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कलश स्थापना विधि में पूजन सामग्री, जल से भरा कलश, नारियल और आम के पत्तों का धार्मिक चित्र
☸ पूजा व विधि

कलश स्थापन विधि | संपूर्ण संस्कृत मंत्र, अर्थ और पूजा विधि

कलश स्थापन के 18 प्रमुख मंत्रों का संपूर्ण संस्कृत पाठ, सरल हिंदी अर्थ और स्थापना विधि जानें। भूमि स्पर्श, धान्य प्रक्षेप, जल, दूर्वा, पंचपल्लव, नारियल और वरुण देव के आवाहन सहित कलश पूजा का पूरा क्रम पढ़ें।

संपादकीय डेस्क 25 अक्टूबर 2026⏱ 14 मिनट पढ़ें👁 3

परिचय

किसी भी बड़ी पूजा, हवन या शुभ कार्य में कलश की स्थापना सबसे पहले की जाती है। कलश को जल से भरकर उसमें वरुण देव और अन्य देवताओं का आवाहन किया जाता है। हर चीज़ डालते समय एक अलग मंत्र बोला जाता है: भूमि को छूते समय, अन्न रखते समय, जल भरते समय, चंदन, औषधि, दूर्वा, पंचपल्लव, सुपारी, रत्न, सिक्का, वस्त्र और नारियल के लिए। इस लेख में कलश स्थापन के ये सभी मंत्र एक ही क्रम में दिए हैं। हर मंत्र मूल रूप में, फिर तोड़कर, और उसके बाद आसान हिंदी भाव के साथ है।

कलश स्थापन से पहले की तैयारी

  • कलश (मिट्टी या धातु का घड़ा) पर रोली से स्वस्तिक का चिह्न बनाएँ और उसके गले में मौली (कलावा) लपेटें।
  • जिस जगह या पाटे पर कलश रखना है, वहाँ कुंकुम या रोली से अष्टदल कमल (आठ पंखुड़ियों वाला कमल) बनाएँ।
  • पूजा की सब सामग्री पास रख लें: अन्न, जल, चंदन, दूर्वा, पल्लव, सुपारी, सिक्का, वस्त्र, नारियल।

यह आम परंपरा है। अपनी कुल-परंपरा या पुरोहित के अनुसार इसमें थोड़ा अंतर हो सकता है।

तोड़कर पढ़ने का आसान तरीका

हर मंत्र पहले मूल रूप में दिया है, उसके नीचे वही मंत्र छोटे टुकड़ों में तोड़कर दिया है। हाइफ़न (-) का मतलब है हल्का रुकना। पहले टूटी हुई पंक्तियाँ धीरे-धीरे पढ़ें, फिर वही पंक्ति बिना रुके जोड़कर बोलें। तोड़ने में कोई अक्षर बदला या हटाया नहीं गया है। ये वैदिक मंत्र हैं, इसलिए इनके अर्थ भाव के रूप में दिए हैं, और स्वर-सहित उच्चारण गुरु या पुरोहित से सुनकर सीखना सबसे अच्छा है। यहाँ पाठ बिना स्वर-चिह्न के दिया गया है।

उच्चारण के चार आसान सूत्र

  1. ऋ: "ऋतसदन" जैसे शब्दों में "ऋ" को "रि" की तरह बोलते हैं।
  2. विसर्ग (ः): "पतिः", "वः", "स्वः" के अंत में हल्की 'ह' जैसी ध्वनि आती है।
  3. ऽ (अवग्रह): "पयोऽसि" में ऽ का मतलब है कि एक 'अ' दबा हुआ है। इसे "पयो-सि" की तरह हल्का जोड़कर बोलें।
  4. जुड़े हुए अक्षर: "त्वोदानाय", "धुक्ष्वोरुधारा", "यक्ष्मा" जैसे शब्दों को पहले अक्षर-अक्षर करके पढ़ें, फिर जोड़ें।

1. भूमि स्पर्श

कलश जिस जगह रखना है, उस भूमि को छूते हुए यह मंत्र बोला जाता है।

ॐ भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री ।
पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृँह पृथिवीं मा हिँसीः ॥

तोड़कर पढ़ें:
ॐ भूरसि भूमिरस्य-दितिरसि विश्व-धाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री
पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृँह पृथिवीं मा हिँसीः ॥

