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पूजा और यज्ञ से पहले रक्षा विधान करते हुए दसों दिशाओं में अक्षत और पीली सरसों अर्पित करने की वैदिक विधि
ॐ मंत्र संग्रह

रक्षा विधान विधि | पूजा, हवन और यज्ञ से पहले दसों दिशाओं की रक्षा के मंत्र

रक्षा विधान की सरल विधि जानें। पूजा, हवन और यज्ञ से पहले बोले जाने वाले रक्षा मंत्र, उनका आसान हिंदी अर्थ, दसों दिशाओं के रक्षक देवता और पूजा-स्थान की बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना यहाँ पढ़ें।

श्रवण झा 27 अक्टूबर 2026⏱ 12 मिनट पढ़ें👁 3

रक्षा विधान क्या है

किसी भी बड़ी पूजा, हवन या यज्ञ को शुरू करने से पहले हम एक बात का ध्यान रखते हैं: पूजा शांति से हो, बीच में कोई रुकावट न आए और पूजा का स्थान सुरक्षित रहे। इसी भाव से जो छोटी-सी विधि की जाती है, उसे रक्षा विधान कहते हैं। इसमें पूजा करने वाला अक्षत, पीली सरसों, एक सिक्का और मौली हाथ में लेकर देवताओं, ग्रहों और ऋषियों को याद करता है, फिर दसों दिशाओं में अक्षत-सरसों छोड़कर हर दिशा के रक्षक देवता से प्रार्थना करता है।

आसान शब्दों में समझिए: जैसे हम किसी बड़े कार्यक्रम से पहले घर के दरवाज़े-खिड़कियाँ ठीक से बंद कर लेते हैं और बड़ों का आशीर्वाद ले लेते हैं, वैसे ही पूजा से पहले हम चारों ओर से रक्षा की प्रार्थना कर लेते हैं। इसमें डरने की कोई बात नहीं है। यह श्रद्धा, सावधानी और शुभ भाव की विधि है।

यह विधि कब की जाती है

  • किसी भी बड़ी पूजा, हवन या यज्ञ के आरंभ में। जैसे गृह प्रवेश, कथा, अनुष्ठान या दीपावली की पूजा जैसे अवसर।
  • आम तौर पर संकल्प और कलश स्थापना के आसपास, और मुख्य पूजा शुरू होने से ठीक पहले। क्रम पुरोहित और परंपरा के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है।
  • इसके बाद पूजा की बाकी विधियाँ (जैसे नान्दीश्राद्ध, गणेश पूजन आदि) की जाती हैं।

क्या-क्या सामग्री चाहिए

सामग्रीकितनी और क्यों
अक्षत (साबुत चावल)एक मुट्ठी। शुभता के लिए और दिशाओं में छोड़ने के लिए।
पीली सरसोंएक छोटी कटोरी। इसे दिशाओं में छोड़ा जाता है।
द्रव्य (सिक्का)एक सिक्का। हाथ में रखने के लिए।
मौली (कलावा)एक धागा। इसे हाथ में रखकर अभिमंत्रित किया जाता है।
जल की आचमनी या छोटा पात्रहाथ साफ़ करने और अंत में जल छोड़ने के लिए।

अगर पीली सरसों न मिले, तो अपने पुरोहित से पूछ लें कि उसकी जगह क्या ले सकते हैं।

पूरी विधि: कब क्या करें

चरण 1: हाथ में सामग्री लेना

पूजा के स्थान पर आसन पर बैठ जाएँ और पहले हाथ साफ़ कर लें। अब बाएँ हाथ में ये चारों चीज़ें रखें: अक्षत, पीली सरसों, सिक्का और मौली। फिर दाहिने हाथ से उन्हें ढक लें, जैसे किसी चीज़ को दोनों हथेलियों के बीच सहेजकर रखते हैं। इसी तरह हाथ में रखकर अगला मंत्र बोला जाता है।

ऐसा करने का भाव यह है कि जो चीज़ें हाथ में हैं, वे मंत्र के साथ पवित्र और रक्षा के भाव से भर जाती हैं। इसे अभिमंत्रित करना कहते हैं।

चरण 2: देवताओं, ग्रहों और ऋषियों को प्रणाम (अभिमंत्रण का मंत्र)

हाथ में सामग्री लेकर नीचे दिए गए श्लोक बोलें। ये श्लोक एक तरह से पूजा शुरू करने से पहले सबसे आशीर्वाद लेने के हैं।

