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पुष्पांजलि मंत्र के लिए देवी-देवताओं और पुष्प अर्पण से सुसज्जित मंदिर का दृश्य – SanskritPeeth.in
ॐ मंत्र संग्रह

पुष्पाञ्जलि मंत्र अर्थ सहित | पुष्पाञ्जलिः पाठ विधि

परिचय पुष्पाञ्जलि का अर्थ है हाथों में फूल लेकर देवता को श्रद्धा से अर्पित करना। पूजा या आरती के अंत में यह मंत्र-समूह पढ़ा जाता है। इसमें वेद के

संपादकीय डेस्क 10 अक्टूबर 2026⏱ 9 मिनट पढ़ें👁 5

परिचय

पुष्पाञ्जलि का अर्थ है हाथों में फूल लेकर देवता को श्रद्धा से अर्पित करना। पूजा या आरती के अंत में यह मंत्र-समूह पढ़ा जाता है। इसमें वेद के अलग-अलग भागों से लिए गए मंत्र हैं, जिनमें रुद्र, यज्ञ, कुबेर और उस एक परम देव की स्तुति मिलती है जो सब ओर देखने वाला है। यह मंत्र-समूह जिस देवता की पूजा हो रही हो, उसी को समर्पित माना जाता है।

पुष्पाञ्जलि मंत्रों का मूल पाठ

पुष्पाञ्जलिः

मंत्र १
ॐ मानस्तोके तनये मा नऽ आयुषि मा नो गोषु मा नो अवश्वेषु रीरिषः ।
मा नो व्बीरान् रुद्र भामिनो व्बधीर्हविष्मन्तः सदमित्वा हवामहे ।।

मंत्र २
ॐ व्याजश्चमे प्रसवश्चमे प्रयतिश्चमे धीतिश्चमे स्वरश्चमे लोकश्चमे श्रवश्चमे श्रुतिश्चमे ज्योतिश्चमे स्वश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम् ।।

मंत्र ३
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्व साध्याः सन्ति देवाः ।

मंत्र ४
ॐ राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने। नमो व्वयं वैश्रवणाय कुर्महे। स मे कामकामाय मह्यं । कामेश्वरो वैश्रणो ददातु । कुवेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः।

मंत्र ५
ॐ स्वस्ति ! साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठयं राज्यं महाराज्यमा-धिपत्यमयं समन्त-पर्यायी स्यात् । सार्वभौमः सार्वायुषान्ता-दापरार्धात् पृथिव्यै समुद्रपर्यन्ताया एकराडिति । तदप्येष श्लोकेऽभिगीतो मरुतः परिवेष्टारो मरुतस्या वसन् न गृहे । आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वे देवाः सभासद् इति ।

मंत्र ६
ॐ विश्वतचक्षुरुत विश्वतो मुखो विश्वतो बाहुरुतः विश्वतस्पात् ।
सम्याहुभ्यां धमति सम्पत्तत्त्रैर्द्यावाभूमो जनयन्देवऽएकः ।।

शब्दार्थ और भावार्थ

मंत्र १ (रुद्र से रक्षा की प्रार्थना): तोक यानी छोटी संतान, तनय यानी वंश, गो यानी गायें, अश्व यानी घोड़े, वीर यानी वीर जन। "मा रीरिषः" और "मा वधीः" का अर्थ है हानि न पहुँचाओ। हवि अर्पित करने वाले हम आपको सदा पुकारते हैं। भाव यह है कि हे रुद्र, आप क्रोध में हों तो भी हमारी संतान, आयु, पशुधन और वीर साथियों को हानि न पहुँचाइए। यह मंत्र डर से नहीं, विनम्र रक्षा-प्रार्थना के भाव से पढ़ा जाता है।