सरल अर्थ: हे पृथ्वी! आप सबको धारण करने वाली और संसार का पालन करने वाली हैं। इस भूमि को सँभालिए, इसे मज़बूत रखिए और इसे कोई हानि न हो।

2. धान्य प्रक्षेप (अन्न रखना)

भूमि पर अन्न (जौ या चावल) रखते समय।

ॐ धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणाय त्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा ।
दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि ॥

तोड़कर पढ़ें:
ॐ धान्य-मसि धिनुहि देवान् प्राणाय त्वो-दानाय त्वा व्यानाय त्वा
दीर्घा-मनु प्रसिति-मायुषे धां देवो वः सविता हिरण्य-पाणिः
प्रति-गृभ्णात्व-च्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयो-ऽसि ॥

सरल अर्थ: हे अन्न! आप देवताओं को तृप्त करने वाले और जीवन को शक्ति देने वाले हैं। लंबी आयु के लिए आपको रखा जा रहा है। सोने के हाथों वाले सविता देव इसे दोष-रहित हाथों से स्वीकार करें। आप धरती का पोषक रस हैं।

3. कलश स्थापन

कलश को अन्न के ऊपर स्थापित करते समय।

ॐ आजिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः ।
पुनरूर्जा निवर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः ॥

तोड़कर पढ़ें:
ॐ आजिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्-विन्दवः
पुनरूर्जा नि-वर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वो-रुधारा पयस्वती पुनर्-मा विशता-द्रयिः ॥

सरल अर्थ: हे कलश! आप यहाँ स्थिर होइए और अपनी शक्ति के साथ पूर्ण रहिए। आपसे हज़ारों धाराओं में कल्याणकारी रस बहे और धन-संपदा फिर से हमारे पास लौट आए।

4. कलश में जल डालना

ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद ॥

तोड़कर पढ़ें:
ॐ वरुणस्यो-त्तम्भन-मसि वरुणस्य स्कम्भ-सर्जनी स्थो
वरुणस्य ऋतसदन्य-सि वरुणस्य ऋतसदन-मसि वरुणस्य ऋत-सदन-मासीद ॥

सरल अर्थ: हे कलश! आप जल के देवता वरुण के आधार-स्तंभ हैं। वरुण के सत्य-नियम (ऋत) के स्थान में आप स्थिर होकर बैठिए।

5. चंदन

ॐ त्वां गन्धर्वा अखनंस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः ।
त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान्यक्ष्मादमुच्यत ॥

तोड़कर पढ़ें:
ॐ त्वां गन्धर्वा अखनंस्-त्वा-मिन्द्रस्-त्वां बृहस्पतिः
त्वा-मोषधे सोमो राजा विद्वान्-यक्ष्मा-दमुच्यत ॥

सरल अर्थ: हे औषधि! गंधर्वों ने, इन्द्र ने और बृहस्पति ने आपको पाया। आपके प्रभाव से सोम राजा रोग से मुक्त हुए।

6. सर्वौषधि

ॐ या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा ।
मनै नु बभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च ॥

तोड़कर पढ़ें:
ॐ या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्-त्रियुगं पुरा
मनै नु बभ्रूणा-महं शतं धामानि सप्त च ॥

सरल अर्थ: जो औषधियाँ बहुत पुराने समय से उत्पन्न हैं और जिनके सैकड़ों रूप और गुण हैं, मैं उनका स्मरण करता हूँ।

7. दूर्वा

ॐ काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि ।
एवा नो दूर्वे प्रतनु सहस्रेण शतेन च ॥

तोड़कर पढ़ें:
ॐ काण्डात्-काण्डात्-प्ररोहन्ती परुषः परुषस्-परि
एवा नो दूर्वे प्र-तनु सहस्रेण शतेन च ॥

सरल अर्थ: हे दूर्वा! जैसे आप हर गाँठ और हर पोर से फिर-फिर उग आती हैं, वैसे ही सैकड़ों-हज़ारों रूपों में हमारे वंश और समृद्धि को बढ़ाइए।

8. पंचपल्लव

ॐ अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता ।
गोभाज इत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम् ॥

तोड़कर पढ़ें:
ॐ अश्वत्थे वो नि-षदनं पर्णे वो वसतिष्-कृता
गोभाज इत्-किलासथ यत्-सनवथ पूरुषम् ॥