ॐ गणाधिपं नमस्कृत्य नमस्कृत्य पितामहम् ।
विष्णुं रुद्रं श्रियं देवीं वन्दे भक्त्या सरस्वतीम् ॥
स्थानाधिपं नमस्कृत्य ग्रहनाथं निशाकरम् ।
धरणीगर्भसम्भूतं शशिपुत्रं बृहस्पतिम् ॥
दैत्याचार्यं नमस्कृत्य सूर्यपुत्रं महाबलम् ।
राहुं केतुं नमस्कृत्य यज्ञारम्भे विशेषतः ॥
शक्राद्या देवताः सर्वा मुनींश्च तपोधनान् ।
गर्गं मुनिं नमस्कृत्य नारदं मुनिसत्तमम् ॥
वसिष्ठं मुनिशार्दूलं विश्वामित्रं च गौतमम् ।
व्यासं मुनिं नमस्कृत्य सर्वशास्त्रविशारदम् ॥
विद्याधिकान् मुनीन् सर्वान् आचार्यांश्च तपोधनान् ।
तान् सर्वान् प्रणमाम्येवं यज्ञरक्षाकरान् सदा ॥

इस श्लोक का आसान अर्थ

मैं सबसे पहले गणों के स्वामी गणेशजी को प्रणाम करता हूँ, फिर पितामह ब्रह्माजी को। मैं भक्ति से विष्णुजी, रुद्र (शिवजी), लक्ष्मीजी और सरस्वतीजी की वंदना करता हूँ।

फिर मैं इस स्थान के स्वामी देवता को प्रणाम करता हूँ। मैं ग्रहों में चंद्रमा, धरती के पुत्र मंगल, चंद्रमा के पुत्र बुध, बृहस्पति, दैत्यों के गुरु शुक्र और सूर्य के बलशाली पुत्र शनि को प्रणाम करता हूँ। राहु और केतु को भी, खासकर इस यज्ञ के आरंभ में प्रणाम करता हूँ।

इन्द्र आदि सब देवताओं और तपस्वी मुनियों को, गर्ग मुनि, मुनियों में श्रेष्ठ नारद, मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम और सब शास्त्रों के ज्ञाता व्यास मुनि को प्रणाम करता हूँ। इसी तरह सब विद्वान मुनियों और तपस्वी आचार्यों को भी, जो सदा यज्ञ की रक्षा करते हैं, मैं प्रणाम करता हूँ।

भाव यह है: "मैं पूजा शुरू करने से पहले सब बड़ों, देवताओं और ग्रहों को प्रणाम करता हूँ। आप सबका आशीर्वाद मेरे साथ रहे।"

चरण 3: दसों दिशाओं में अक्षत और सरसों छोड़ना

अब अभिमंत्रित अक्षत और पीली सरसों दाहिने हाथ में थोड़ी-थोड़ी लें और नीचे दिए श्लोक की एक-एक पंक्ति के साथ उस दिशा में हल्के से छोड़ें या छिड़कें। यहाँ "दसों दिशाएँ" का मतलब है चार मुख्य दिशाएँ, चार कोने, और ऊपर और नीचे।

पूर्वे रक्षतु वाराह आग्नेय्यां गरुडध्वजः ।
दक्षिणे पद्मनाभस्तु नैर्ऋत्यां मधुसूदनः ॥
पश्चिमे चैव गोविन्दो वायव्यां तु जनार्दनः ।
उत्तरे श्रीपती रक्षेदैशान्यां तु महेश्वरः ॥
ऊर्ध्वं रक्षतु धाता वो ह्यधोऽनन्तश्च रक्षतु ।
एवं दश दिशो रक्षेद्वासुदेवो जनार्दनः ॥
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं रक्षत्वीशो जनार्दनः ॥

कौन-सी दिशा में कौन रक्षा करें

दिशारक्षक देवतापंक्ति में नाम
पूर्वविष्णुजी का वराह रूपवाराह
अग्नि कोण (दक्षिण-पूर्व)गरुड़ की ध्वजा वाले, यानी विष्णुजीगरुडध्वजः
दक्षिणपद्मनाभ (विष्णुजी)पद्मनाभः
नैर्ऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम)मधुसूदन (विष्णुजी)मधुसूदनः
पश्चिमगोविंद (विष्णुजी)गोविन्दः
वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम)जनार्दन (विष्णुजी)जनार्दनः
उत्तरश्रीपति, यानी लक्ष्मीजी के पति विष्णुजीश्रीपतिः
ईशान कोण (उत्तर-पूर्व)महेश्वर (शिवजी)महेश्वरः
ऊपरधाता (सृष्टि को धारण करने वाले ब्रह्मा)धाता
नीचेअनन्त (शेषनाग)अनन्तः