मंत्र २ (सब कुछ यज्ञ-भाव से सिद्ध हो): "च मे" का अर्थ है "और मेरे लिए"। इसमें अन्न-बल, उत्पत्ति, प्रयत्न, चिंतन, स्वर, यश, श्रवण, श्रुति, ज्योति और सुख जैसी बातें गिनाई गई हैं। "कल्पन्ताम्" यानी सिद्ध हों, समर्थ हों। यह अंश "चमकम्" की शैली का है, जिसमें साधक अपने जीवन की हर आवश्यक वस्तु को यज्ञ, यानी शुभ और निःस्वार्थ कर्म, से जोड़ता है।

मंत्र ३ (यज्ञ ही प्रथम धर्म): अयजन्त यानी यजन किया, धर्माणि यानी धारण करने योग्य नियम, नाक यानी दुःख-रहित उच्च लोक, साध्याः यानी प्राचीन देवगण। देवताओं ने यज्ञ के द्वारा ही यज्ञ-स्वरूप परम सत्ता की उपासना की और वही सबसे पहले के धर्म बने। जो लोग इन धर्मों का पालन करके महिमा पाते हैं, वे उस उच्च लोक की ओर बढ़ते हैं जहाँ पहले के साध्य देवता रहते हैं।

मंत्र ४ (कुबेर को नमन): राजाधिराज यानी राजाओं के भी राजा, प्रसह्य साहिने यानी बाधाओं को बल से जीतने वाले, वैश्रवण यानी कुबेर, कामेश्वर यानी कामनाओं के स्वामी। हम बाधाओं पर विजय पाने वाले कुबेर को प्रणाम करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि वे हमारी उचित इच्छाओं को पूर्ण करने में सहायक हों। इसे प्रार्थना के रूप में पढ़ें, किसी परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं।

मंत्र ५ (राज्य-वैभव और मरुत्त का श्लोक): स्वस्ति यानी कल्याण हो। साम्राज्य, भौज्य, स्वाराज्य, वैराज्य, पारमेष्ठ्य, महाराज्य और आधिपत्य शासन के अलग-अलग स्तरों के नाम हैं। सार्वभौम यानी सब भूमि का स्वामी, एकराट् यानी एकमात्र राजा, सभासद् यानी सभा में बैठने वाले। इस अंश में कल्याण की कामना के साथ प्राचीन राज्याभिषेक की परंपरा का वर्णन है, जिसमें पृथ्वी से समुद्र तक एक छत्र शासन की बात है। अंत में आविक्षित-पुत्र मरुत्त के यज्ञ का संदर्भ है, जहाँ मरुद्गण परोसने वाले और विश्वेदेव सभासद थे। सरल भाव यह है कि धर्म और यज्ञ पर आधारित शासन को देवताओं का सहयोग मिलता है।

मंत्र ६ (सब ओर देखने वाला एक देव): विश्वतः यानी सब ओर, चक्षु यानी नेत्र, बाहु यानी भुजा, पात् यानी चरण, पतत्र यानी पंख, द्यावाभूमी यानी आकाश और पृथ्वी, जनयन् यानी उत्पन्न करता हुआ। वह एक देव सब ओर नेत्रों, मुखों, भुजाओं और चरणों वाला है, यानी उसकी दृष्टि और उसका कर्म हर दिशा में है। वही भुजाओं और पंखों जैसे साधनों से सबको जोड़ता है और आकाश तथा पृथ्वी की रचना करता है। यह अंश सर्वव्यापक परम सत्ता का ध्यान कराता है।

पुष्पाञ्जलि की सरल पाठ-विधि

  1. समय: पूजा, आरती या हवन के अंत में।
  2. तैयारी: स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें। थाली या कटोरी में फूल और अक्षत रखें। जिस देवता की पूजा हो रही है, उनके सामने खड़े हों या शांत होकर बैठें।
  3. पाठ: दोनों हाथों की अंजलि में फूल लें। मंत्र शांत मन से, स्पष्ट उच्चारण के साथ पढ़ें।
  4. समापन: मंत्र पूरे होने पर फूल इष्टदेव के चरणों में अर्पित करें और प्रणाम करें।

अर्पण की संख्या (कहीं एक बार, कहीं तीन बार), कौन-कौन से मंत्र पढ़े जाएँ और उनका क्रम कुल-परंपरा या गुरु के अनुसार अलग हो सकता है। आपके घर या मंदिर में जो चलता है, वही अपनाएँ।