सरल भाव: पीपल आदि वृक्षों में आपका निवास है और पत्तों में आपका आश्रय है। आप गायों और मनुष्यों का पोषण करने वाले हों।

9. सप्तमृत्तिका

ॐ स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरा निवेशनी ।
यच्छा नः शर्म सप्रथाः ॥

तोड़कर पढ़ें:
ॐ स्योना पृथिवि नो भवा-नृक्षरा निवेशनी
यच्छा नः शर्म सप्रथाः ॥

सरल अर्थ: हे पृथ्वी! आप हमारे लिए सुख देने वाली और काँटों से रहित रहने की जगह बनिए। हमें विशाल सुख और आश्रय दीजिए।

10. पूगीफल (सुपारी)

ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः ।
बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥

तोड़कर पढ़ें:
ॐ याः फलिनीर्-या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः
बृहस्पति-प्रसूतास्-ता नो मुञ्चन्त्वं-हसः ॥

सरल अर्थ: जो फल वाली हैं, जो बिना फल की हैं, जो बिना फूल की और जो फूल वाली हैं, बृहस्पति से प्रेरित वे सब औषधियाँ हमें कष्ट से मुक्त करें।

11. पंचरत्न

ॐ परि वाजपतिः कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत् ।
दधद्रत्नानि दाशुषे ॥

तोड़कर पढ़ें:
ॐ परि वाजपतिः कविर-ग्निर्-हव्यान्य-क्रमीत्
दधद्-रत्नानि दाशुषे ॥

सरल अर्थ: अन्न और बल के स्वामी, सब जानने वाले अग्नि देव आहुतियों को स्वीकार करें और देने वाले को रत्न (धन) दें।

12. हिरण्य प्रक्षेप (सिक्का या स्वर्ण)

ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥

तोड़कर पढ़ें:
ॐ हिरण्य-गर्भः सम-वर्तता-ग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥

सरल अर्थ: सृष्टि से पहले हिरण्यगर्भ प्रकट हुए। वे सब प्राणियों के अकेले स्वामी हुए। उन्होंने पृथ्वी और आकाश को धारण किया। हम किस देव की हवि से पूजा करें? उसी की।

13. वस्त्र

ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमासदत्स्वः ।
वासो अग्ने विश्वरूपं सं व्ययस्व विभावसो ॥

तोड़कर पढ़ें:
ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथ-मासदत्-स्वः
वासो अग्ने विश्व-रूपं सं व्ययस्व विभावसो ॥

सरल अर्थ: हे तेजस्वी अग्नि देव! आप सुंदर जन्म वाले और ज्योति से युक्त हैं। यह अनेक रूपों वाला वस्त्र आप धारण कीजिए और हमें सुख और रक्षा दीजिए।

14. पूर्णपात्र

कलश के मुख पर पात्र रखते समय।

ॐ पूर्णा दर्वि परा पत सुपूर्णा पुनरा पत ।
वस्नेव विक्रीणावहा इषमूर्जं शतक्रतो ॥

तोड़कर पढ़ें:
ॐ पूर्णा दर्वि परा पत सुपूर्णा पुनरा पत
वस्नेव विक्रीणा-वहा इष-मूर्जं शतक्रतो ॥

सरल अर्थ: हे भरे हुए पात्र! भरपूर होकर देवताओं के पास जाइए और फिर भरपूर होकर लौट आइए। हे सौ यज्ञों वाले इन्द्र! हम अन्न और बल पाएँ।

15. श्रीफल (नारियल)

ॐ श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम् ।
इष्णन्निषाणामुं म इषाण सर्वलोकं म इषाण ॥

तोड़कर पढ़ें:
ॐ श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्या-वहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूप-मश्विनौ व्यात्तम्
इष्णन्-निषाणामुं म इषाण सर्व-लोकं म इषाण ॥

सरल अर्थ: हे पुरुषोत्तम! श्री और लक्ष्मी आपकी पत्नियाँ हैं, दिन और रात आपके दोनों पार्श्व हैं, नक्षत्र आपका रूप हैं। मुझे कल्याण दीजिए और सब लोकों में मेरा हित कीजिए।

16. कलश में वरुण का आवाहन

ॐ तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः ।
अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मा न आयुः प्र मोषीः ॥