इस श्लोक का आसान अर्थ

पूर्व दिशा में वराह रूप वाले विष्णुजी रक्षा करें। दक्षिण-पूर्व में गरुड़ध्वज (विष्णुजी) रक्षा करें। दक्षिण में पद्मनाभ और दक्षिण-पश्चिम में मधुसूदन रक्षा करें। पश्चिम में गोविंद और उत्तर-पश्चिम में जनार्दन रक्षा करें। उत्तर में श्रीपति और उत्तर-पूर्व में महेश्वर (शिवजी) रक्षा करें। ऊपर की ओर धाता रक्षा करें और नीचे की ओर अनन्त रक्षा करें। इस तरह जनार्दन वासुदेव दसों दिशाओं की रक्षा करें। और जो कोई स्थान रक्षा से रह गया हो, उसकी रक्षा भी वे ही करें।

दिशाएँ पहचानने का आसान तरीका

अगर आप पूर्व की ओर मुख करके बैठे हैं, तो आपके सामने पूर्व है, दाहिने हाथ की ओर दक्षिण, पीठ की तरफ़ पश्चिम और बाएँ हाथ की ओर उत्तर। बीच के कोने इन्हीं के बीच में हैं: सामने-दाएँ की ओर अग्नि कोण, पीछे-दाएँ की ओर नैर्ऋत्य कोण, पीछे-बाएँ की ओर वायव्य कोण और सामने-बाएँ की ओर ईशान कोण। अगर दिशा का अंदाज़ा न हो, तो पूजा शुरू करने से पहले फ़ोन के कंपास से पूर्व दिशा देख लें।

चरण 4: पूजा के स्थान की बाधाओं को हटाने की प्रार्थना

अब ये दोनों श्लोक बोलें। इनमें कहा गया है कि पूजा के स्थान पर जो भी रुकावट डालने वाली अदृश्य शक्ति हो, वह शिवजी की आज्ञा से वहाँ से हट जाए। यह कोई डरने वाली बात नहीं है। यह परंपरा में पूजा-स्थान को शुद्ध और बाधा-रहित मानने की प्रार्थना है।

यदत्र संस्थितं भूतं स्थानमाश्रित्य सर्वदा ।
स्थानं त्यक्त्वा तु तत्सर्वं यत्रस्थं तत्र गच्छतु ॥

आसान अर्थ: जो भी अदृश्य शक्ति इस स्थान का सहारा लेकर यहाँ ठहरी हुई हो, वह सब इस स्थान को छोड़कर अपनी जगह चली जाए।

ॐ अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूमिसंस्थिताः ।
ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया ॥
अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतो दिशम् ।
सर्वेषामविरोधेन पूजाकर्म समारभे ॥

आसान अर्थ: जो शक्तियाँ भूमि पर निवास करती हैं, वे यहाँ से हट जाएँ। जो पूजा में विघ्न डालने वाली हों, वे शिवजी की आज्ञा से मिट जाएँ। सब दिशाओं से वे हट जाएँ। मैं किसी के विरोध के बिना, सबकी सहमति से, इस पूजा-कर्म को शुरू करता हूँ।

चरण 5: मौली और बाकी सामग्री का क्या करें

जब ऊपर की बातें हो जाएँ, तो हाथ में बची हुई सामग्री का क्या करना है, यह पुस्तक के उस पन्ने पर अलग से साफ़ नहीं लिखा दिखा। आम परंपरा में ये बातें की जाती हैं, पर आप अपने पुरोहित से पूछकर वैसा ही करें जैसा आपके घर में होता है:

  • अभिमंत्रित मौली पूजा करने वाले (यजमान) की कलाई पर बाँधी जाती है। पुरुष के दाहिने हाथ में और महिला के बाएँ हाथ में, यह आम परंपरा है।
  • सिक्का पूजा की दक्षिणा के साथ रख दिया जाता है।
  • बचे हुए अक्षत और सरसों पूजा-स्थान के आसपास छोड़ दिए जाते हैं, या पुरोहित के कहे अनुसार रखे जाते हैं।

मौली बाँधते समय एक प्रचलित रक्षा-सूत्र मंत्र भी बोला जाता है। यह मंत्र आपके दिए हुए पन्ने पर नहीं दिखा, पर बहुत जगह प्रचलित है:

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥

आसान अर्थ: जिस रक्षा-सूत्र से महान बलशाली दानवराज राजा बलि बाँधे गए थे, उसी से मैं आपको बाँधता हूँ। हे रक्षा-सूत्र, आप अडिग रहिए, कभी विचलित मत होइए।

चरण 6: विधि का समापन

अंत में हाथ जोड़कर प्रणाम करें और हाथ का थोड़ा जल पात्र में छोड़ दें। इसके बाद पूजा की अगली विधि पर चलें। आपके पन्ने पर अगला प्रकरण "साङ्गृहिक नान्दीश्राद्ध विधि" है, जो पूर्वजों के आशीर्वाद के लिए शुभ अवसरों पर की जाने वाली एक अलग विधि है। वह इस लेख का हिस्सा नहीं है।

यह पूरा क्रम एक नज़र में

  1. आसन पर बैठकर हाथ साफ़ करें।
  2. बाएँ हाथ में अक्षत, पीली सरसों, सिक्का और मौली लें, और दाहिने हाथ से ढक लें।
  3. देवताओं, ग्रहों और ऋषियों को प्रणाम करने वाले श्लोक बोलें।
  4. दाहिने हाथ में थोड़ा अक्षत-सरसों लेकर, श्लोक की एक-एक पंक्ति के साथ उसी दिशा में छोड़ते जाएँ। कुल दस दिशाएँ हैं।
  5. "यदत्र संस्थितं..." और "ॐ अपसर्पन्तु..." बोलकर पूजा-स्थान की बाधाएँ हटाने की प्रार्थना करें।
  6. मौली बाँधें (आम परंपरा), फिर जल छोड़कर विधि पूरी करें।

कुछ ज़रूरी बातें

  • सब कुछ शांत मन से और धीरे-धीरे करें। जल्दबाज़ी न करें।
  • पूजा के बाद फेंके हुए अक्षत और सरसों को झाड़ू से साफ़ कर लें, ताकि घर में बिखरे न रहें।
  • छोटे बच्चे साथ हों तो ध्यान रखें कि सरसों और चावल वे मुँह में न डालें।
  • इस विधि को डर से नहीं, श्रद्धा और सावधानी के भाव से करें।
  • मंत्र, दिशाओं का क्रम और सामग्री में परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अंतर हो सकता है। अपने पुरोहित से पूछ लेना सबसे अच्छा है।

बच्चों या नए लोगों को कैसे समझाएँ

बच्चों से कहिए: "पूजा से पहले हम सब बड़ों से आशीर्वाद लेते हैं, जैसे परीक्षा से पहले माँ-पापा और टीचर का आशीर्वाद लेते हैं। फिर हम चारों दिशाओं, चारों कोनों, ऊपर और नीचे के देवताओं से कहते हैं कि पूजा में हमारी रक्षा करना। जैसे घर से निकलने से पहले हम दरवाज़ा बंद करके ताला लगाते हैं, वैसे ही हम पूजा के चारों ओर सुरक्षा का घेरा बना देते हैं।"

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. रक्षा विधान क्यों किया जाता है?
पूजा शांति से, बिना रुकावट के पूरी हो और पूजा का स्थान सुरक्षित रहे, इस भाव से।

2. क्या यह हर पूजा में ज़रूरी है?
यह बड़ी पूजा, हवन और अनुष्ठानों में ज़्यादा किया जाता है। छोटी पूजा में कई घर सिर्फ़ मौली बाँधकर या संक्षेप में कर लेते हैं। यह परंपरा और पुरोहित के अनुसार अलग हो सकता है।

3. दसों दिशाएँ कौन-कौन सी हैं?
चार मुख्य दिशाएँ (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण), चार कोने (अग्नि, नैर्ऋत्य, वायव्य, ईशान), और ऊपर तथा नीचे।

4. क्या इसमें डरने जैसा कुछ है?
नहीं। इसमें सुरक्षा और बाधा-रहित पूजा की प्रार्थना है। इसे श्रद्धा और शांत मन से करें।

5. इसमें कितना समय लगता है?
धीरे-धीरे श्लोक पढ़ते हुए लगभग 5 से 7 मिनट।

पाठ-आधार: रक्षा-विधानम्, यज्ञ मार्तण्ड (पं. कुशेश्वर झा), पृ. 40 और 41।

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✍
श्रवण झा

यह लेख संपादकीय नीति के अनुसार तैयार किया गया है। कोई त्रुटि दिखे तो हमें बताएँ · संपादकीय नीति

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