पढ़ते समय किन बातों का ध्यान रखें

ये मंत्र आरती की तरह गाए नहीं जाते, पढ़े जाते हैं। इनकी बनावट देखने पर कुछ बातें साफ़ दिखती हैं:

  • पहले अर्थ, फिर पाठ। मंत्र ४ और ५ में कई शब्द रोज़ की हिंदी में नहीं आते (प्रसह्य, पारमेष्ठ्य, एकराट्)। ऊपर का शब्दार्थ एक बार पढ़ लेने से रटने के बजाय समझकर पढ़ना होता है।
  • मंत्र २ में लय है। "च मे" बार-बार आता है, इसलिए हर शब्द को अलग-अलग और बराबर समय देकर पढ़ें। जल्दी में शब्द आपस में मिल जाते हैं।
  • मंत्र ५ सबसे लंबा है। इसे एक साँस में न पढ़ें। विराम-चिह्न (।) पर रुकें और अगला अंश नई साँस के साथ शुरू करें।
  • मंत्र १, ३ और ६ में भाव ठहराव का है। इन्हें थोड़ा धीमे पढ़ें। मंत्र ४ का अंतिम अंश "कुवेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः" नमस्कार-वाक्य है, उसे स्पष्ट और ठहरकर बोलें।

उच्चारण के सुझाव

  • "पुष्पाञ्जलि" में "ञ्" की नासिक्य ध्वनि है, यानी उच्चारण "पुष्पान्जलि" के निकट रहता है।
  • मंत्र १ में "नऽ आयुषि" का "ऽ" अवग्रह है, जो यहाँ "अ" का लोप दिखाता है। इसे "न आयुषि" की तरह एक प्रवाह में पढ़ें।
  • "रीरिषः" जैसे शब्दों के अंत का विसर्ग हल्की "ह" ध्वनि के साथ बोलें, उसे ज़ोर से न खींचें।
  • "व्बीरान्" और "व्बधीः" में "व्ब" वाजसनेयी पाठ-शैली का रूप है। इसका उच्चारण किसी जानकार से सुनकर तय करें।

पुष्पाञ्जलि का महत्व

श्रद्धालु पुष्पाञ्जलि को पूजा के समापन में समर्पण और कृतज्ञता की अभिव्यक्ति मानते हैं। फूल देते समय मन का ठहराव और विनम्रता इस क्रिया की असली सुंदरता है। इन मंत्रों में रक्षा की प्रार्थना भी है, यज्ञ-भाव से जीवन जीने का संकल्प भी, और सब ओर व्याप्त परम सत्ता का स्मरण भी। यह किसी चमत्कार या निश्चित फल का दावा नहीं, बल्कि श्रद्धा और अनुशासन का एक सरल माध्यम है। तिथि और मुहूर्त जैसी बातें स्थान के अनुसार भिन्न हो सकती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

पुष्पाञ्जलि का अर्थ क्या है?

पुष्प का अर्थ फूल और अंजलि का अर्थ दोनों हथेलियों का संपुट है। यानी हथेलियों में फूल लेकर श्रद्धा से अर्पित करना।

पुष्पाञ्जलि कब की जाती है?

सामान्यतः पूजा, आरती या हवन के अंत में। कुछ परंपराओं में अलग विधि भी मिलती है, इसलिए कुल-परंपरा या गुरु के अनुसार चलना उचित है।

क्या सभी मंत्र एक साथ पढ़ना आवश्यक है?

यह परंपरा पर निर्भर है। अलग-अलग स्थानों पर पाठ-भेद और मंत्रों की संख्या में अंतर मिलता है।

क्या संस्कृत जाने बिना पुष्पाञ्जलि कर सकते हैं?

हाँ। पहले धीरे-धीरे पढ़ें, किसी जानकार से सुनकर उच्चारण सुधारें और अर्थ समझकर पढ़ें। ऊपर दिए शब्दार्थ इसमें मदद करेंगे।

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संपादकीय डेस्क

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