तोड़कर पढ़ें:
ॐ तत्-त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्-तदा शास्ते यजमानो हविर्-भिः
अहेडमानो वरुणे-ह बोध्यु-रुशंस मा न आयुः प्र मोषीः ॥

सरल अर्थ: हे वरुण देव! मैं स्तुति और नमस्कार के साथ आपसे प्रार्थना करता हूँ। यजमान भी आहुतियों के साथ यही माँगता है। आप क्रोध न करते हुए यहाँ ध्यान दीजिए। हे अनेक स्तुतियों के पात्र! हमारी आयु न छीनिए।

फिर यह वाक्य बोलकर वरुण का आवाहन और स्थापन किया जाता है:

अस्मिन् कलशे वरुणं साङ्गं सपरिवारं सायुधं सशक्तिकमावाहयामि स्थापयामि ।
ॐ अपां पतये वरुणाय नमः ।

तोड़कर पढ़ें:
अस्मिन् कलशे वरुणं साङ्गं सपरिवारं सायुधं सशक्तिक-मावाहयामि स्थापयामि
ॐ अपां पतये वरुणाय नमः

सरल अर्थ: इस कलश में मैं वरुण देव को उनके अंगों, परिवार, आयुध और शक्ति के साथ बुलाता और स्थापित करता हूँ। जल के स्वामी वरुण को नमस्कार।

17. कलश की प्रार्थना

देवदानवसंवादे मथ्यमाने महोदधौ ।
उत्पन्नोऽसि तदा कुम्भ विधृतो विष्णुना स्वयम् ॥
त्वत्तोये सर्वतीर्थानि देवाः सर्वे त्वयि स्थिताः ।
त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः ॥
शिवः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापतिः ।
आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवाः सपैतृकाः ॥
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि यतः कामफलप्रदाः ।
त्वत्प्रसादादिमां पूजां कर्तुमीहे जलोद्भव ।
सान्निध्यं कुरु मे देव प्रसन्नो भव सर्वदा ॥

तोड़कर पढ़ें:
देव-दानव-संवादे मथ्यमाने महोदधौ
उत्पन्नो-ऽसि तदा कुम्भ विधृतो विष्णुना स्वयम्
त्वत्-तोये सर्व-तीर्थानि देवाः सर्वे त्वयि स्थिताः
त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः
शिवः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्-त्वं च प्रजापतिः
आदित्या वसवो रुद्रा विश्वे-देवाः स-पैतृकाः
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वे-ऽपि यतः काम-फल-प्रदाः
त्वत्-प्रसादा-दिमां पूजां कर्तुमीहे जलोद्भव
सान्निध्यं कुरु मे देव प्रसन्नो भव सर्वदा

सरल अर्थ: हे कलश! देवताओं और दानवों के समुद्र-मंथन के समय आप प्रकट हुए थे और स्वयं विष्णु ने आपको धारण किया। आपके जल में सब तीर्थ हैं, सब देवता आप में बसे हैं, सब प्राणी और प्राण आप में स्थित हैं। आप ही शिव हैं, आप ही विष्णु और प्रजापति हैं। आदित्य, वसु, रुद्र और विश्वेदेव भी आप में हैं, इसलिए आप सब इच्छित फल देने वाले हैं। हे जल से उत्पन्न कलश! आपकी कृपा से मैं यह पूजा करना चाहता हूँ। आप मेरे पास निवास कीजिए और सदा प्रसन्न रहिए।

18. वरुण को नमस्कार

नमो नमस्ते स्फटिकप्रभाय सुश्वेतहाराय सुमङ्गलाय ।
सुपाशहस्ताय झषासनाय जलाधिनाथाय नमो नमस्ते ॥
ॐ अपां पतये वरुणाय नमः ॥

तोड़कर पढ़ें:
नमो नमस्ते स्फटिक-प्रभाय सुश्वेत-हाराय सुमङ्गलाय
सुपाश-हस्ताय झष-आसनाय जलाधि-नाथाय नमो नमस्ते
ॐ अपां पतये वरुणाय नमः

सरल अर्थ: स्फटिक जैसी चमक वाले, सुंदर सफ़ेद हार वाले, मंगलकारी देव को बार-बार नमस्कार। जिनके हाथ में पाश है, जो मछली पर विराजमान हैं और जल के स्वामी हैं, उन वरुण देव को बार-बार नमस्कार।

