदय में बुद्धि हैं, सज्जनों में श्रद्धा हैं और अच्छे कुल के लोगों में लज्जा हैं, हे देवी, हम आपको प्रणाम करते हैं। आप सारे संसार की रक्षा कीजिए।
अंत में बोलने का वाक्य
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान् समर्पयामि ।
अनया पूजया गणेशाम्बिके प्रीयेतां न मम ।
सरल अर्थ: प्रार्थना के साथ मैं नमस्कार अर्पित करता हूँ। इस पूजा से गणेश और अम्बिका प्रसन्न हों। यह पूजा मेरी नहीं, उन्हीं की है। इसके बाद जल छोड़ दिया जाता है।
कठिन शब्दों के आसान अर्थ
| शब्द | आसान अर्थ |
|---|---|
| हेरम्ब | गणेशजी का एक नाम |
| हेमाद्रि | हिमालय, सोने का पर्वत |
| लम्बोदर | बड़े पेट वाले, गणेशजी |
| पाद्य | चरण धोने का जल |
| अर्घ्य | हाथ धोने और सम्मान के लिए जल |
| आचमन | मुँह धोने और शुद्धि के लिए जल की आचमनी |
| पंचामृत | दूध, दही, घी, शहद और शक्कर का मिश्रण |
| गंधोदक | सुगंधित जल |
| यज्ञोपवीत | जनेऊ |
| दूर्वा | दूब घास |
| बिल्वपत्र | बेल के पत्ते |
| ताम्बूल | पान |
| नैवेद्य | देवता को अर्पित भोजन |
| पुष्पाञ्जलि | दोनों हाथों में भरकर फूल अर्पित करना |
| प्रदक्षिणा | देवता की दाहिनी ओर से परिक्रमा |
| फलश्रुति | पाठ या पूजा का फल बताने वाला भाग |
पाठ कैसे करें
- कब: किसी भी पूजा, हवन, गृह प्रवेश या शुभ कार्य की शुरुआत में। तिथि और समय स्थान और परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकता है।
- कैसे: स्वच्छ स्थान पर गणेशजी और गौरी की मूर्ति या चित्र के सामने बैठें। हर चीज़ अर्पित करते समय उसका मंत्र धीरे-धीरे बोलें।
- कितने मंत्र: यहाँ पूरा क्रम दिया है। परिस्थिति के अनुसार कई जगह कम सामग्री से भी पूजा होती है। यह आपकी कुल-परंपरा या पुरोहित के अनुसार तय होता है।
- सावधानी: जल्दबाज़ी न करें। वैदिक मंत्रों में एक मात्रा का फ़र्क भी उच्चारण बदल देता है, इसलिए धीरे और साफ़ पढ़ें।
महत्व
गणेशाम्बिका पूजन किसी भी बड़ी पूजा की नींव माना जाता है। इसमें हर छोटी चीज़ अर्पित करते समय एक मंत्र बोलने से मन एकाग्र रहता है और पूजा का क्रम बना रहता है। श्रद्धालु इसे शुभ शुरुआत और विघ्न-रहित पूजा के भाव से करते हैं। इसे चमत्कार या गारंटी की तरह नहीं, श्रद्धा और विधि के साथ की जाने वाली पूजा की तरह देखना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. गणेशाम्बिका पूजन क्या है?
किसी बड़ी पूजा की शुरुआत में गणेशजी और माता गौरी का आवाहन करके उनकी पूजा करना।
2. पूजा की शुरुआत गणेशजी से ही क्यों होती है?
परंपरा में माना जाता है कि गणेशजी विघ्न दूर करने वाले हैं, इसलिए हर शुभ कार्य उनके स्मरण से शुरू होता है।
3. क्या सभी मंत्र पढ़ना ज़रूरी है?
यह परंपरा और पुरोहित के अनुसार अलग हो सकता है। कई जगह कम मंत्रों से भी पूजा की जाती है।
4. पूरी पूजा में कितना समय लगता है?
धीरे-धीरे सामग्री अर्पित करते हुए लगभग 40 से 50 मिनट।
5. शुरुआत करने वाले क्या करें?
पहले क्रम और सामग्री की सूची याद करें, फिर मंत्र। उच्चारण किसी पुरोहित या जानकार से सुनकर मिला लें।
पाठ-आधार: यज्ञ मार्तण्ड (पं. कुशेश्वर झा), श्रीगणेशाम्बिकापूजनम्, पृ. 8 से 19; वेद के मंत्र।
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