कठिन शब्दों के आसान अर्थ

शब्दआसान अर्थ
कलशपूजा का जल से भरा घड़ा
वरुणजल के देवता
ऋतसत्य और व्यवस्था का नियम
धान्यअन्न
ओषधिजड़ी-बूटी, पौधे
दूर्वादूब घास
पल्लवनए पत्ते
अश्वत्थपीपल का वृक्ष
पूगीफलसुपारी
हिरण्यसोना
हिरण्यगर्भसृष्टि के आरंभ में प्रकट हुए सृष्टिकर्ता
श्रीफलनारियल
शतक्रतुइन्द्र का एक नाम
कुम्भघड़ा, कलश
जलोद्भवजल से उत्पन्न
सान्निध्यपास, समीपता
झषमछली
पाशफंदा, रस्सी का हथियार

चार दिन में याद करने का तरीका

  • पहला दिन: मंत्र 1, 2 और 3 (भूमि, अन्न, कलश)।
  • दूसरा दिन: मंत्र 4, 5, 6, 7 और 8।
  • तीसरा दिन: मंत्र 9 से 15।
  • चौथा दिन: मंत्र 16, 17 और 18, फिर पूरा क्रम एक बार।
  • हर मंत्र का भाव एक बार पढ़ लें। साथ में यह भी याद रखें कि कौन-सा मंत्र किस चीज़ के लिए है। इससे क्रम नहीं भूलेंगे।

पाठ कैसे करें

  • कब: किसी भी पूजा, हवन, गृह प्रवेश, नवरात्र जैसे अवसर पर पूजा की शुरुआत में। तिथि और समय स्थान और परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकता है।
  • कैसे: स्वच्छ स्थान पर बैठें, मंत्र धीरे-धीरे बोलें और हर मंत्र के साथ उसकी सामग्री अर्पित करें।
  • क्रम: यहाँ दिया गया क्रम एक आम पद्धति का है। आपके पुरोहित या कुल-परंपरा में क्रम या मंत्र थोड़े अलग हो सकते हैं।
  • सावधानी: जल्दबाज़ी न करें। वैदिक मंत्रों में एक मात्रा का फ़र्क भी उच्चारण बदल देता है, इसलिए धीरे और साफ़ पढ़ें।

महत्व

कलश को पूजा का केंद्र माना जाता है। उसमें जल, अन्न, औषधि, रत्न और वस्त्र जैसी शुभ चीज़ें डालकर देवताओं का आवाहन किया जाता है। हर मंत्र के साथ एक चीज़ अर्पित करने से मन एकाग्र रहता है और पूजा का क्रम बना रहता है। इसे चमत्कार या गारंटी की तरह नहीं, श्रद्धा और विधि के साथ किए जाने वाले संकल्प की तरह देखना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. कलश स्थापन क्या होता है?
पूजा की शुरुआत में जल से भरे कलश में वरुण और अन्य देवताओं का आवाहन करके उसे स्थापित करना।

2. कलश में क्या-क्या डाला जाता है?
जल, चंदन, सर्वौषधि, दूर्वा, पंचपल्लव, सप्तमृत्तिका, सुपारी, पंचरत्न, सिक्का, वस्त्र और ऊपर नारियल। सामग्री पद्धति के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है।

3. क्या सभी मंत्र पढ़ना ज़रूरी है?
यह परंपरा और पुरोहित के अनुसार अलग हो सकता है। कई जगह सामग्री के अनुसार कम मंत्र भी पढ़े जाते हैं।

4. पाठ में कितना समय लगता है?
धीरे-धीरे सामग्री अर्पित करते हुए लगभग 15 से 20 मिनट।

5. शुरुआत करने वाले क्या करें?
पहले क्रम और सामग्री की सूची याद करें, फिर मंत्र। उच्चारण किसी पुरोहित या जानकार से सुनकर मिला लें।

पाठ-आधार: यज्ञ मार्तण्ड (पं. कुशेश्वर झा), कलश-स्थापनम्, पृ. 20 से 23; यजुर्वेद के मंत्र।

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संपादकीय डेस्क

यह लेख संपादकीय नीति के अनुसार तैयार किया गया है। कोई त्रुटि दिखे तो हमें बताएँ · संपादकीय नीति

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